अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
तर्द है पतङ्ग हे जभ्य हा उपक्वस. ब्रह्मेवासंस्थितं हविरनदन्त इमान् यवानहिंसन्तो अपोदित.. (२) हे हिंसक चूहो तथा हे पतंगो! तुम उपद्रव करते हो, इसीलिए तुम्हारे विनाश के निमित्त दी गई हवि ब्रह्म के समान प्रभावशील हो. तुम हमारे जौ आदि अन्नों का विनाश न करते हुए इस स्थान से भाग जाओ. (२) तर्दापते वघापते तृष्टजम्भा आ शृणोत मे. य आरण्या व्यद्वरा ये के च स्थ व्यद्वरास्तान्त्सर्वान्जम्भयामसि.. (३) हे हिंसक चूहों एवं पतंगों आदि के स्वामी! तुम तीखे दांतों वाले हो. तुम मेरे इस वचन को सुनो. तुम चाहे जंगल में रहने वाले हो अथवा ग्राम में निवास करने वाले हो, हम अपने इस अनुष्ठान द्वारा तुम्हारा विनाश करते हैं. (३) सूक्त-५१ देवता—सोम वायोः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ् सोमो अति द्रुतः. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (१) वायु से संबंधित दशापवित्र के द्वारा शोधित सोमरस मुख से चल कर नाभि देश में पहुंचता है. वह इंद्र का योग्य मित्र है. (१) आपो अस्मान् मातरः सूदयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु. विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.. (२) संसार की माता जलदेवी हमें शुद्ध करे तथा अपने द्रव रूप रस से हमें पवित्र करे, क्योंकि देवता रूप जल स्नान, आचमन एवं प्रक्षेपण आदि करने वाले के सभी पापों को धोते हैं, इसीलिए ऐसे जलों में स्नान कर के मैं पवित्र हो कर यज्ञ कर्म के हेतु उपस्थित होता हूं. (२) यत् किं चेदं वरुण दैव्ये जने ऽ भिद्रोहं मनुष्या ३ श्वरन्ति. अचित्त्या चेत् तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः.. (३) हे जलों के स्वामी वरुण देव! मनुष्यगण जो पाप करते हैं तथा हम सब भी अज्ञान के कारण तुम से संबंधित धर्मों के विपरीत जो कार्य करते हैं, उस अज्ञान जनित पाप के कारण हमारी हिंसा मत करो. (३) सूक्त-५२ देवता—सूर्य, गाएं उद् सूर्यो दिव एति पुरो रक्षांसि निजूर्वन्. आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
के हंता आदित्य उदयाचल पर्वत से उदय होते हैं. (१)
सूर्य देव हमारे प्रति उपद्रव करने वाले राक्षस, पिशाच आदि का विनाश करते हुए पूर्व दिशा में उदय होते हैं. सभी प्राणियों के द्वारा देखे गए और हमारे द्वारा अदृश्य राक्षसों आदि के हंता आदित्य उदयाचल पर्वत से उदय होते हैं. (१) नि गावो गोष्ठे असदन् नि मृगासो अविक्षत. न्यू ३ र्मयो नदीनां न्य १ दृष्टा अलिप्तत.. (२) सूर्योदय के कारण राक्षसों के विनाश से इस समय हमारी गाएं निर्भय हो कर गोशाला में बैठी हैं तथा वन के पशु भी अपनेअपने स्थान पर निर्भय स्थित हैं. नदियों की तरंग सुख से उठ रही है. रात्रि में न दिखाई देने वाली प्रजाएं सूर्य के प्रकाश में पूर्णतया देखी जा सकती हैं. (२) आयुर्ददं विपश्चितं श्रुतां कण्वस्य वीरुधम्. आभारिषं विश्वभेषजीमस्यादृष्टान् नि शमयत्.. (३) सौ वर्ष की आयु देने वाली, रोगशांति के उपाय जानने वाली, महर्षि कण्व द्वारा बताई गई ओषधि तथा सभी रोगों का विनाश करने वाली शमी को मैं इस रोगी का रोग मिटाने के लिए ले आया हूं. यह शमी रूप ओषधि दिखाई न देने वाले शरीर के मध्यवर्ती रोगों और राक्षस आदि को शांत करे. (३) सूक्त-५३ देवता—पृथ्वी आदि द्यौश्च म इदं पृथिवी च प्रचेतसौ शुक्नो बृहन् दक्षिणया पिपर्तु. अनु स्वधा चिकितां सोमो अग्निवायुर्नः पातु सविता भगश्च.. (१) पृथ्वी और आकाश मेरे प्रति अनुग्रह वाले बन कर मुझे मनचाहा फल दें. दीप्तिशाली और महान सूर्य दक्षिण दिशा से मेरी रक्षा करें. पितरों से संबंधित एवं स्वधा की अधिष्ठात्री देवी मुझ पर अनुग्रह करें. सोम, अग्नि, वायु सविता और भग मेरी रक्षा करें. (१) पुनः प्राणः पुनरात्मा न ऐतु पुनश्चक्षुः पुनरसूर्न ऐतु. वैश्वानरो नो अदब्धस्तनूपा अन्तस्तिष्ठाति दुरितानि विश्वा.. (२) मुख और नासिका द्वारा शरीर में प्रवेश करने वाला प्राण वायु तथा जीवात्मा हमें पुनः प्राप्त हो. चक्षु और जीवन हमें पुनः प्राप्त हों. संसारभर के मनुष्यों के हितैषी, रोग आदि से पराजित न होने वाले एवं शरीर के पालक अग्नि हमारे शरीर में स्थित रहते हैं. वे रोग के कारण होने वाले सभी पापों का विनाश करें. (२) सं वर्चसा पयसा सं तनूभिर्गन्महि मनसा सं शिवेन. त्वष्टा नो अत्र वरीयः कृणोत्वनु नो मार्ष्टु तन्वो ३ यद् विरिष्टम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५४ देवता—अग्नि, सोम
