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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

द्यावा चिदस्मै पृथिवी नमेते शुष्माच्चिदस्य पर्वता भयन्ते.

जो जलों की वर्षा करते हैं, जो कामनाओं को पूर्ण करते हैं, जो सात रश्मियों वाले सूर्य के रूप में स्थित हैं, जिन्होंने वज्र ग्रहण कर के आकाश पर चढ़ते हुए शंबर असुर का वध किया था तथा जिन्होंने सात नदियों को उत्पन्न किया, वे इंद्र हैं. (१३) द्यावा चिदस्मै पृथिवी नमेते शुष्माच्चिदस्य पर्वता भयन्ते. यः सोमपा निचतो वज्रबाहुर्यो वज्रहस्तः स जनास इन्द्रः.. (१४) जिन के सामने आकाश और पृथ्वी झुकते हैं, जिन के भय से पर्वत भी कांपते हैं, जो सोमपान करने के कारण दृढ़ शरीर और शक्तिशाली भुजाओं वाले हैं तथा जो वज्र को धारण करते हैं, वे इंद्र हैं. (१४) यः सुन्वन्तमवति यः पचन्तं यः शंसन्तं यः शशमानमूती. यस्य ब्रह्म वर्धनं यस्य सोमो यस्येदं राधः स जनास इन्द्रः.. (१५) हे मनुष्यो! जो सोमरस निचोड़ने वाले की, चमकाने वालों की तथा स्तुतियां करने वाले की रक्षा करते हैं, सोमरस जिसके बल, ज्ञान और यश को बढ़ाता है, वे ही इंद्र है. (१५) जातो व्यख्यत् पित्रोरुपस्थे भुवो न वेद जनितुः परस्य. स्तविष्यमाणो नो यो अस्मद् व्रता देवानां स जनास इन्द्रः.. (१६) हे मनुष्यो! जो इंद्र जन्म लेते ही द्यावा पृथ्वी अर्थात् स्वर्ग और धरती की गोद में प्रकाशित हुए, जो अपनी मां रूपी पृथ्वी और पिता रूपी आकाश को नहीं जानते तथा हमारे द्वारा स्तुति किए जाते हुए देव संबंधी कर्म अर्थात् यज्ञ को पूर्ण करते हैं, वे ही इंद्र हैं. (१६) यः सोमकामो हर्यश्वः सूरिर्यस्माद् रेजन्ते भुवनानि विश्वा. यो जघान शम्बरं यश्च शुष्णं य एकवीरः स जनास इन्द्रः.. (१७) हे मनुष्यो! सोमरस की कामना करते हुए जो इंद्र अपने हरि नाम के घोड़ों को चलने के लिए प्रेरित करते हैं तथा जिन्होंने शंबर और शुष्ण नाम के असुरों को मारा, एकमात्र वे ही इंद्र हैं. (१७) यः सुन्वते पचते दुध्र आ चिद् वाजं दर्दर्षि स किलासि सत्यः. वयं त इन्द्र विश्वह प्रियासः सुवीरासो विदथमा वदेम.. (१८) हे मनुष्यो! जो इंद्र सोमरस निचोड़ने वाले तथा चरु पकाने वाले को यथेष्ट अन्न देते हैं तथा जो निश्चित रूप से सत्य हैं, हम सभी ऐसे इंद्र के प्रिय होते हुए उत्तम वीरों के स्वामी बनें. (१८) सूक्त-३५ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोमं माहिनाय. ऋचीषमायाधिग्व ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा.. (१) मैं इंद्र को प्राप्त होने वाले स्तोत्र का भलीभांति उच्चारण करता हूं. इंद्र बलवान, सोमपान के लिए शीघ्रता करने वाले तथा गुणों से महान हैं. इंद्र स्तुतियों के समान हैं और उन का सर्वत्र गमन है. जिस प्रकार भूखे को अन्न प्रेरणा देता है, उसी प्रकार स्तुतियों की इच्छा करने वाले इंद्र की मैं स्तुतियां करता हूं. मैं इंद्र के लिए पूर्व यजमानों के द्वारा दिए सोमरस आदि हवि प्रस्तुत करता हूं. (१) अस्मा इदु प्रय इव प्र यंसि भराम्याङ्गूषं बाधे सुवृक्ति. इन्द्राय हृदा मनसा मनीषा प्रत्नाय पत्ये धियो मर्जयन्त.. (२) मैं इंद्र के लिए अन्न के समान अपना स्तोत्र अर्पित करता हूं. मैं अपने शत्रुओं को बाधा पहुंचाने के लिए स्तोत्र रूपी घोष करता हूं. अन्य ऋत्विज् भी सब के स्वामी इंद्र के लिए अपने मन और बुद्धि के अनुसार अपनी स्तुतियों को प्रस्तुत करते हैं. (२) अस्मा इदु त्यमुपमं स्वर्षां भराम्याङ्गूषमास्येन. मंहिष्ठमच्छोक्तिभिर्मतीनां सुवृक्तिभिः सूरिं वावृधध्यै.. (३) मैं उन प्रसिद्ध इंद्र को उपमा देने योग्य, धन का प्रदाता और स्वर्ग प्राप्त करने वाले स्तोत्र बोलता हूं. यह स्तोत्र अतिशय धनवान इंद्र की वृद्धि के लिए उच्चारण कर रहा है. मैं इंद्र के उपयोग के हेतु इस स्तोत्र का घोष कर रहा हूं. (३) अस्मा इदु स्तोमं सं हिनोमि रथं न तष्टेव तत्सिनाय. गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तिन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय.. (४) रथकार जिस प्रकार स्वामी के लिए रथ का निर्माण करता है, उसी प्रकार मैं स्तुतियों द्वारा प्राप्त करने योग्य एवं मेधावी इंद्र के लिए सभी यजमानों द्वारा प्रस्तुत करने योग्य सोमरस आदि के रूप में हवि तथा स्तुतियां अर्पित करता हूं. ये स्तुतियां मैं अन्न प्राप्त के हेतु कर रहा हूं. (४) अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जुह्वा ३ समञ्जे. वीरं दानौकसं वन्दध्यै पुरां गूर्तश्रवसं दर्माणम्.. (५) मैं अन्न प्राप्ति की इच्छा से इंद्र के लिए हवि रूप अन्न प्रस्तुत करता हूं जो घी से मिला हुआ है. जिस प्रकार रथ में घोड़े जोड़े जाते हैं, उसी प्रकार मैं हवि को घृत युक्त करता हूं. इंद्र शत्रुओं को पराजित करने वाले, दान करने वाले और असुरों के नगरों को ध्वस्त करने वाले हैं. (५) अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद् वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं १ रणाय. ebook converter DEMO Watermarks*

