अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंतं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्.. (१३) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! कृपा के पात्र ब्राह्मणों के आंसुओं का जो जल होता है, वही जल देवों ने तेरे लिए निश्चित किया है. (१३) येन मृतं स्नपयन्ति श्मश्रूणि येनोन्दते. तं वै ब्रह्मज्य ते देवा अपां भागमधारयन्.. (१४) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! जो जल मृतक को स्नान करने के लिए एवं मूंछें भिगोने से बचता है, वही जल देवों ने तेरे पीने के लिए निश्चित किया है. (१४) न वर्षं मैत्रावरुणं ब्रह्मज्यमभि वर्षति. नास्मै समितिः कल्पते न मित्रं नयते वशम्.. (१५) जिस राज्य में ब्राह्मण को दुःख दिया जाता है, उस में वरुण वर्षा नहीं करते. उस राष्ट्र की सभा सामर्थ्य हीन होती है तथा उस की सेना शत्रुओं को वश में नहीं रख पाती है. (१५) सूक्त-२० देवता—वानस्पत्य उच्चैर्घोषो दुन्दुभिः सत्वनायन् वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिः. वाचं क्षुगुवानो दमयन्त्सपत्नान्त्सिंह इव जेष्यन्नभि तंस्तनीहि.. (१) हे दुंदुभि! तू वनस्पतियों से बनाई गई है तथा उच्च स्वर करती है. तू शक्तिशाली जनों के समान आचरण कर तथा उच्च घोष से शत्रुओं का मान मर्दन कर. (१) सिंह इवास्तानीद् द्रुवयो विबद्धोऽभिक्रन्दन्नृषभो वासितामिव. वृषा त्वं वध्रयस्ते सपत्ना ऐन्द्रस्ते शुष्मो अभिमातिषाहः.. (२) हे दुंदुभि! तू सिंह के समान गर्जन कर. हे वृक्ष के समान अधिक आयु वाली दुंदुभी! तू गाय को देख कर रंभाने वाले बैल के समान शब्द करती है. विशेष रूप से बंधी हुई तू वीर्य वर्षा करने वाली है, इस कारण तेरे शत्रु शक्ति रहित हो जाते हैं. तेरा बल इंद्र के समान है, इसलिए उसे वीर्य ही सहन कर पाता है. (२) वृषेव यूथे सहसा विदानो गव्यन्नभि रुव सन्धनाजित्. शुचा विध्य हृदयं परेषां हित्वा ग्रामान् प्रच्युता यन्तु शत्रवः.. (३) जिस प्रकार गाय की कामना करने वाला बैल अपने शब्द के कारण झुंड में भी पहचान लिया जाता है, उसी प्रकार हे दुंदुभी! शत्रुओं को जीतने की इच्छा से शब्द कर के उन के हृदयों में संताप भर दे. वे शत्रु हमारे गांवों को छोड़ कर चले जाएं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*