हम दीप्ति से तथा देह की स्थिति के आधार रस से युक्त हों. हम शरीर के अंगों — हाथ, पैर आदि से युक्त हों तथा शोभन मन से युक्त हों. त्वष्टा देव हमारे शरीर को शक्ति युक्त बनाएं तथा हमारे शरीर का जो रोग वाला भाग हैं, उसे अपने हाथ से शुद्ध करें. (३) सूक्त-५४ देवता—अग्नि, सोम इदं तद् युज उत्तरमिन्द्रं शुम्भाभ्यष्टये. अस्य क्षत्रं श्रियं महीं वृष्टिरिव वर्धया तृणम्.. (१) सभी देवों में श्रेष्ठ इंद्र को मैं अभीष्ट फल पाने के लिए स्तुति आदि से प्रसन्न करता हूं. हे इंद्र! अधिक वर्षा जिस प्रकार घास की वृद्धि करती है, उसी प्रकार तुम अभिचार से पीड़ित इस पुरुष के बल और पुत्र, पौत्रादि सहित धन की वृद्धि करो. (१) अस्मै क्षत्रमग्नीषोमावस्मै धारयतं रयिम्. इमं राष्ट्रस्याभीवर्गे कृणुतं युज उत्तरम्.. (२) हे अग्नि और सोम! इस यजमान में बल स्थापित करो और इसे धन प्रदान करो. तुम इस यजमान को जनपद के उच्च वर्ग का सदस्य बनाओ. इस फल को पाने के लिए मैं उत्तम यज्ञ कर्म करता हूं. (२) सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति. सर्वं तं रन्धयासि मे यजमानाय सुन्व.. (३) हे इंद्र! मेरे समान गोत्र वाला अथवा मुझ से भिन्न गोत्र वाला जो शत्रु मेरा विनाश करना चाहता है, इन दोनों प्रकार के शत्रुओं को सोम अभिषव करने वाले यजमान के वश में करो. (३) सूक्त-५५ देवता—विश्वे देव ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी संचरन्ति. तेषामज्यानिं यतमो वहाति तस्मै मा देवाः परि धत्तेह सर्वे.. (१) जिन मार्गों से केवल देव ही जाते हैं, वे बहुत से मार्ग पृथ्वी और आकाश के मध्य वर्तमान हैं. उन मार्गों में जो समृद्धि लाने वाला है, मुझे सभी देव उसी मार्ग पर स्थापित करें. (१) ग्रीष्मो हेमन्तः शिशिरो वसन्तः शरद वर्षाः स्विते नो दधात. आ नो गोषु भजता प्रजायां निवात इद् वः शरणे स्याम.. (२) ग्रीष्म, हेमंत, शिशिर, वसंत, शरद और वर्षा—इन छः ऋतुओं के अधिष्ठाता देव हमें ebook converter DEMO Watermarks*
सरलता से प्राप्त होने वाले धनों में स्थापित करें. हे ऋतुओं के अभिमानी देवो! तुम हमें गायों एवं पुत्र, पौत्र आदि से युक्त करो. हम तुम्हारे ऐसे घर में रहें, जहां सभी दुःखों के कारणों का अभाव हो. (२) इदावत्सराय परिवत्सराय संवत्सराय कृणुता बृहन्नमः. तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (३) हे मनुष्यो! इदावत्सर, परिवत्सर और संवत्सर को बारबार नमस्कार कर के प्रसन्न करो. हम यज्ञ के योग्य इदावत्सर आदि के अधिष्ठाता देवों की अनुग्रह बुद्धि में हों तथा उन की कृपा का फल प्राप्त करें. (३) सूक्त-५६ देवता—विश्वे देव, रुद्र मा नो देवा अहिवर्धीत् सतोकान्त्सहपूरुषान्. संयतं न वि ष्वरद् व्यात्तं न सं यमन्नमो देवजनेभ्यः.. (१) हे विष को शांत करने वाले देवो! सांप हमें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि की एवं सेवकों की हिंसा न करे. हमें काटने के लिए सांप का मुंह न खुले. उस का खुला हुआ मुख मंत्र शक्ति के कारण बंद न हो. सर्प विष शांत करने में समर्थ देवों को नमस्कार है. (१) नमो ऽ स्वसिताय नमस्तिरश्चिराजये. स्वजाय बभ्रवे नमो नमो देवजनेभ्यः.. (२) असित, तिरश्चिराजी, बबेरू और स्वज नामक सर्पों को नमस्कार है. सर्प के विष को शमन करने में समर्थ देवों को नमस्कार है. (२) सं ते हन्मि दता दतः समु ते हन्वा हनू. सं ते जिह्वया जिह्वां सम्वास्नाह आस्यम्.. (३) हे सांप! मैं तेरे ऊपर वाले और नीचे वाले दांतों को मिलाता हूं. मैं तेरी कौड़ी के ऊपर और नीचे वाले भागों को भी मिलाता हूं. मैं तेरी एक जीभ से दूसरी जीभ को मिलाता हूं. मैं तेरे मुख के ऊपर और नीचे वाले भागों को भी मिलाता हूं. (३) सूक्त-५७ देवता—रुद्र, भेषज इदमद् वा उ भेषजमिदं रुद्रस्य भेषजम्. येनेषुमेकतेजनां शतशल्यामपब्रवत्.. (१) यही रोग की ओषधि है और यही अंतकाल में सब को रुलाने वाले रुद्र की ओषधि है. इस एक गांठ वाली ओषधि का प्रयोग सौ कांटों वाले बांस के रूप में लक्ष्य को समीप जान ebook converter DEMO Watermarks*
कर किया था. (१) जालाषेणाभि षिञ्चत जालाषेणोप सिञ्चत. जालाषमुग्रं भेषजं तेन नो मृड जीवसे.. (२) हे परिचय करने वालो! गोमूत्र के फेन से मिले जल से घाव को धोओ. उसी जल से घाव के आसपास वाले भाग को धोओ. गोमूत्र का झाग अत्यधिक प्रभावशाली ओषधि है. इस के द्वारा हमें जीवित रहने के लिए सुखी बनाओ. (२) शं च नो मयश्च नो मा च नः किं चनाममत्. क्षमा रपो विश्वं नो अस्तु भेषजं सर्वं नो अस्तु भेषजम्.. (३) हे देव! हमारे रोग का शमन हो, हमें सुख प्राप्त हो तथा हमारी प्रजा, पशु आदि रोगग्रस्त न हों. हमारे रोग का कारण जो पाप हैं. उस का विनाश हो. समस्त यज्ञात्मक कर्म और स्थावर जंगम रूप ओषधि हमारे रोग और पाप का विनाश करने वाली हो. (३) सूक्त-५८ देवता—इंद्र आदि यशसं मेन्द्रो मघवान् कृणोतु यशसं द्यावापृथिवी उभे इमे. यशसं मा देवः सविता कृणोतु प्रियो दातुर्दक्षिणाया इह स्याम.. (१) धन के स्वामी इंद्र मुझे यशस्वी बनाएं. ये दोनों धरती और आकाश मुझे यशस्वी बनाएं. सविता देव मुझे यशस्वी बनाएं. मैं यशस्वी बन कर ग्राम, नगर आदि में दक्षिणा देने वाले का प्रिय बनूं. (१) यथेन्द्रो द्यावापृथिव्योर्यशस्वान् यथाप ओषधीषु यशस्वतीः. एवा विश्वेषु देवेषु वयं सर्वेषु यशसः स्याम.. (२) इंद्र जिस प्रकार धरती और आकाश के मध्य वर्षा करने के कारण यशस्वी हैं, जिस प्रकार जल धान, जौ आदि की वृद्धि के कारण यशस्वी हैं. उसी प्रकार हम समस्त देवों तथा मनुष्यों में यशस्वी बनें. (२) यशा इन्द्रो यशा अग्निर्यशाः सोमो अजायत. यशा विश्वस्य भूतस्याहमस्मि यशस्तमः.. (३) इंद्र, अग्नि और सोम यश की इच्छा करते हुए उत्पन्न हुए. यश का इच्छुक मैं भी समस्त प्राणियों की अपेक्षा अधिक यशस्वी बनूं. (३) सूक्त-५९ देवता—अरुंधती आदि ebook converter DEMO Watermarks*