वृत्रस्य चिद् विदद् येन मर्म तुजन्निशानस्तुजता कियेधाः.. (६) इन्हीं इंद्र के लिए विश्वकर्मा ने वज्र नाम का आयुध बनाया था जो अतिशय शोभन तथा स्तुति के योग्य हैं. इस वज्र का निर्माण युद्ध के लिए तथा आक्रमण करने वाले शत्रुओं को रोकने के लिए किया गया है. सब के स्वामी इंद्र ने इस वज्र से वृत्र राक्षस के मर्म स्थान में प्रहार किया था. (६) अस्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितुं पपिवाञ्चार्वन्ना. मुषायद् विष्णुः पचतं सहीयान् विध्यद् वराहं तिरो अद्रिमस्ता.. (७) सब के निर्माणकर्ता और महान इंद्र के असाधारण कर्म का वर्णन किया जा रहा है. इस इंद्र ने सोमयाग संबंधी यज्ञों में सोमरस का पान किया तथा पुरोडाश के अन्न का भक्षण किया है. तीनों सवनों अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल के हवनों में व्याप्त तथा शत्रुओं का संहार करने वाले इंद्र ने शत्रुओं का धन छीन लिया है. पर्वतों पर वज्र का प्रयोग करने वाले इंद्र ने वर्षा को रोकने वाले मेघ को विदीर्ण किया था. (७) अस्मा इदु ग्नाश्चिद् देवपत्नीरिन्द्रायार्कमहिहत्य ऊवुः. परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः.. (८) इस इंद्र के लिए इंद्राणी आदि देव पत्नियों ने स्तोत्र का उच्चारण किया. इस इंद्र ने विस्तृत स्वर्ग और पृथ्वी को अपने तेज से अतिक्रमण किया था. द्यावा और पृथ्वी इंद्र के महत्व को पराजित नहीं कर पाए. (८) अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्. स्वरालिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिमत्रो ववक्षे रणाय.. (९) इस इंद्र का महत्व द्युलोक और पृथ्वी से भी बढ़ कर है. ये इंद्र शत्रुओं पर अपने ही तेज से सुशोभित होते हैं. इस प्रकार के इंद्र संग्राम के लिए जाते हैं अथवा वर्षा करने के लिए मेघों के समीप पहुंचते हैं. (९) अस्येदेव शवसा शुषन्तं वि वृश्चद् वज्रेण वृत्रमिन्द्रः. गा न व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेताः.. (१०) इन्हीं इंद्र देव के बल से जो वृत्र राक्षस भयभीत हो रहा था इंद्र ने अपने वज्र से उस का शीश काट दिया एवं पणियों द्वारा चुरा कर रखी गई गायों को मुक्त किया. इंद्र ने मेघ का भेदन कर के सभी प्राणियों की रक्षा के कारण जलों को मुक्त किया. इंद्र हवि देने वाले यजमान के समान अपना मन बना कर प्रसिद्ध अन्न प्राप्त कराएं. (१०) अस्येदु त्वेषा रन्त सिन्धवः परि यद् वज्रेण सीमयच्छत्. ईशानकृद दाशुषे दशस्यन् तुर्वीतये गाधं तुर्वणिः कः.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णस्यापं चरध्यै.. (१२)

