अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसीलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को मेरे समीप ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो. (३) सूक्त-४९ देवता—अग्नि नहि ते अग्ने तन्वः क्रूरमानंश मर्त्यः. कपिर्बभस्ति तेजनं स्वं जरायु गौरिव.. (१) हे अग्नि! तुम्हारे ज्वाला रूप शरीर के तीक्ष्ण तेज को मरणधर्मा पुरुष प्राप्त नहीं कर सकता. ये बंदर के समान चंचल स्वभाव वाली और शरीर के जल को पीने वाली तुम्हारी ज्वालाएं इस देह को उसी प्रकार भस्म कर देती हैं, जिस प्रकार पहली बार बच्चा देने वाली गाय अपनी जेर को खा जाती है. (१) मेष इव वै सं च वि चोर्वच्यसे यदुत्तरद्रावुपरश्च खादतः. शीर्ष्णा शिरो ऽ प्ससाप्सो अर्दयन्नंशून् बभस्ति हरितेभिरासभिः.. (२) हे अग्नि! मेढ़ा जिस प्रकार अधिक घास वाले स्थान पर जाता है और घास चरने के पश्चात उस स्थान से अन्यत्र चला जाता है, उसी प्रकार तुम पहले जलाने योग्य पुरुष शरीर के अंगों से मिलते हो और बाद में उसे जलाने के बाद अन्यत्र चले जाते हो. वन को जलाने वाली दावाग्नि और शव को जलाने वाली शवाग्नि-ये दोनों अग्नियां वृक्ष अथवा शव को भस्म करती हुई अपनी ज्वालाओं से लता आदि को भी जला देती हैं. (२) सुपर्णा वाचमक्रतोप द्यव्याखरे कृष्णा इषिरा अनर्तिषुः. नि यनियन्त्युपरस्य निष्कृतिं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्रितः.. (३) हे अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं बाज पक्षी के समान शीघ्र व्यापक होने वाली हैं. काला हरिण जिस प्रकार अपने निवास स्थान में गति करता है, उसी प्रकार तुम्हारी ज्वालाएं समीप आ कर नृत्य करती है. धुआं उत्पन्न करने के कारण तुम्हारी ज्वालाएं मेघ का निर्माण करती हैं. हे अग्नि! तुम्हारी दीप्तियां सूर्य मंडल को पा कर सभी प्राणियों के जीवन के आधार जल को उत्पन्न करती हैं. (३) सूक्त-५० देवता—अश्विनीकुमार हतं तर्दं समङ्कमाखुमश्विना छिन्तं शिरो अपि पृष्टीः शृणीतम्. यवान्नेददानपि नह्यतं मुखमथाभयं कृणुतं धान्याय.. (१) हे अश्विनीकुमारो! हिंसक एवं बिल में प्रवेश करने वाले चूहे का विनाश करो. उस का सिर काट डालो तथा उस की पीठ की हड्डी चूरचूर कर दो. चूहा हमारे जौ नहीं खा पाए, इसलिए उस का मुंह बंद कर दो. ऐसा कर के तुम धान्य के लिए अभय करो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*