अनडुद्भ्यस्त्वं प्रथमं धेनुभ्यस्त्वमरुन्धति. अधेनवे वयसे शर्म यच्छ चतुष्पदे.. (१) हे सहदेवी नाम की ओषधि! तुम सब से पहले गाड़ी खींचने में समर्थ मेरे बैलों को सुख दो. इस के पश्चात तुम मेरी दुधारू गायों को सुखी बनाओ. मेरी गायों के अतिरिक्त तुम पांच वर्ष की अवस्था वाले नए बैल, घोड़े आदि चौपायों को भी सुख प्रदान करो. (१) शर्म यच्छत्वोषधिः सह देवीरुरुन्धती. करत् पयस्वन्तं गोष्ठमयक्ष्माँ उत पूरुषान्.. (२) मनचाहा फल देने वाली सहदेवी नाम की ओषधि मुझे सुख दे. वह मेरी गोशाला को अधिक दूध वाला तथा मेरे पुत्र, सेवक आदि को रोग रहित करे. (२) विश्वरूपां सुभगामच्छावदामि जीवलाम्. सा नो रुद्रस्यास्तां हेतिं दूरं नयतु गोभ्यः.. (३) नाना रूपों वाली, सौभाग्य वाली एवं जीवन देने वाली सहदेवी नाम की ओषधि के सामने हो कर मैं प्रार्थना करता हूं. वह हमारे हिंसकों द्वारा हमारी ओर चलाई गई तलवार को हम से और हमारी गायों से दूर ले जाए. (३) सूक्त-६० देवता—अर्यमा अयमा यात्यर्यमा पुरस्ताद् विषितस्तपः. अस्या इच्छन्नग्रुवै पतिमुत जायामजानये.. (१) जिन की किरणें विशेष रूप से उजली हैं, वह सूर्य पूर्व दिशा में उग रहे हैं. वह इस पति रहित कन्या को पति और स्त्रीहीन पुरुष को पत्नी प्रदान करने की इच्छा से उदय हो रहे हैं. (१) अश्रमदियमर्यमन्नन्यासां समनं यती. अङ्गो न्वर्यमन्नस्या अन्याः समनमायति .. (२) हे अर्यमा देव! अन्य पतिव्रता नारियों ने पतियों को पाने के उपायों के रूप में शांति पाने के लिए जिन कर्मों को किया था, उन्हें पति की अभिलाषा करने वाली यह कन्या कर चुकी है तथा पति को प्राप्त न करने के कारण दुःखी है. अन्य स्त्रियां इस पतिकाम्या की शांति के उपाय कर रही हैं. (२) धाता दाधार पृथिवीं धाता द्यामुत सूर्यम्. धातास्या अग्रुवै पतिं दधातु प्रतिकाम्यम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-६१ देवता—रुद्र
संपूर्ण जगत् के धारणकर्ता विधाता ने इस पृथ्वी को धारण किया है. उसी ने द्युलोक को भी धारण किया है. धाता ही इस पति की कामना करने वाली कन्या को पति दें, क्योंकि वह जगत् का नियंत्रण करते हैं. (३) सूक्त-६१ देवता—रुद्र मह्यमापो मधुमदेरयन्तां मह्यं सूरो अभरज्ज्योतिषे कम्. मह्यं देवा उत विश्वे तपोजा मह्यं देवः सविता व्यचो धात्.. (१) जल के अधिष्ठाता देव अपना मधुर रस मेरे लिए लाएं. सभी के प्रेरक सूर्य ने मेरे लिए अपना सुखकारी और प्रकाशित तेज दिया है. ब्रह्म के तप से उत्पन्न सभी देव मुझे मनचाहा फल दें. (१) अहं विवेच पृथिवीमुत द्यामह्मृतूंरजनयं सप्त साकम्. अहं सत्यमनृतं यद् वदाम्यहं दैवीं परि वाचं विशश्व.. (२) मंत्र द्रष्टा अपने सर्वगत ब्रह्म भाव की खोज करता हुआ कहता है कि मैं ने विस्तृत धरती और आकाश को पृथक् किया है. मैं ने सात ऋतुओं को जन्म दिया है. सात ऋतुओं का तात्पर्य वसंत आदि छः ऋतुओं और एक अधिक मास से है. सत्य और असत्य के रूप में जो लोक प्रसिद्ध वाक्य हैं, उन्हें मैं ही बोलता हूं. दैवीय वाणी को मैं ने ही प्राप्त किया है. (२) अहं जजान पृथिवीमुत द्यामह्मृतूंरजनयं सप्त सिन्धून्. अहं सत्यमनृतं यद् वदामि यो अग्नीषोमावजुषे सखाया.. (३) मैं ने धरती और आकाश को उत्पन्न किया है. मैं ने ही छः ऋतुओं और गंगा आदि सात नदियों और सात सागरों का निर्माण किया है. मैं अग्नि और सोम को सागर के निर्माण में सहयोग के रूप में प्राप्त करता हूं. (३) सूक्त-६२ देवता—वैश्वानर आदि वैश्वानरो रश्मिभिर्नः पुनातु वातः प्राणेनेषिरो नभोभिः. द्यावापृथिवी पयसा पयस्वती ऋतावरी यज्ञिये नः पुनीताम्.. (१) सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में वर्तमान अग्नि देव मुझे पवित्र करें. शरीर के मध्य विचरण करते हुए वायु देव मुझे श्वासोच्छ्वास के द्वारा पवित्र करें. वे ही वायु देव अंतरिक्ष में गमन करते हुए मुझे नव प्रदेशों के द्वारा पवित्र करें. जल के सार रस के द्वारा सार वाले, यज्ञ पूर्ण कराने में समर्थ तथा सत्य से पूर्ण द्यावा पृथ्वी मुझे पवित्र करें. (१) वैश्वानरीं सूनृतामा रभध्वं यस्या आशास्तन्वो वीतपृष्ठाः. ebook converter DEMO Watermarks*
तया गृणन्तः सधमादेषु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (२) हे मनुष्यो! वैश्वानर अग्नि से संबंधित तथा प्रिय तत्त्व से पूर्ण स्तुति को आरंभ करो. उस वाणी का शरीर बने हुए ऊपर के भाग विस्तृत हैं. उस वैश्वानर अग्नि की स्तुति करते हुए हम संग्रामों में धन के स्वामी बनें. (२) वैश्वानरीं वर्चस आ रभध्वं शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः. इहेडया सधमादं मदन्तो ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तम्.. (३) हे मनुष्यो! तेज पाने के लिए वैश्वानर अग्नि की स्तुति आरंभ करो. हम वैश्वानर अग्नि की कृपा से शुद्ध तथा ब्रह्मवर्चस्व के द्वारा दीप्त हो कर दूसरों को भी पवित्र करें. हम अन्न से पुष्ट हो कर परस्पर प्रसन्नता के हेतु बनें तथा इस लोक में स्थित रह कर उदय होते हुए सूर्य के दर्शन करें. (३) सूक्त-६३ देवता—निर्ऋति यत् ते देवी निर्ऋतिराबबन्ध दाम ग्रीवास्वविमोक्यं यत्. तत् ते