इन्हीं इंद्र के दीप्त बल के कारण बहने वाली नदियां अपनेअपने स्थान पर सुशोभित होती हैं, क्योंकि इंद्र ने अपने वज्र से उन्हें नियंत्रित किया है. इंद्र शत्रुओं का वध कर के स्वयं को स्वामी बनाते हुए हवि देने वाले यजमान के लिए अन्न प्रदान करते हैं. (११) अस्मा इदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः. गोर्न पर्व वि रदा तिरश्चेष्यन्नर्णस्यापं चरध्यै.. (१२) वृत्र राक्षस के वध के लिए अत्यधिक शीघ्रता करते हुए सब के स्वामी इंद्र शत्रु की सेना कितनी है, ऐसा कह कर उस का बल हरण करने वाले तुम वज्र का प्रहार करो. जिस प्रकार पशुओं के मांस के टुकड़े किए जाते हैं, उसी प्रकार तुम शत्रुओं पर प्रहार करो. हे इंद्र! तुम जल की इच्छा करते हुए भूमि पर जल के प्रवाह के लिए वृत्र के शरीर को अपने वज्र से नष्ट कर दो. (१२) अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः. युधे यदिष्णान आयुधान्यृघायमाणो निरिणाति शत्रून्.. (१३) अपनी स्तुतियों में इंद्र की प्रशंसा करो. हे स्तोता! स्तुतियों के योग्य इंद्र की स्तुतियों से प्रशंसा करो. जब इंद्र युद्ध के लिए अपने आयुधों को चलाते हुए तथा शत्रुओं की हिंसा करते हुए उन की ओर जाते हैं, हे स्तोता! उस समय स्तुतियों का उच्चारण करो. (१३) अस्येदु भिया गिरयश्च दृळ्हा द्यावा च भूमा जनुषस्तुजेते. उपो वेनस्य जोगुवान ओणिं सद्यो भुवद् वीर्याय नोधाः.. (१४) इन इंद्र के जन्म से ही पंख कटने के भय से पर्वत भी दृढ़ हो गए थे. इंद्र के भय से धरती और स्वर्ग भी कांपते हैं. इन इंद्र की अनेक स्तोत्रों से प्रशंसा कर के नोधा नाम के ऋषि सामर्थ्य वाले हुए. (१४) अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद् वव्रे भूरेरीशानः. प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्षिमावदिन्द्रः.. (१५) इन्हीं इंद्र के लिए स्तुतियों और सोम लक्षण अन्न प्रदान किया जाता है. इस कारण अधिक धन के स्वामी इंद्र स्तोत्र आदि के विषय में अद्वितीय हुए. इंद्र ने सौवश्य की रक्षा के अवसर पर सूर्य से अधिक तेजस्वी एतश नाम वाले ऋषि की भी रक्षा की थी. (१५) एवा ते हारियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्. ऐषु विश्वपेशां धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात्.. (१६) हे इंद्र! गौतम गोत्र वाले अनेक ऋषि तुम्हारे लिए मंत्र रूपी स्तोत्रों का उच्चारण कर रहे हैं. इन स्तुतिकर्ताओं को अनेक प्रकार का धन और अन्न प्रदान करो. जिस प्रकार इंद्र देव इस समय हमारी रक्षा के लिए आए हैं, उसी प्रकार वे अन्य दिनों में हमारे यज्ञ में आएं. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३६ देवता—इंद्र य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः. यः पत्यते वृषभो वृष्णयावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमायः सहस्वान्.. (१) जो इंद्र यजमानों के यज्ञों में प्रधान रूप से आह्वान करने योग्य हैं, उन की मैं उन वाणियों के द्वारा स्तुति करता हूं, जिनके स्वामी इंद्र हैं. वे कामनाओं को पूर्ण करने वाले इंद्र की स्तुतियों के द्वारा प्रार्थना की जाती है. वे इंद्र बल के विनाशक, अनेक कर्म करने वाले तथा शक्तिशाली हैं. (१) तमु नः पूर्वे पितरो नवग्वाः सप्त विप्रासो अभि वाजयन्तः. नक्षद्दाभं ततुरिं पर्वतेष्ठान्मद्रोघवाचं मतिभिः शविष्ठम्.. (२) हमारे समर्थ पूर्व पुरुषों ने हवि रूपी अन्न दे कर इंद्र की कामना की तब वे नौ महीनों के बाद सिद्धि प्राप्त कर पाए. इंद्र की स्तुति करते हुए उन्होंने पितृलोक प्राप्त किया. इंद्र शत्रुओं की हिंसा करते हैं. दुर्गम मार्ग को पार करते हैं तथा अतिशय शक्तिशाली हैं. इंद्र की आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता. (२) तमीमह इन्द्रमस्य रायः पुरुवीरस्य नृवतः पुरुक्षोः. यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्बान् तमा भर हरिवो मादयध्यै.. (३) हम इंद्र से वीर पुत्रों एवं सेवकों के साथ असीमित धन की याचना करते हैं. हे इंद्र देव! हमें ऐसा धन दो जो कभी समाप्त न हो तथा हमें सुख देता रहे. (३) तन्नो वि वोचो यदि ते पुरा चिज्जजितार आनशुः सुम्नमिन्द्र. कस्वे भागः किं वयो दुध्र खिद्रः पुरुहूत पुरूवसोऽसुरघ्नः.. (४) हे इंद्र देव! हम स्तोताओं को तुम वह सुख प्रदान करो, जिसे प्राचीन काल के स्तोताओं ने प्राप्त किया था. यज्ञ में निकटस्थ तुम्हारा भाग कौन सा है? क्या वह तुम्हें देने योग्य हवि लक्षण वाला आगे है. हे दुख से धारण करने योग्य, शत्रुओं को कष्ट देने वाले, बहुतों के द्वारा यज्ञों में बुलाए गए एवं बहुत धन वाले इंद्र! हमें यह बताइए. (४) तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं वेपी वक्वरी यस्य नू गीः. तुविग्राभं तुविकूर्मिं रभोदां गातुमिषे नक्षते तुम्रमच्छ (५) वज्रधारणकर्ता तथा रथ में विराजमान इंद्र को जिस स्तोत्र की स्तुति प्राप्त होती है, अनेक प्रकार के कर्म करने वाले तथा शक्तिशाली जिस इंद्र से यजमान सुख पाने की इच्छा करता है, वह इंद्र को प्राप्त कर लेता है तथा अपने वश में कर लेता है. (५) अया ह त्यं मायया वावृधानं मनोजुवा स्वतवः पर्वतेन.

