अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंतर्द है पतङ्ग हे जभ्य हा उपक्वस. ब्रह्मेवासंस्थितं हविरनदन्त इमान् यवानहिंसन्तो अपोदित.. (२) हे हिंसक चूहो तथा हे पतंगो! तुम उपद्रव करते हो, इसीलिए तुम्हारे विनाश के निमित्त दी गई हवि ब्रह्म के समान प्रभावशील हो. तुम हमारे जौ आदि अन्नों का विनाश न करते हुए इस स्थान से भाग जाओ. (२) तर्दापते वघापते तृष्टजम्भा आ शृणोत मे. य आरण्या व्यद्वरा ये के च स्थ व्यद्वरास्तान्त्सर्वान्जम्भयामसि.. (३) हे हिंसक चूहों एवं पतंगों आदि के स्वामी! तुम तीखे दांतों वाले हो. तुम मेरे इस वचन को सुनो. तुम चाहे जंगल में रहने वाले हो अथवा ग्राम में निवास करने वाले हो, हम अपने इस अनुष्ठान द्वारा तुम्हारा विनाश करते हैं. (३) सूक्त-५१ देवता—सोम वायोः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ् सोमो अति द्रुतः. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (१) वायु से संबंधित दशापवित्र के द्वारा शोधित सोमरस मुख से चल कर नाभि देश में पहुंचता है. वह इंद्र का योग्य मित्र है. (१) आपो अस्मान् मातरः सूदयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु. विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.. (२) संसार की माता जलदेवी हमें शुद्ध करे तथा अपने द्रव रूप रस से हमें पवित्र करे, क्योंकि देवता रूप जल स्नान, आचमन एवं प्रक्षेपण आदि करने वाले के सभी पापों को धोते हैं, इसीलिए ऐसे जलों में स्नान कर के मैं पवित्र हो कर यज्ञ कर्म के हेतु उपस्थित होता हूं. (२) यत् किं चेदं वरुण दैव्ये जने ऽ भिद्रोहं मनुष्या ३ श्वरन्ति. अचित्त्या चेत् तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः.. (३) हे जलों के स्वामी वरुण देव! मनुष्यगण जो पाप करते हैं तथा हम सब भी अज्ञान के कारण तुम से संबंधित धर्मों के विपरीत जो कार्य करते हैं, उस अज्ञान जनित पाप के कारण हमारी हिंसा मत करो. (३) सूक्त-५२ देवता—सूर्य, गाएं उद् सूर्यो दिव एति पुरो रक्षांसि निजूर्वन्. आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*