वि ष्याम्यायुषे वर्चसे बलायादोमदमन्नमद्धि प्रसूतः.. (१) हे पुरुष! अनिष्टकारिणी देवी ने तेरे सभी अंगों में पाप रूपी फंदा डाला है और तेरी गर्दन में ऐसी रस्सी बांधी है, जिस से छूटना असंभव है. मैं उस निर्ऋति रूपी फंदे से तुझे चिर काल तक जीवित रहने के लिए, बल के लिए एवं तेज के लिए छुड़ाता हूं. मेरे द्वारा छुड़ाया हुआ तू मेरी प्रेरणा से सदा अन्न का भक्षण कर. (१) नमो ऽ स्तु ते निर्ऋते तिग्मतेजो ऽ यस्मयान् वि चृता बन्धपाशान्. यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (२) हे तीक्ष्ण दीप्ति वाली एवं अनिष्टकारिणी देवी निर्ऋति! तुझे नमस्कार है. नमस्कार से प्रसन्न हो कर तू लोहे के बने बंधन के फंदों से हमें छुड़ा. हे साधक पुरुष! पाप से मुक्त होने पर यम ने तुम्हें इसी लोक को दे दिया है. मृत्यु के देव उन यम को नमस्कार है. (२) अयस्मये द्रुपदे बेधिष इहाभिहितो मृत्युभिर्ये सहस्रम्. यमेन त्वं पितृभिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (३) हे निर्ऋति! लोहे की श्रृंखलाओं में अथवा लकड़ी के बने चरण बंधन में जब तुम किसी पुरुष को बांधती हो, तब वह इस लोक में मृत्यु के द्वारा बंधा हो जाता है. प्रसिद्ध ज्वर आदि रोग और राक्षस, पिशाच आदि मृत्यु के हजारों कारण हैं. हे निर्ऋति! तुम मृत्यु देव यम से और देवता, पितर आदि से तालमेल कर के इस पुरुष को उत्तम सुख प्रदान करो. (३) संसमिद् युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-६४ देवता—सौमनस्य
इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर.. (४) हे अभिलाषाएं पूर्ण करने वाले अग्नि देव! तुम समस्त प्रकार के धन प्राप्त कराते हो. तुम यज्ञवेदी में प्रज्वलित होते हो. तुम हमें धन दो. (४) सूक्त-६४ देवता—सौमनस्य सं जानीध्वं सं पृच्यध्वं सं वो मनांसि जानताम्. देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते.. (१) हे सौमनस्य के इच्छुक जनो! तुम समान ज्ञान वाले बनो और समान कार्य में संलग्न हो जाओ. ज्ञान की उत्पत्ति के निमित्त तुम्हारे अंतःकरण समान हों. इंद्र आदि देव जिस प्रकार एक ही कार्य को जानते हुए यजमानों द्वारा दिए गए हवि को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी विरोध त्याग कर इच्छित फल पाओ. (१) समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं व्रतं सह चित्तमेषाम्. समानेन वो हविषा जुहोमि समानं चेतो अभिसंविशध्वम्.. (२) हमारा गुप्त भाषण एकरूप हो. हमारे कार्यों में प्रवृत्ति समान हो. हमारा कर्म भी एकरूप हो तथा हमारा अंतःकरण भी इसी प्रकार का हो. उक्त फल पाने के लिए हे देवो! हम एकता उत्पन्न करने वाले आज्य आदि से आप के निमित्त हवन करें. इस से आप सब एकचित्तता को प्राप्त करो. (२) समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः. समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति.. (३) हे सौमनस्य चाहने वालो! तुम्हारा संकल्प समान हो. तुम्हारे संकल्पों को उत्पन्न करने वाले हृदय समान हों. तुम्हारा मन एकरूप हो, जिस से तुम सब सभी कार्य ठीक से कर सको. (३) सूक्त-६५ देवता—इंद्र अव मन्युरवायताव बाहू मनोयुजा. पराशर त्वं तेषां पराज्चं शुष्ममर्दयाधा नो रयिमा कृधि.. (१) हमारे शत्रु का क्रोध शांत हो तथा उस का तिरस्कार नष्ट हो. उस के द्वारा ताने गए आयुध विफल हों. हमारे शत्रुओं की भुजाएं आयुध उठाने में असमर्थ हों. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम उन शत्रुओं के बल को विमुख करो. इस के पश्चात उन शत्रुओं का धन हमारे समीप लाओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
निर्हस्तेभ्यो नैर्हस्तं यं देवाः शरुमस्यथ. वृश्चामि शत्रूणां बाहूननेन हविषाऽहम्.. (२) हे देवो! असुरों का बाहुबल समाप्त करने के लिए तुम जो हिंसक बाण चलाते हो, मैं उस बाण रूप देवता को दिए जाने वाले हवि से अपने शत्रु की भुजाओं को काटता हूं. (२) इन्द्रश्चकार प्रथमं नैर्हस्तमसुरेभ्यः. जयन्तु सत्वानो मम स्थिरेणेन्द्रेण मेदिना.. (३) इंद्र ने सब से पहले अपने शत्रु असुरों को भुजबल विहीन किया था. युद्ध में दृढ़ एवं हमारे सहायक इंद्र की सहायता से मेरे योद्धा शत्रुओं को पराजित करें. (३) सूक्त-६६ देवता—इंद्र निर्हस्तः शत्रुरभिदासन्नस्तु ये सेनाभिर्युधमायन्त्यस्मान्. समर्पयेन्द्र महता वधेन द्रात्वेषामघहारो विविद्धः.. (१) हमें पीड़ित करने वाला शत्रु हाथों की शक्ति से हीन हो जाए. हे इंद्र! जो शत्रु अपनी सेनाओं की सहायता से हमें युद्ध के लिए ललकारते हैं, उन्हें अपने हनन साधन विशाल वज्र से संयुक्त करो. इन शूरों में जो मुझे मृत्यु रूपी दुःख पहुंचाने वाला है, वह अधिक घायल हो कर बुरी दशा को प्राप्त हो. (१) आतन्वाना आयच्छन्तो ऽ स्यन्तो ये च धावथ. निर्हस्ताः शत्रवः स्थनेन्द्रो वो ऽ द्य पराशरीत्.. (२) हे शत्रुओ! तुम धनुष पर डोरी चढ़ाते हुए, धनुष को खींचते हुए और बाण फेंकते हुए हमारे सामने आ रहे हो. तुम सब अशक्त हाथों वाले बन जाओ. आज इंद्र तुम्हें आहत करें. (२) निर्हस्ताः सन्तु शत्रवो ऽ ङ्गैषा म्लापयामसि. अथैषामिन्द्र वेदांसि शतशो वि भजामहै.. (३) हमारे शत्रु हाथों की शक्ति से हीन हों. हम उन के अंगों को हर्ष रहित करेंगे. हे इंद्र! इस के पश्चात हम तुम्हारी कृपा से उन शत्रुओं के धनों को विभाजित कर के प्राप्त करें. (३) सूक्त-६७ देवता—इंद्र परि वर्त्मानि सर्वत इन्द्रः पूषा च सस्रतुः. मुह्यन्त्वद्य ऽ मूः सेना अमित्राणां परस्तराम्.. (१)