अच्युता चिद् वीलिता स्वोजो रुजो वि दृळ्हा धृषता विरप्शिन्.. (६) हे इंद्र! तुम्हारे वज्र का वेग मन के समान है. तुम ने अपनी माया से शक्तिशाली वृत्र का नाश किया है तथा ऐसे शत्रु नगरों को ध्वस्त किया, जिन्हें आज तक कोई नष्ट नहीं कर सका. (६) तं वो धिया नव्यस्या शविष्ठं प्रत्नं प्रत्नवत् परितंसयध्यै. स नो वक्षदनिमानः सुवह्वेन्द्रो विश्वान्यति दुर्गाहाणि.. (७) हे यजमानो! प्राचीन ऋषियों ने जिस प्रकार नवीन स्तोत्रों से इंद्र की प्रशंसा की, उसी प्रकार मैं भी इंद्र की स्तुति करने के लिए उद्यत हूं. सुंदर वाहनों वाले इंद्र सभी कठिन कार्यों में हमें सफलता प्राप्त कराएं. (७) आ जनाय द्रुह्वणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयो ऽन्तरिक्षा. तपा वृषन् विश्वतः शोचिषा तान् ब्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च.. (८) हे इंद्र! पृथ्वी, स्वर्ग और उन के मध्य में स्थित अंतरिक्ष को तुम राक्षसों से रहित बनाओ. तुम अपने तेज से राक्षसों को भस्म कर दो. राक्षस ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं. उन के विनाश के हेतु तुम धरती और आकाश को तेज युक्त बनाओ. (८) भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्. धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजूर्य दयसे वि माया:.. (९) हे इंद्र! तुम स्वर्ग के निवासियों के राजा हो. तुम अपने दाहिने हाथ में वज्र ले कर राक्षसों की माया का विनाश करो. (९) आ संयतमिन्द्र णः स्वस्तिं शत्रुन्तूर्याय बृहतीममृधाम्. यया दासान्यार्याणि वृत्रा करो वज्रिन्सत्सुतुका नाहुषाणि.. (१०) हे वज्रधारी इंद्र! अपनी जिस शक्ति से तुम शत्रुओं के समान मनुष्यों को भी अपनी मंगलकारिणी संपत्ति प्रदान कर के महान बना देते हो, उस महिमा वाली संपत्ति को हमें भी प्रदान करो. (१०) स नो नियुद्भिः पुरुहूत वेधो विश्ववाराभिरा गहि प्रयुज्यो. न या अदेवो वरते न देव आभिर्याहि तूयमा मद्ग्रद्रिक्.. (११) हे इंद्र देव! तुम अत्यधिक पूजा के योग्य, सब के रचयिता तथा यजमानों द्वारा बुलाने योग्य हो. तुम्हारे जिन अश्वों को रोकने में देवता या असुर कोई भी समर्थ नहीं होता, उन्हीं अश्वों की सहायता से तुम हमारे यज्ञ में पधारो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३७ देवता—इंद्र यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्चयावयति प्र विश्वाः. यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्ता ऽ सि सुष्वितराय वेदः.. (१) हे इंद्र! टेढ़े सींगों वाला बैल जिस प्रकार भयभीत करता है, तुम भी उसी प्रकार सब को भयभीत करते हो. तुम हमारे शत्रुओं को दूर भगा सकते हो. जो मनुष्य तुम्हें हवि नहीं देता, उस के धन को तुम उसे प्रदान करो जो तुम्हें हवि देता है. (१) त्वं ह त्यदिन्द्र कुत्समावः शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्यॆ. दासं यच्छुष्णं कुयवं न्य स्मा अरन्धय आर्जुनेयाय शिक्षन्.. (२) हे इंद्र! तुम ने संग्राम में कुत्स की रक्षा की. उस समय तुम ने अर्जुनी के पुत्र की रक्षा के निमित्त दास, शुष्ण और कुयव नाम के असुरों को पूरी तरह वश में किया तथा उन का धन कुत्स को दिया. (२) त्वं धृष्णो धृषता वीतहव्यं प्रावो विश्वाभिरूतिभिः सुदासम्. प्र पौरुकुत्सिं त्रसदस्युमावः क्षेत्रसाता वृत्रहत्येषु पूरुम्.. (३) हे इंद्र! तुम्हारा वज्र शत्रुओं को वश में करने वाला है. तुम ने अपने इस वज्र से वीतहव्य और सुदास नाम के राजाओं की रक्षा की. तुम ने इसी वज्र से संग्राम में पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु और पुरु की रक्षा की. (३) त्वं नृभिर्नृमणे देववीतौ भूरीणि वृत्रा हर्यश्व हंसि. त्वं नि दस्युं चुमुरिं धुनिं चास्वापयो दभीतये सुहन्तु.. (४) हे इंद्र! जब युद्ध का अवसर आता है, तब तुम मरुद्गण का सहयोग ले कर बहुत से दस्यु जनों का वध कर देते हो. तुम ने राजर्षि दभीति की रक्षा के लिए वज्र हाथ में ले कर चुमुरि और धुनि नाम के दस्युओं का नाश किया था. (४) तव च्यौत्नानि वज्रहस्त तानि नव यत् पुरो नवतिं च सद्यः. निवेशने शततमाविवेषीरहं च वृत्रं नमुचिमुताहन्.. (५) हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारा वज्र बहुत प्रसिद्ध है. तुम ने अपने इसी वज्र से राक्षसों के निन्यानवे नगरों का विनाश किया था तथा उन के सौवें नगर पर अधिकार कर लिया था, तुम ने अपने वज्र से वृत्र और नमुचि नाम के असुरों का भी वध किया था. (५) सना ता त इन्द्र भोजनानि रातहव्याय दाशुषे सुदासे. वृष्णे ते हरी वृषणा युनज्मि व्यन्तु ब्रह्माणि पुरुशाक वाजम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! यजमान राजा सुदास ने तुम्हें हवि दान किया था. वे धन सुदास के पास सदा रहे थे. हे इंद्र! तुम बहुत से कर्म करने वाले तथा कामनाओं की वर्षा करने वाले हो. हे इंद्र! तुम्हें यज्ञ में लाने के लिए मैं हरि नाम वाले अथवा हरे रंग के घोड़ों को तुम्हारे रथ में जोड़ता हूं. हे बलशाली इंद्र! हमारे स्तोत्र तुम्हें प्राप्त हों. (६) मा ते अस्यां सहसावन् परिष्टावघाय भूम हरिवः परादै. त्रायस्व नो ऽ वृकेभिर्वरूथैस्तव प्रियासः सूरिषु स्याम.. (७) हे शक्तिशाली एवं हरे रंग के अथवा हरि नाम के घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम तुम्हारी सेवा का त्याग करने वाले न हों अर्थात् सदा तुम्हारी सेवा करते रहें. हे इंद्र! अपनी सेनाओं के द्वारा हमारी रक्षा करो, जिन्हें कोई रोक नहीं सकता. हे इंद्र! हम स्तोत्रों का उच्चारण करने वालों में तुम्हारे प्रिय बनें. (७) प्रियास इत् ते मघवन्नभिष्टौ नरो मदेम शरणे सखायः. नि तुर्वशं नि याद्वं शिशीह्यतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन्.. (८) हे इंद्र! हम यजमान तुम्हारे मित्र हैं. हम अपने घरों में प्रसन्न रहें. तुम अतिथिग्व नाम के राजा को सुख प्रदान करते हुए तुर्वश और यदु नाम के राजाओं की रक्षा करो. (८) सद्यश्चिन्नु ते मघवन्नभिष्टौ नरः शंसन्त्युक्थशास उक्था. ये ते हवेभिर्वि पर्णीरदाशन्नस्मान् वृणीष्व युज्याय तस्मै.. (९) हे धन के स्वामी इंद्र! तुम्हारे आने के समय ऋत्विज् उक्थ नाम के मंत्रों का उच्चारण करते हैं. जो ऋत्विज् तुम्हारा आह्वान कर के यज्ञ न करने वालों को नष्ट करते हैं, वे भी उक्थ नाम के मंत्रों को बोलते हैं. उक्थों का उच्चारण करने वाले हम को तुम फल प्रदान करने के हेतु वरण करो. (९) एते स्तोमा नरां नृतम तुभ्यमस्मद्रयञ्चो ददतो मघानि. तेषामिन्द्र वृत्रहत्ये शिवो भूः सखा च शूरो ऽ विता च नृणाम्.. (१०) हे नेताओं के मध्य श्रेष्ठ इंद्र! हमारे सामने आकर धन प्रदान करने वाले तुम्हारे लिए ये स्तोत्र किए जा रहे हैं. हम स्तोत्राओं के पाप नष्ट कर के हमें सुखी बनाओ तथा हमें घर प्रदान करो. हम तुम्हें हवि देते हैं. तुम मित्र के समान हमारी रक्षा करो. (१०) नू इन्द्र शूर स्तवमान ऊती ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधस्य. उप नो वाजान् मिमीह्युप स्तीन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (११) हे इंद्र! तुम हम से स्तुति और हवि प्राप्त करते हुए अधिक उन्नति करो तथा हमें धन और पुत्र प्रदान करो. हे अग्नि आदि देवताओ! तुम भी हमारा कल्याण करते हुए हमारे रक्षक बनो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३८ देवता—इंद्र

