भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 266

प्रत्यौहन्मृत्युममृतेन साकमन्तर्दधाना दुरितानि विश्वा.. (८) त्रिवृत्त रूप से तीन समर्थ स्वर्ण एक अक्षर पर आकर शक्तिशाली बनते हैं. वे सभी पापों को नष्ट कर के अमृत के द्वारा तेरी मृत्यु को समाप्त करें. (८) दिवस्त्वा पातु हरितं मध्यात् त्वा पात्वर्जुनम्. भूम्या अयस्मयं पातु प्रागाद् देवपुरा अयम्.. (९) आकाश स्वर्ण के द्वारा तेरी रक्षा करे. मध्य लोक से रजत तेरी रक्षा करे. पृथ्वीलोक तेरी रक्षा करे. ये तीनों देव नगरियों को प्राप्त होते हैं. (९) इमास्तिस्रो देवपुरास्तास्त्वा रक्षन्तु सर्वतः. तास्त्वं बिभ्रद् वर्चस्युत्तरो द्विषतां भव.. (१०) ये देवताओं की जो तीन नगरियां हैं, वे सभी ओर से तेरी रक्षा करें. उन्हें धारण करता हुआ तू अपने शत्रुओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी बन. (१०) पुरं देवानामामृतं हिरण्यं य आबेधे प्रथमो देवो अग्रे. तस्मै नमो दश प्राची: कृणोम्यनु मन्यतां त्रिवृदाबधे मे.. (११) देवों के आगे प्रमुख देव ने स्वर्ण रूपी अमृत को बांधा था. मैं उस के लिए दस बार नमस्कार करता हूं. वह देवता मुझे इस त्रिवृत्त को मांगने की आज्ञा दे. (११) आ त्वा चृतत्वर्यमा पूषा बृहस्पतिः. अहर्जातस्य यन्नाम तेन त्वाति चृतामसि.. (१२) अर्यमा, पूषा और बृहस्पति तुझे भली प्रकार बांधें. दिन में उत्पन्न होने वाले का जो नाम है, उस नाम से हम तुझे बांधते हैं. (१२) ऋतुभिष्वार्तवैरायुषे वर्चसे त्वा. संवत्सरस्य तेजसा तेन संहनु कृण्मसि.. (१३) हे ब्रह्मचारी! आयु और तेज की प्राप्ति के लिए मैं तुझे ऋतुओं, मासों और संवत्सरों के तेजरूप सूर्य से संबंधित करता हूं. (१३) घृतादुल्लुप्तं मधुना समक्तं भूमिंदृंहमच्युतं पारयिष्णु. भिन्दत् सपत्नानधरांश्च कृण्वदा मा रोह महते सौभगाय.. (१४) घी से तर तथा शहद से सिंचा हुआ तू पृथ्वी के समान दृढ़ है. तू शत्रुओं को चीरता हुआ एवं उन्हें तिरस्कृत करता हुआ महान सौभाग्य देने के लिए मुझ पर स्थित हो. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

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