इंद्र और उषा — ये दोनों देव सभी दिशाओं के संचरण मार्गों को रोक दें. इस समय दूर दिखाई देने वाली शत्रु सेनाएं अत्यधिक मोह में पड़ जाएं और उन में कार्याकार्य का निर्णय करने की क्षमता न रहे. (१) मूढा अमित्राश्चरताशीर्षाण इवाहयः. तेषां वो अग्निमूढानामिन्द्रो हन्तु वरंवरम्.. (२) हे शत्रुओ! कटे हुए शीश वाले सांप जिस प्रकार हिलतेडुलते हैं, कुछ कर नहीं पाते, उसी प्रकार तुम जय के उपाय से शून्य हो कर युद्धभूमि में घूमो. हमारी आहुतियों के कारण मोह को प्राप्त उन शत्रुओं का वध श्रेष्ठ नायक इंद्र करें. (२) ऐषु नह्य वृषाजिनं हरिणस्य भियं कृधि. पराङमित्र एषत्वर्वाची गौरुपेषतु.. (३) हे इच्छा पूर्ण करने वाले इंद्र! तुम सोम मणि को ढकने वाले कृष्ण मृग-चर्म को हमारे योद्धाओं में बांधो. हमारे शत्रु हमारे सामने से भाग जाएं तथा उन शत्रुओं का पशु धन हमें प्राप्त हो. (३) सूक्त-६८ देवता—सविता आदि आयमगन्त्सविता क्षुरेणोष्णेन वाय उदकेनेहि. आदित्या रुद्रा वसव उन्दन्तु सचेतसः सोमस्य राज्ञो वपत प्रचेतसः.. (१) आकाश में दिखाई देते हुए सब के प्रेरक सविता देव मुंडन करने वाले उस्तरे के साथ आए हैं. हे वायु! गरम जल के साथ तुम भी आओ. बारह आदित्य, एकादश रुद्र तथा आठ वसु—ये सब समान ज्ञान वाले हो कर उस जल से बालक का सिर गीला करें. हे सेवको! तुम वरुण और राजा सोम से संबंधित उस्तरे के द्वारा गीले बालों को काटो. (१) अदितिः श्मश्रु वप्त्वाप उन्दन्तु वर्चसा. चिकित्सतु प्रजापतिर्दीर्घायुत्वाय चक्षसे.. (२) देव माता अदिति इस पुरुष के दाढ़ीमूंछ के बाल अलग करें. जल के देवता अपने तेज से उन्हें भिगोएं. प्रजापति चिरकाल तक जीवन के लिए एवं देखने के लिए इस की चिकित्सा करें. (२) येनावपत् सविता क्षुरेण सोमस्य राज्ञो वरुणस्य विद्वान्. तेन ब्रह्माणो वपतेदमस्य गोमानश्ववानयमस्तु प्रजावान्.. (३) सविता देव ने जानते हुए जिस उस्तरे से सोम के और राजा वरुण के बालों को काटा, हे ब्राह्मणो! तुम उसी उस्तरे से इस पुरुष की दाढ़ी और मूंछों के बाल काटो. इस विशेष संस्कार
सूक्त-६९ देवता—बृहस्पति
से यह पुरुष अनेक गायों, घोड़ों और प्रजाओं से युक्त हो. (३) सूक्त-६९ देवता—बृहस्पति गिरावरागरार्टेषु हिरण्ये गोषु यद् यशः. सुरायां सिच्यमानायां कीलाले मधु तन्मयि.. (१) हिमालय पर्वत में जो यश है, रथ में बैठ कर चलने वाले राजाओं में, स्वर्ण में और गायों में जो यश है, वह मुझे प्राप्त हो. पात्रों में ढाली जाती हुई मदिरा में और अन्न में जो मधुर रस रूपी यश है, वह मुझे प्राप्त हो. (१) अश्विना सारघेण मा मधुनाङ्क्तं शुभस्पती. यथा भर्गस्वतीं वाचमावदानि जनाँ अनु.. (२) हे सुंदर सूर्या के पति अश्विनीकुमारो! मुझे मधुमक्खियों द्वारा एकत्र किए गए मधु से सींचो, जिस से मैं मनुष्यों को लक्ष्य कर के, मधुर वाणी बोलूं. (२) मयि वर्चो अथो यशो ऽ थो यज्ञस्य यत् पयः. तन्मयि प्रजापतिर्दिवि द्यामिव दृंहतु.. (३) प्रजापति जिस प्रकार अंतरिक्ष में ज्योतिमंडल को दृढ़ करते हैं, उसी प्रकार मुझ यजमान में तेज, यश और यज्ञ का फल धारण करें. (३) सूक्त-७० देवता—संध्या यथा मांसं यथा सुरा यथाक्षा अधिदेवने. यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः. एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (१) मांसभक्षी को मांस, शराबी को शराब और जुआरी को पासे जिस प्रकार प्रिय होते हैं तथा जिस प्रकार सुरत चाहने वाले पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा मन तेरे बछड़े में लगा रहे. (१) यथा हस्ती हस्तिन्याः पदेन पदमुद्युजे. यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः. एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (२) हाथी जिस प्रकार अपने पैर से प्रेम के साथ हथिनी का पैर मोड़ता है तथा जिस प्रकार सुरत के इच्छुक पुरुष का मन स्त्री में लगा रहता है, हे गौ! उसी प्रकार तेरा मन तेरे बछड़े में लगा रहे. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
यथा प्रधिर्यथोपधिर्यथा नभ्यं प्रधावधि. यथा पुंसो वृषण्यत स्त्रियां निहन्यते मनः. एवा ते अघ्न्ये मनो ऽ धि वत्से नि हन्यताम्.. (३) हे गौ! जिस प्रकार रथ के पहिए की नेमि अरों से संबंधित रहती है और सुरत के इच्छुक पुरुष का मन जिस प्रकार नारी में लगा रहता है, उसी प्रकार तेरा मन अपने बछड़े में लगा रहे. (३) सूक्त-७१ देवता—विश्वे देव, अग्नि यदन्नमद्मि बहुधा विरूपं हिरण्यमश्वमुत गामजामविम्. यदेव किं च प्रतिजग्रहाहमग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (१) भूख की पीड़ा के वशीभूत हो कर मैं विविध प्रकार का जो अन्न अनेक प्रकार से खाता हूं, अन्न के अतिरिक्त मैं दरिद्रता के कारण जो सोना, घोड़े और गाएं ग्रहण करता हूं, मुझ यजमान को वह सब अन्न, सोना आदि अग्नि देव भली प्रकार हवन