सूक्त-३८ देवता—इंद्र आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (१) हे इंद्र! हम ने सोमरस तैयार कर लिया है. तुम यहां हमारे यज्ञ में आओ तथा इन बिछी हुई कुशाओं पर बैठ कर सोमरस को पियो. (१) आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (२) हे इंद्र! तुम्हारे घोड़े हमारे मंत्रोच्चारण के साथ ही तुम्हारे रथ में जुड़ जाते हैं. वे तुम्हें तुम्हारे मन चाहे स्थान पर ले जाते हैं. तुम्हारे वे घोड़े तुम्हें हमारे यज्ञ में लाएं, जिस से तुम हमारे आह्वान को सुन सको. (२) ब्रह्माणस्तवा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (३) हे इंद्र! हमारे पास तैयार किया हुआ सोमरस है. हम तुम्हारे सेवक हैं और सोमयाग कर चुके हैं. तुम सोमरस पीते हो, इसलिए हम तुम्हारा आह्वान कर रहे हैं. (३) इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (४) पूजा संबंधी मंत्रों से इंद्र का पूजन किया जाता है. सामवेद के मंत्रों के गान में भी इंद्र की ही स्तुति है. हमारी वाणी भी इंद्र की ही स्तुति करती है. (४) इन्द्र इद्धर्योः सचा संमिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (५) वज्र धारण करने वाले इंद्र उपासकों का हित चाहते हैं. इंद्र के घोड़े उन के साथ रहते हैं. हमारे मंत्रोच्चारण के साथ ही वे घोड़े रथ में जोड़े जाते हैं. (५) इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (६) इंद्र ने दीर्घ काल तक प्रकाश देने के लिए सूर्य को आकाश में स्थापित किया. सूर्य रूपी इंद्र ने ही अपनी किरणों से मेघों का भेदन किया है. (६) सूक्त-३९ देवता—गोसूक्ति इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः. अस्माकमस्तु केवलः.. (१) हम विश्व के सभी प्राणियों की ओर से इंद्र का आह्वान करते हैं. वे इंद्र हमारे ही हों. (१) व्य १ न्तरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना. इन्द्रो यदभिनद् वलम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

इंद्र ने सोमरस पान कर के प्रसन्न होने पर वर्षा के जल की अंतरिक्ष अर्थात् आकाश से वृष्टि की. उन्होंने अपनी शक्ति से मेघों को विदीर्ण किया. (२) उद् गा आजदङ्गिरोभ्य अविष्कृण्वन् गुहा सतीः. अवाञ्चं नुनुदे वलम्.. (३) जो गाएं गुफा में बंद थीं, इंद्र ने अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के लिए उन्हें बाहर निकाला. गायों का अपहरण करने वाला बल राक्षस था. इंद्र ने उस का मुंह नीचे कर के उसे गिरा दिया. (३) इन्द्रेण रोचना दिवो दृळहानि दृंहितानि च. स्थिराणि न पराणुदे.. (४) इंद्र ने आकाश में प्रकाश करते हुए नक्षत्रों को स्थिर किया है. ये नक्षत्र स्थिर हैं. इन्हें कोई नीचे नहीं गिरा सकता. (४) अपामूर्मिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते. वि ते मदा अराजिषुः.. (५) हे इंद्र! तुम्हारा स्तोत्र रस के साथ उच्चारण किया जाता है. यह स्तोत्र वर्षा के जल से सरिताओं और सागर को प्रसन्न करता है. इस से सोमरस पीने के कारण तुम्हारा हर्ष प्रकट होता है. (५) सूक्त-४० देवता—इंद्र इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (१) हे इंद्र! तुम मरुतों के साथ रहते हो और अपने उपासकों को अभय प्रदान करते हो. मरुतों के साथ रहते हुए तुम प्रसन्न होते हो. मरुतों का और तुम्हारा तेज समान है. (१) अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति. गणैरिन्द्रस्य काम्यैः.. (२) यह यज्ञ इंद्र की कामना करने वालों से अत्यधिक सुशोभित हो रहा है. इंद्र अत्यधिक तेजस्वी और निष्पाप अर्थात् पाप रहित हैं. (२) आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (३) हवि स्वीकार कर के इंद्र शक्तिशाली बनते हैं और याज्ञिक नाम प्राप्त करते हैं. (३) सूक्त-४१ देवता—इंद्र इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कृतः. जघान नवतीर्नव.. (१)

