भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 247

जो राजा अपनेआप को उग्र मानता हुआ ब्राह्मण की हत्या करता है एवं ब्राह्मण जिस राज्य में दुःखी रहता है, वह राजा और राष्ट्र दोनों समाप्त हो जाते हैं. (६) अष्टापदी चतुरक्षी चतुःश्रोता चतुर्हनुः. द्व्यास्या द्विजिह्वा भूत्वा सा राष्ट्रमव धूनुते ब्रह्मज्यस्य.. (७) राजा के द्वारा ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति आठ पैरों, चार आंखों, चार कानों, चार ठोड़ियों, दो मुखों और दो जीभों वाली राक्षसी बन कर उन के राज्य को समाप्त कर देती है. (७) तद् वै राष्ट्रमा स्रवति नावं भिन्नामिवोदकम्. ब्रह्माणं यत्र हिंसन्ति तद् राष्ट्रं हन्ति दुच्छुना.. (८) जिस राष्ट्र में ब्राह्मण की हिंसा होती है, उस राष्ट्र का ब्रह्मरूपी पाप उसे छेद वाली नौका के साथ डुबा देता है. ब्राह्मण पर डाली गई विपत्ति ही उस राष्ट्र को डुबा देती है. (८) तं वृक्षा अप सेधन्ति छायां नो मोपगा इति. यो ब्राह्मणस्य सद्धनमभि नारद् मन्यते.. (९) हे नारद! जो ब्राह्मण के धन को अपना धन समझता है, उस से वृक्ष भी द्वेष मानते हैं और उसे अपनी छाया में नहीं आने देना चाहते. (९) विषमेतद् देवकृतं राजा वरुणोऽब्रवीत्. न ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा राष्ट्रे जागार कश्चन.. (१०) राजा वरुण ने कहा है कि ब्राह्मण का धन देवों द्वारा निर्मित विष ही है. ब्राह्मण की गाय को मार कर राष्ट्र में कोई भी जीवित नहीं रहता. (१०) नवैव ता नवतयो या भूमिर्व्यधूनुत. प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन्.. (११) जिन आठ सौ दस पुरुषों से धरती कांपती थी, वे ब्राह्मण की संतान की हिंसा कर के असंभव पराजय को प्राप्त हुए. (११) यां मृतायानुबध्नन्ति कूहं पदयोपनीम्. तद् वै ब्रह्मज्य ते देवा उपस्तरणमब्रुवन्.. (१२) हे ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले पुरुष! जो रस्सी मरे हुए पुरुष के शव में बांधी जाती है, उसी से देवों ने तेरा बिछौना बनाया है. (१२) अश्रूणि कृपमाणस्य यानि जीतस्य वावृतुः. ebook converter DEMO Watermarks*