किया हुआ बनाएं. (१) यन्मा हुतमहुतमाजगाम दत्तं पितृभिरनुमतं मनुष्यैः. यस्मान्मे मन उदिव रारजीत्यग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (२) होम के द्वारा संस्कार वाला और इस से विपरीत जो धन मुझे प्राप्त हुआ है, वह पितृ देवों द्वारा मुझे उपभोग के लिए दिया गया है. मनुष्यों ने उस के उपभोग की अनुमति दी है. जिस धन के कारण मेरा मन हर्ष की अधिकता से उद्दीप्त रहता है, अग्नि देव की कृपा से वह धन मुझ यजमान के लिए दोषरहित हो. (२) यदन्नमद्म्यनृतेन देवा दास्यन्नदास्यन्नुत संगृणामि. वैश्वानरस्य महतो महिम्ना शिवं मह्यं मधुमदस्त्वन्नम्.. (३) हे देवो! असत्य भाषण के द्वारा दूसरों का जो अन्न अपहरण कर के मैं खाता हूं, उसे मैं अन्न के मालिक को चाहे देता रहा हूं अथवा नहीं देता रहा हूं, पर मैं उसे देने की प्रतिज्ञा करता हूं. वैश्वानर देव की अत्यधिक महिमा से वह अन्न मेरे लिए सुखकर और मधुर हो. (३) सूक्त-७२ देवता—शेप, अर्क यथासितः प्रथयते वशाँ अनु वपूंषि कृण्वन्नसुरस्य मायया. एवा ते शेपः सहसायमर्को ऽ ज्ञेनाङ्गं संसमकं कृणोतु.. (१) जैसे बंधा हुआ पुरुष अपने वशवर्ती पुरुषों को लक्षित कर के आसुरी माया के द्वारा अपने शरीरों को प्रसारित करता है, उसी प्रकार अकौआ के वृक्ष से बनी यह ओषधि अर्थात् ebook converter DEMO Watermarks*
अर्कमणि तेरे प्रजनन अंग अर्थात् लिंग को स्त्री के उपभोग के योग्य बनाए. (१) यथा पसस्तायादरं वातेन स्थूलभं कृतम्. यावत् परस्वतः पसस्तावत् ते वर्धतां पसः.. (२) हे साधक! जिस प्रकार तायादर नाम के प्राणी का प्रजनन अंग अर्थात् लिंग वायु लगने से मोटा हो जाता है और जैसा परस्वर नाम के प्राणी का लिंग होता है, तेरा लिंग भी बढ़ कर उसी परिमाण का हो जाए. (२) यावदङ्गीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत्. यावदश्वस्य वाजिनस्तावत् ते वर्धतां पसः.. (३) हे साधक पुरुष! पारस्वत नामक हरिण की, हाथी की, गधे की जननेंद्रिय जिस प्रकार की होती है तथा यौवन में स्थित घोड़े की जननेंद्रिय जैसी होती है, तेरी पुरुषेंद्रिय भी उसी परिमाण में बढ़ जाए. (३) सूक्त-७३ देवता—वरुण एह यातु वरुणः सोमो अग्निबृहस्पतिर्वसुभिरेह यातु. अस्य श्रियमुपसंयात सर्व उग्रस्य चेत्तुः संमनसः सजाताः.. (१) वरुण, सोम एवं अग्नि देव कर्म के निमित्त यहां आएं. बृहस्पति देव आठ वसुओं के साथ यहां आएं. हे समान जन्म वाले बांधवो! तुम सब समान मन वाले हो कर इस शक्तिशाली एवं कार्याकार्य जानने वाले यजमान के अधीन हो जाओ. (१) यो वः शुष्मो हृदयेष्वन्तराकूतिर्या वो मनसि प्रविष्टा. तान्तसीवयामि हविषा घृतेन मयि सजाता रमतिर्वो अस्तु.. (२) हे बांधवो! तुम्हारे हृदयों में जो शीर्षक बल है और तुम्हारे मन में जो सब कुछ प्राप्त करने की अभिलाषा है, मैं हवन किए जाते हुए इस हवि के द्वारा बल और उस अभिलाषा को परस्पर संबंधित करता हूं. तुम्हारी अनुकूल प्रवृत्ति मुझ सौमनस्य के इच्छुक पुरुष को प्राप्त हो. (२) इहैव स्त माप याताध्यस्मत् पूषा परस्तादपथं वः कृणोतु. वास्तोष्पतिरनु वो जोहवीतु मयि सजाता रमतिर्वो अस्तु.. (३) हे बांधवो! आप मेरे घर में प्रेम से निवास करें तथा यहां से कहीं न जाएं. यदि तुम मेरे प्रतिकूल आचरण करो तो सविता देव तुम्हारा मार्ग रोकें. घरों के पालक देव वाष्तोस्पति तुम्हें मेरे लिए बुलाएं. सौमनस्य के इच्छुक मुझ यजमान के प्रति तुम्हारी अनुकूल प्रवृत्ति हो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-७४ देवता—ब्रह्मणस्पति सं वः पृच्यन्तां तन्व १ः सं मनांसि समु व्रता. सं वो ऽ यं ब्रह्मणस्पतिर्भगः सं वो अजीगमत्.. (१) हे सौमनस्य के इच्छुक पुरुषो! तुम्हारे शरीर परस्पर के अनुराग से बंधें तथा हृदय भी एकदूसरे के समीप आएं. तुम्हारे कृषि, वाणिज्य आदि कर्म भी सामंजस्य पूर्ण रहें. ब्रह्मणस्पति देव तुम्हें संगत हृदय वाला बनाएं तथा भग नामक देव तुम्हें परस्पर तालमेल वाला करें. (१) संज्ञपनं वो मनसो ऽ थो संज्ञपनं हृदः. अथो भगस्य यच्छ्रान्तं तेन संज्ञपयामि वः.. (२) हे सौमनस्य चाहने वाले पुरुषो! मैं ऐसा यज्ञ कर्म करता हूं, जिस से तुम्हारा मन उचित ज्ञान से पूर्ण हो. भग नाम के देव का जो श्रम से उत्पन्न तप है, उस के द्वारा मैं तुम्हें समान ज्ञान वाला बनाता हूं. (२) यथादित्या वसुभिः संबभूवुर्मरुद्भिरुग्रा अहृणीयमानाः. एवा त्रिणामन्नहृणीयमान इमान्जनान्संमनसस्कृधीह.. (३) जिस प्रकार अदिति के पुत्र मित्र, वरुण आदि आठ वसुओं के साथ समान ज्ञान वाले हुए, जिस प्रकार उनचास मरुतों के साथ उग्र एवं बलशाली रुद्र क्रोध करते हुए समान ज्ञान वाले हुए, हे तीन नामों अर्थात् पार्थिव, विद्युत और सूर्य अग्नि! तुम क्रोध न करते हुए इन जनों को समान ज्ञान वाला बनाओ. (३) सूक्त-७५ देवता—इंद्र निरमुं नुद ओकसः सपत्नो यः पृतन्यति. नैरबाध्येन हविषेन्द्र एनं पराशरीत्.. (१) जो शत्रु सेना ले कर हम से युद्ध करने आता है, हम उसे अपने निवास स्थान से निकालते हैं. हमारे शत्रुओं को मारने में समर्थ हवि के द्वारा इंद्र इस शत्रु की हिंसा करें, जिस से यह लौट कर न आए. (१) परमां तं परावतमिन्द्रो नुदतु वृत्रहा. यतो न पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (२) वृत्रासुर का वध करने वाले इंद्र उस शत्रु को अत्यधिक दूर देश में जाने की प्रेरणा दें. वह बहुत वर्षों तक वापस न आए. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