इंद्र कभी भी युद्ध से पीछे नहीं हटते हैं। उन्होंने ही वृत्र असुर के निन्यानवे वृत्रों (राक्षसों) का विनाश किया था। (१) इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्, तद् विदच्छर्यणावति.. (२) पर्वतों में छिपे हुए अपने घोड़े का सिर प्राप्त करने के इच्छुक इंद्र ने शर्यणावत में प्राप्त किया था, तब उस का वज्र बना कर उन्होंने असुरों का वध किया था। (२) अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्, इत्था चन्द्रमसो गृहे.. (३) चंद्र मंडल एक ग्रह है. उस में सूर्य रूपी इंद्र ही अपनी एक किरण में विराजते हैं. (३) सूक्त-४२ देवता—इंद्र वाचमष्टापदीमहं नवसक्तिमृतस्पृशम्, इन्द्रात् परि तन्वं ममे.. (१) मैं ने इस वाणी को इंद्र से अपने शरीर में धारण किया है जो सत्य का स्पर्श करने वाली है. उस वाणी के आठ चरण और नौ शीर्ष हैं. (१) अनु त्वा रोदसी उभे ऋक्षमाणमकृपेताम्, इन्द्र यद् दस्युहा ऽ भवः.. (२) हे इंद्र! जब तुम ने असुरों का विनाश किया था, तब तुम्हारी शक्ति को देख कर द्यावा अर्थात् स्वर्ग और पृथ्वी ने तुम पर कृपा की थी. (२) उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः. सोममिन्द्र चमू सुतम्.. (३) हे इंद्र! भलीभांति तैयार किए गए सोमरस को पी कर तुम अपनी ठोड़ी चलाते हुए उठो. (३) सूक्त-४३ देवता—इंद्र भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः. वसु स्पार्हं तदा भर.. (१) हे इंद्र! तुम हमारे शत्रुओं को काट कर हमारी युद्ध संबंधी बाधा दूर करो. तुम हमें वह धन प्रदान करो, जिसे सभी पाना चाहते हैं. (१) यद् वीलाविन्द्र यत् स्थिरे यत् पर्शने पराभृतम्. वसु स्पार्हं तदा भर.. (२) हे इंद्र! तुम हमें वह धन प्रदान करो जो स्थिर व्यक्ति के पास रहता है और जिसे बसनी अर्थात् कमर में बांधी जाने वाली कपड़े की बनी लंबी थैली में भरा जाता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-४४ देवता—इंद्र

यस्य ते विश्वमानुषो भूरेर्दत्तस्य वेदति. वसु स्पार्हं तदा भर.. (३) तुम्हारे द्वारा दिए गए जिस धन को तुम्हारे सभी उपासक प्राप्त करते हैं. तुम हमें वही धन प्रदान करो. (३) सूक्त-४४ देवता—इंद्र प्र सम्राजं चर्षणीनामिन्द्रं स्तोता नव्यं गीर्भिः. नरं नृषाहं मंहिष्ठम्.. (१) मैं ऐसे इंद्र की स्तुति करता हूं, जो मनुष्यों के प्रति सहनशील, अग्रगण्य, पूजने के योग्य, मनुष्यों के स्वामी और दयालु हैं. (१) यस्मिन्नुकथानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या. अपामवो न समुद्रे.. (२) जिस प्रकार नीचे की ओर बहने वाले जल सागर में जाते हैं, उसी प्रकार उक्थ मंत्रों के द्वारा अन्न की इच्छा से किए जाने वाले यज्ञ इंद्र को प्राप्त होते हैं. (२) तं सुष्टुत्या विवासे ज्येष्ठराजं भरे कृत्वुम्. महो वाजिनं सनिभ्यः.. (३) मैं इंद्र को अपनी स्तुति से प्रसन्न करता हूं. इंद्र तेजस्वी शत्रुओं का भी हनन करने वाले हैं. वे स्तुति करने वालों को अन्न तथा यश प्रदान करते हैं. मैं इंद्र को हवि भी प्रदान करता हूं. (३) सूक्त-४५ देवता—इंद्र अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भाधिम्. वचस्तच्चिन्न ओहसे.. (१) हे इंद्र! कबूतर जिस प्रकार गर्भ धारण करने वाली कबूतरी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सुन कर हमारे पास आओ. (१) स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते. विभूतिरस्तु सूनृता.. (२) हे धन के स्वामी इंद्र! तुम्हारा यह नाम सत्य हो. हमारी स्तुतियां तुम्हें हमारे पास लाने में समर्थ हैं. (२) ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये ऽ स्मिन् वाजे शतक्रतो. समन्येषु ब्रवावहै.. (३) हे सैकड़ों कर्म करने वाले इंद्र! तुम हमारी रक्षा करने के लिए ऊंचे स्थान पर खड़े हो जाओ. अन्य पुरुष हम से द्वेष करते हैं. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) eBook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-४६ देवता—इंद्र

सूक्त-४६ देवता—इंद्र प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्तारं ज्योतिः समत्सु. सासह्वांसं युधा ऽ मित्रान्.. (१) वे इंद्र नेता, युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं को वश में करने वाले और यज्ञों में प्रकाश करने वाले हैं. (१) स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः. इन्द्रो विश्वा अति द्विषः.. (२) इंद्र अपनी कल्याणकारिणी नाव के द्वारा हमें पार लगाते हुए शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. (२) स त्वं न इन्द्र वाजेभिर्दशस्या च गातुया च. अच्छा च नः सुम्नं नेषि.. (३) हे इंद्र! तुम अपनी दसों उंगलियों से हमारे सामने उस सुख को लाते हो, जो अन्न आदि से संपन्न है. (३) सूक्त-४७ देवता—इंद्र तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे. स वृषा वृषभो भुवत्.. (१) कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र सभी देवों से श्रेष्ठ बनें. हम वृत्र राक्षस का नाश करने के लिए इंद्र को शक्तिशाली बनाते हैं. (१) इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः. द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः.. (२) इंद्र प्रशंसनीय, सौम्य, तेजस्वी, बलवान तथा दूसरों को प्रसन्न करने वाले हैं. (२) गिरा वज्रो न संभृतः सबलो अनपच्युतः. ववक्ष ऋष्वो अस्तृतः.. (३) इंद्र अच्छे लोगों को धन देते हैं. वज्रधारी इंद्र शक्तिशाली एवं अविनाशी हैं. (३) इन्द्रमिद् गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः. इन्द्रं वाणीरनूषत.. (४) स्तोताओं की वाणी इंद्र की स्तुति करती हैं, सामगान के इच्छुक किस के यश का गान करते हैं? पूजा संबंधी मंत्रों के द्वारा इंद्र का ही पूजन किया जाता है. (४) इन्द्र इद्धर्योः सचा संमिश्ल आ वचोयुजा. इन्द्रो वज्री हिरण्ययः.. (५) इंद्र के घोड़े सदा उन के साथ रहते हैं. ऋत्विजों के मंत्रों के उच्चारण के साथ ही उन्हें ebook converter DEMO Watermarks*

रथ में जोड़ा जाता है. वज्र धारण करने वाले इंद्र सोने के समान कांति वाले हैं. (५) इन्द्रो दीर्घाय चक्षस आ सूर्यं रोहयद् दिवि. वि गोभिरद्रिमैरयत्.. (६) इंद्र ने सूर्य को आकाश में इसलिए स्थापित किया कि सब लोग उन का दर्शन कर सकें. वे ही इंद्र सूर्य के रूप में मेघों का भेदन करते हैं. (६) आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. इदं बर्हिः सदो मम.. (७) हे इंद्र! हम ने सोम तैयार कर लिया है. तुम इन बिछी हुई कुशाओं पर बैठ कर सोमरस पियो. (७) आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (८) हे इंद्र! ऋत्विजों के मंत्रोच्चारण के साथ ही तुम्हारे घोड़े रथ में जोड़े जाते हैं. वे घोड़े तुम्हें उस स्थान पर ले जाने में समर्थ हैं, जहां तुम जाना चाहते हो. तुम्हारे घोड़े तुम्हें हमारे यज्ञ में लाएं और तुम हमारे स्तोत्रों को सुनो. (८) ब्रह्माणस्त्वा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (९) हे इंद्र! हम तुम्हारे उपासक हैं. हम ने सोमपान किया है. तैयार किया हुआ सोमरस हमारे पास रखा है. इसी कारण हम तुम्हें सोमरस पीने को बुलाते हैं. (९) युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः. रोचन्ते रोचना दिवि.. (१०) हे इंद्र! तुम्हारा रथ सभी प्राणियों को लांघता हुआ चलता है. तुम्हारे रथ में जुड़े हुए हरे रंग अथवा हरि नाम वाले घोड़े आकाश में चमकते हैं. (१०) युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे. शोणा धृष्णू नृवाहसा.. (११) इंद्र के सारथी रथ में घोड़ों को जोड़ते हैं. ये घोड़े रथ के दोनों ओर रहते हैं. ये घोड़े कामना करने योग्य हैं एवं इंद्र की यात्रा पूर्ण करने में समर्थ हैं. (११) केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे. समुषद्भिरजायथाः.. (१२) हे मनुष्यो! ये सूर्यरूपी इंद्र अज्ञानियों को ज्ञान देते हैं तथा अंधकार से ढके पदार्थों को प्रकाशित करते हैं. ये अपनी किरणों के साथ उदय हुए हैं. हे मनुष्यो! इन सूर्यरूपी इंद्र के दर्शन करो. (१२) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (१३)

सूर्य की किरणें सभी प्राणियों को जाग्रत करती हैं. प्राणी सूर्य रूपी इंद्र का दर्शन कर सकें, इसलिए ये किरणें सूर्य को ऊपर उठाती हैं. (१३) अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (१४) जिस प्रकार रात के बीतते ही चोर भाग जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य के उदय होते ही आकाश से तारे भाग जाते हैं. (१४) अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (१५) सूर्य की किरणें ज्ञान देने वाली एवं अग्नि के समान दीप्त हैं. ये किरणें मनुष्यों का अनुकरण करती हैं. (१५) तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचन.. (१६) हे इंद्र! तुम संसार रूपी नाव के समान हो. तुम सब को देखने वाले हो, सब को ज्योति प्रदान करते हो और सब के प्रकाशक हो. (१६) प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषीः. प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे.. (१७) हे इंद्र! तुम मनुष्यों और देवों के कल्याण के लिए उदय होते हो. तुम सब के सामने प्रकाशित होते हो. (१७) येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (१८) हे पाप का नाश करने वाले इंद्र! जो पुरुष प्राचीन काल के पुण्यात्मा लोगों के मार्ग पर चलते हैं, तुम उन्हें सदैव कृपा की दृष्टि से देखते हो. (१८) वि द्योमेषि रजस्पृथ्वहर्मिमानो अक्तुभिः. पश्यंजन्मानि सूर्य.. (१९) हे इंद्र! तुम सब पर कृपा करते हो तथा उन्हें देखते हुए रात्रि और दिन का निर्माण करते हो. तुम तीनों लोकों में विचरण करते हो. (१९) सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षणम्.. (२०) हे सूर्यरूपी इंद्र! तुम्हारी चमकती हुई सात किरणें घोड़ों के रूप में तुम्हारे रथ में जुड़ी रहती हैं. वे ही तुम्हारा वहन करती हैं. (२०) अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तभिः.. (२१) इंद्र ने सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ा है. घोड़े इंद्र की इच्छा के अनुसार अपने ढंग से ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-४८ देवता—गौ