एतु तिस्रः परावत एतु पञ्च जनाँ अति. एतु तिस्रो ऽ ति रोचना यतो न पुनरायति शश्वतीभ्यः समाभ्यो यावत् सूर्यो असद् दिवि.. (३) इंद्र के द्वारा प्रेरित हमारा शत्रु तीनों भूमियों और निषाद आदि पांच जनों को पार कर के दूर वहां चला जाए, जहां से वापस न आए. जब तक सूर्य आकाश में रहे, तब तक वह अनेक वर्षों तक न लौटे. (३) सूक्त-७६ देवता—सायंतन अग्नि य एनं परिषीदन्ति समादधति चक्षसे. संप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभिरुदेतु हृदयादधि.. (१) जो राक्षस आदि इस के चारों ओर बैठते हैं तथा हिंसा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं, उन के हृदय से उत्पन्न प्रज्वलित अग्नि उन्हें जला दे. (१) अग्नेः सांतपनस्याहमायुषे पदमा रभे. अद्धातिर्यस्य पश्यति धूममुद्यन्तमास्यतः.. (२) अधिक तपन वाले उन अग्नि देव के जीवन के लिए मैं उपक्रम करता हूं, जिन के मुख से निकलते हुए धूम को अद्धाति नाम के ऋषि देखते हैं. (२) यो अस्य समिधं वेद क्षत्रियेण समाहिताम्. नाभिह्वारे पदं नि दधाति स मृत्यवे.. (३) विजय के इच्छुक क्षत्रिय जाति के पुरुष के द्वारा स्थापित अग्नि और दीप्त करने वाली आहुतियों को जो पुरुष जानता है, वह मृत्यु का कारण बनने वाले ऐसे स्थान में पैर नहीं रखता है, जहां हाथी, बाघ आदि घूमते हैं. (३) नैनं घ्नन्ति पर्यायिणो न सन्नां अव गच्छति. अग्नेर्यः क्षत्रियो विद्वाङ्नाम गृह्णात्यायुषे.. (४) कल्याण की कामना करने वाले को शत्रु नहीं मार पाते. वह अपने समीपवर्ती शत्रुओं को भी नहीं जानता. जो क्षत्रिय इस प्रकार से महात्मा अग्नि को जानता हुआ, अग्नि का नाम चिरकाल तक जीवित रहने के लिए उच्चारण करता है, शत्रु उस का वध नहीं कर पाते. (४) सूक्त-७७ देवता—जातवेद अस्थाद् द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थाद् विश्वमिदं जगत्. आस्थाने पर्वता अस्थ्यु स्थाम्न्यश्वां अतिष्ठिपम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
नियंता ईश्वर की आज्ञा से जिस प्रकार आकाश और पृथ्वी अपने स्थान पर स्थित हैं, उन के मध्य में स्थित जगत् भी अपने स्थान पर वर्तमान है. मेरु, मंदार आदि पर्वत भी ईश्वर के द्वारा बनाए गए स्थान पर स्थित हैं. हे नारी! उसी प्रकार मैं तुझे घर की थूनी से बांधता हूं. बांधने का प्रकार वही है, जिस प्रकार घुड़सवार दुष्ट घोड़ों को रस्सी से बांधता है. (१) य उदानट् परायणं य उदान्ण्यायनम्. आवर्तनं निवर्तनं यो गोपा अपि तं हुवे.. (२) मैं उस देवता का आह्वान करता हूं, जो पीछे गमन करने वालों में व्याप्त है. जो नीचे गमन करने वालों में व्याप्त है और जो भागने वालों के लौटने की गति को रोकता है. (२) जातवेदो नि वर्तय शतं ते सन्त्वावृतः. सहस्रं त उपावृत्तस्ताभिर्नः पुनरा कृधि.. (३) हे जातवेद अग्नि! इस भागने वाली स्त्री को घर में स्थापित करो. तुम्हारे पास इसे लौटाने के सैकड़ों उपाय हैं. तुम इसे मेरे पास लौटाने के लिए हजारों उपाय जानते हो. उन के द्वारा तुम इस स्त्री को पुनः मेरी ओर आकर्षित करो. (३) सूक्त-७८ देवता—चंद्रमा तेन भूतेन हविषा ऽ यमा प्यायतां पुनः. जायां यामस्मा आवाक्षुस्तां रसेनाभि वर्धताम्.. (१) प्रसिद्ध एवं समृद्धि करने वाले हवि से यह पति पुनः प्रजा और पशु आदि से समृद्ध हो. विवाह करने वाले पिता आदि जिस पत्नी को इस के समीप लाए थे, उस पत्नी की दधि, मधु, घृत आदि से हवन किए जाते हुए अग्नि देव वृद्धि करें. (१) अभि वर्धतां पयसा ऽ भि राष्ट्रेण वर्धताम्. रय्या सहस्रवर्चसेमौ स्तामनुपक्षितौ.. (२) यह वर एवं वधू गायों के दूध से समृद्ध हों. इन्हें गायों आदि की समृद्धि प्राप्त हो. ये पतिपत्नी असीमित तेज और धन के द्वारा पूर्ण काम बनें. (२) त्वष्टा जायामजनयत् त्वष्टा ऽ स्यै त्वां पतिम्. त्वष्टा सहस्रमायूंषि दीर्घमायुः कृणोतु वाम्.. (३) हे वर! त्वष्टा देव ने स्त्री को जन्म दिया एवं त्वष्टा ने ही तुम्हें इस स्त्री का पति बनाया है. त्वष्टा देव तुम दोनों अर्थात् पतिपत्नी की हजार वर्षों की दीर्घ आयु प्रदान करें. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-७९ देवता—संस्फान
सूक्त-७९ देवता—संस्फान अयं नो नभसस्पतिः संस्फानो अभि रक्षतु. असमातिं गृहेषु नः.. (१) हवि प्रदान करने के कारण आकाश के पालन कर्ता अग्नि धान्य की वृद्धि करते हुए हमारी रक्षा करें एवं हमारे घरों की कुठिया को कभी धान्य से रहित न बनाएं. (१) त्वं नो नभसस्पत ऊर्जं गृहेषु धारय. आ पुष्टमेत्वा वसु.. (२) हे अंतरिक्ष के पालन कर्ता अग्नि! तुम हमारे घरों में रस वाले अन्न को स्थापित करो. प्रजा, पशु एवं धन हमारे पास आएं. (२) देव संस्फान सहस्रापोषस्येशिषे. तस्य नो रास्व तस्य नो धेहि तस्य ते भक्तिवांसः स्याम.. (३) हे दानादिगुण युक्त एवं प्रजापालन में प्रवृत्त आदित्य, तुम हजार संख्या वाली प्रजाओं का पोषण करने वाले धनों के स्वामी हो. तुम उसी प्रकार का धन हमें प्रदान करो तथा उस धन का भाग हमें भोग करने के लिए दो. तुम्हारी कृपा से हम उस धन के स्वामी बनें. (३) सूक्त-८० देवता—चंद्रमा अन्तरिक्षेण पतति विश्वा भूतावचाकशत्. शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (१) कौआ, कबूतर आदि घात करने की इच्छा से बारबार देखते हुए इस पुरुष के शरीर पर गिरते हैं. हे अग्नि! इस दोष को शांत करने के लिए हम स्वर्ग में रहने वाले श्वान के तेज की हवि से तुम्हारी सेवा करते हैं. (१) ये त्रयः कालकाञ्जा दिवि देवा इव श्रिताः. तान्तसर्वान्ह्व ऊतये ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (२) कालकांज नाम के जो तीन असुर उत्तम कर्मों के कारण देवों के समान स्वर्ग में वर्तमान हैं, मैं इस पुरुष की रक्षा के लिए तथा कौए, कबूतर आदि पक्षियों के आघात संबंधी दोष की भीति के निमित्त सभी कालकांज असुरों का आह्वान करता हूं. (२) अप्सु ते जन्म दिवि ते सधस्थं समुद्रे अन्तर्महिमा ते पृथिव्याम्. शुनो दिव्यस्य यन्महस्तेना ते हविषा विधेम.. (३) हे अग्नि, वाडवाग्नि के रूप में तुम्हारा जन्म सागर में हुआ था तथा सूर्य के रूप में तुम्हारी स्थिति आकाश में रही है. सागर और धरती के मध्य तुम्हारी महिमा देखी जाती है. हे ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८१ देवता—आदित्य
अग्नि! हम हवि के द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (३) सूक्त-८१ देवता—आदित्य यन्ता ऽ सि यच्छसे हस्तावेप रक्षांसि सेधसि. प्रजां धनं च गृह्णानः परिहस्तो अभूदयम्.. (१) हे अग्नि! तुम गर्भ को नष्ट करने वाले राक्षस आदि को वश में करने में समर्थ हो, इसीलिए अपने दोनों हाथ फैलाओ तथा उन के द्वारा गर्भ का नाश करने वाले राक्षसों का विनाश करो. पुत्र आदि रूप प्रजा और उन के भोग के लिए धन प्रदान करते हुए अग्नि अपने हाथ फैला कर रक्षा करें. (१) परिहस्त वि धारय योनिं गर्भाय धातवे. मय्यिदि पुत्रमा धेहि तं त्वमा गमयागमे.. (२) हे कंकण! तुम गर्भ धारण करने के लिए गर्भाशय को विस्तृत करो. हे पत्नी! तुम अपने गर्भाशय में पुत्र को धारण करो तथा पति के आगमन पर मेरे मनचाहे पुत्र को जन्म दो. (२) यं परिहस्तमबिभरदितिः पुत्रकाम्या. त्वष्टा तमस्या आ बध्नाद् यथा पुत्रं जनादिति.. (३) पुत्र की इच्छा से देवता अदिति ने जिस कंकण को धारण किया, वही कंकण त्वष्टा देव मेरी इस पत्नी के हाथ में बांधें, जिस से यह पुत्र को जन्म दे सके. (३) सूक्त-८२ देवता—इंद्र आगच्छत आगतस्य नाम गृह्णाम्यायत:. इन्द्रस्य वृत्रघ्नो वन्वे वासवस्य शतक्रतो:.. (१) मैं अपने समीप आए हुए इंद्र को प्रसन्न करने वाले नाम वृत्र हंता का उच्चारण करता हूं. विवाह की इच्छा वाला मैं वृत्र का वध करने वाले, वसुओं द्वारा उपासना किए गए और शक्ति की प्रसिद्धि करने वाले सौ कर्मों के स्वामी इंद्र की उपासना अभिमत फल को पाने के लिए करता हूं. (१) येन सूर्या सावित्रीमश्विनोहतुः पथा. तेन मामब्रवीद् भगो जायामा वहतादिति.. (२) जिस प्रकार अश्विनीकुमारो ने सविता की पुत्री सूर्या से विवाह किया, उसी प्रकार से भग ने मुझ से कहा कि पत्नी ले आओ. (२) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय
यस्ते ऽ ङ्कुशो वसुदानो बृहन्निन्द्र हिरण्ययः. तेना जनीयते जायां मह्यं धेहि शचीपते.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा जो हाथ आकर्षक धन धारण करने वाला एवं स्वर्ण से युक्त हैं. हे शची के पति! उसी हाथ से पत्नी के इच्छुक मुझ को पत्नी प्रदान करो. (३) सूक्त-८३ देवता—सूर्योदय अपचितः प्र पतत सुपर्णो वसतेरिव. सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो ऽ पोच्छतु.. (१) हे गंडमालाओ! जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास स्थान से उड़ता है, उसी प्रकार तुम मेरे शरीर से निकल जाओ. सूर्य मेरी चिकित्सा करें और चंद्रमा मेरे शरीर से तुम्हें दूर करें. (१) अन्यैका श्येन्येका कृष्णैका रोहिणी द्वे. सर्वासामग्रभं नामावीरघ्नीरपेतन.. (२) एक गंडमाला लाल रंग की, दूसरी श्वेत वर्ण की तथा तीसरी काले रंग की है. इन के अतिरिक्त दो गंडमालाएं लाल रंग की हैं. मैं इन सब को प्रसन्न करने वाले नाम का उच्चारण करता हूं. इस से प्रसन्न हो कर तुम इस पुरुष को त्याग कर अन्यत्र चली जाओ. (२) असूतिकारामण्यपचित् प्र पतिष्यति. ग्लौरितः प्र पतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति.. (३) पीब बहाने वाली तथा घाव के रूप वाली गंडमाला इस पुरुष के शरीर से दूर जाएगी. इस के घाव के कारण होने वाला दुःख नष्ट हो जाएगा तथा चंद्रमा गंडमालाओं की पीड़ा को शेष नहीं रखेगा. (३) वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि.. (४) हे घाव रोग के अभिमानी देव! तुम अपनी आहुति का भक्षण करो. सेवा किए जाते हुए तुम आहुति का भक्षण करो. मैं भी मन से यह हवि देता हूं. (४) सूक्त-८४ देवता—निर्ऋति यस्यास्त आसनि घोरे जुहोम्येषां बद्धानामवसर्जनाय कम्. भूमिरिति त्वाभिप्रमन्वते जना निर्ऋतिरिति त्वाहं परि वेद सर्वतः.. (१) हे रोगाभिमानिनी पाप की देवी! घाव के रोगों से उत्पन्न बंधनों से छूटने के लिए मैं ebook converter DEMO Watermarks*