आगे बढ़ते हैं. (२१) सूक्त-४८ देवता—गौ अभि त्वा वर्चसा गिरः सिञ्चन्त्या राचरण्युवः. अभि वत्सं न धेनवः.. (१) विचरण करने वाली गाएं, जिस प्रकार अपने बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार हमारी वाणी तुम्हें प्राप्त होती है और तुम्हें सींचती हैं. (१) ता अर्षन्ति शुभ्रियः पृञ्चन्तीर्वर्चसा प्रियः. जातं जात्रीर्यथा हृदा.. (२) जिस प्रकार माता जन्म लेने वाले बच्चे को अपने हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार सुंदर स्तुतियां इंद्र को तेज से सुशोभित करती हैं. (२) वज्रापवसाध्यः कीर्तिर्म्रियमाणमावहन्. मह्यमायुर्घृतं पयः.. (३) ये वज्रधारी इंद्र मुझे यश, आयु, घृत और दूध प्रदान करें. (३) आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४) ये सूर्य रूपी इंद्र उदयाचल पर पहुंच गए हैं. इन्होंने पूर्व दिशा में दर्शन दे कर सभी प्राणियों को अपनी किरणों से ढक लिया है. इस के लिए उन्होंने स्वर्ग और अंतरिक्ष को वर्षा के जल से खींच कर व्याप्त कर लिया है. वर्षा का जल अमृत के समान है. उस को दुहने के कारण ही इंद्र को गौ कहा जाता है. (४) अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानतः. व्यख्यन्महिषः स्व :.. (५) जो प्राणी प्राण अर्थात् सांस लेने और अपान वायु त्यागने का कार्य करते हैं, उन के शरीर में सूर्य की प्रभा प्राण के रूप में विचरण करती है. सूर्य ही सब लोकों को प्रकाशित करते हैं. (५) त्रिंशद् धामा वि राजति वाक् पतङ्गो अशिश्रियत्. प्रति वस्तोरहर्द्युभिः.. (६) सूर्य की किरणों से तीस मुहूर्त दीप्त होते हैं. वे ही दिन और रात के अंग बनते हैं. वेदों की वाणी सूर्य का उसी प्रकार आश्रय लेती है, जिस प्रकार पक्षी वृक्ष का आश्रय लेते हैं. (६) सूक्त-४९ देवता—इंद्र यच्छक्रा वाचमारुहन्नन्तरिक्षं सिषासथः. सं देवा अमदन् वृषा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! जब स्तुति करने वाले विद्वान् अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं, तभी देवता उन पर प्रसन्न होते हैं. (१) शक्रो वाचमधृष्टायोरुवाचो अधृष्णुहि. मंहिष्ठ आ मदैर्दिवि.. (२) वे इंद्र शिष्ट जनों के प्रति कठोर वचन न बोलें. हे अतिशय महान इंद्र! तुम अपनी ज्योति से आकाश को पूर्ण करो. (२) शक्रो वाचमधृष्णुहि धामधर्मन् वि राजति. विमदन् बर्हिरासदन्... (३) हे इंद्र! तुम कठोर वचन मत बोलो. तुम हमारे यज्ञ में आ कर बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान होओ तथा प्रसन्न बनो. (३) तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः. अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (४) हे यजमानो! ये इंद्र दुःखों का नाश करने वाले, देखने योग्य एवं सोमरस पी कर प्रसन्न होते हैं. तुम्हारे यज्ञ की सफलता के लिए हम इंद्र की स्तुति करते हैं. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय रंभाती हुई गाएं जिस प्रकार अपने बछड़े के पास जाती हैं, उसी प्रकार स्तुतियां करते हुए हम इंद्र की ओर जाते हैं. (४) द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्. क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (५) दुर्भिक्ष के समय जिस प्रकार सभी जीवधारी कंद, मूल और फल वाले पर्वत की स्तुति करते हैं, उसी प्रकार हम उस की स्तुति करते हैं जो दान करने योग्य, पोषक, गायों से युक्त एवं तेजपूर्ण होता है. (५) तत् त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये. येना यतिभ्यो भृगवे धने हते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (६) हे इंद्र! मैं तुम से बल युक्त अन्न की याचना करता हूं. जिस अन्न रूप धन को प्राप्त कर के भृगु ऋषि ने शांति अनुभव की तथा कण्व ऋषि के पुत्र प्रस्कण्व की रक्षा की, हम उसी धन की याचना करते हैं. (६) येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः. सद्यः सो अस्य महिमा न संनशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (७) हे इंद्र! जिस बल से तुम ने सागरों को भरने वाले जल की रचना की, वह बल हम को मनचाहा फल देने वाला हो. इंद्र की महिमा को शत्रु प्राप्त नहीं कर सकते. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-५०                देवता—इंद्र

सूक्त-५०                देवता—इंद्र कन्नव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः. नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गृणन्त आनशुः.. (१) जो इंद्र मरणशील मनुष्यों का आकार धारण करने वाले हैं, हे स्तोताओ! उन की स्तुति करो. तुम इंद्र की महिमा का पूर्ण रूप से वर्णन न कर सकोगे और थोड़ा गान कर सकोगे, इस से भी तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी. (१) कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते. कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः.. (२) हे इंद्र! कौन सा ऋषि तुम्हारे संबंध में तर्क करता है? किस कारण तुम सोमरस वाले स्तोता के बुलाने पर ही आते हो? सत्य की इच्छा करने वाले देवों का समूह किस कारण तुम्हारी स्तुति करता है? (२) सूक्त-५१                देवता—इंद्र अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे. यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति.. (१) हे स्तोताओ! उन स्तोत्रों का उच्चारण करो जो इंद्र को मेरे समीप लाने के कारण बनें. वे इंद्र सहस्र संख्या वाला विशाल धन देते हैं. (१) शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे. गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः.. (२) हवि देने वाले जो यजमान अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर के उन का वध करते हैं, उन यजमानों के लिए इंद्र का स्वर्ण रूप धन इस प्रकार बरसता है, जिस प्रकार पर्वत से जल निकलता है. (२) प्र सु श्रुतं सुराधसमर्चा शक्रमभिष्टये. यः सुन्वते स्तुवते काम्यं वसु सहस्रेणेव मंहते.. (३) जो स्तोता यज्ञ में अभिषव करता है, इंद्र उसे हजार संख्या वाला धन देते हैं. हे स्तोता! तुम उन्हीं इंद्र की भलीभांति पूजा करो. (३) शतानीका हेतयो अस्य दुष्टरा इन्द्रस्य समिषो महीः. गिरिंन भुज्मा मघवत्सु पिन्वते यदीं सुता अमन्दिषु.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-५२ देवता—इंद्र

पापी मनुष्य इंद्र के आयुधों से बच नहीं सकते, क्योंकि इंद्र के आयुध सैकड़ों सेनाओं के समान विनाश करने वाले हैं. भोग प्रदान करने वाला पर्वत अपने पदार्थों से जिस प्रकार संपन्न बनता है, उसी प्रकार तैयार किए हुए सोमरस को पी कर इंद्र शक्ति से पूर्ण हो जाते हैं और यजमान को अन्न प्रदान करते हैं. (४) सूक्त-५२ देवता—इंद्र वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः. पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन् परि स्तोतार आसते.. (१) हे इंद्र! हमारे पास वह सोमरस है जो तैयार करने पर जल के समान तरल हो गया है. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः. कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः.. (२) हे इंद्र! सोमरस तैयार करने के बाद यजमान तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम बैल के समान प्यासे हो कर इस सोमरस को पीने के लिए हमारे यज्ञ में कब आओगे? (२) कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद वाजं दर्षि सहस्रिणम्. पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (३) हे इंद्र! तुम शक्तिशाली मनुष्य को भी मार डालते हो तथा उस के धन पर अधिकार कर लेते हो. हम तुम से धन मांगते हैं, जो गौ आदि से युक्त हो. (३) सूक्त-५३ देवता—इंद्र क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद् वयो दधे. अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्यन्धसः.. (१) स्तोत्रों को सुन कर सुंदर ठुड्डी वाले इंद्र प्रसन्न होते हैं और शत्रुओं के नगरों का विनाश कर देते हैं. इस बात को कौन नहीं जानता है कि सोम के तैयार होने पर इंद्र कौन सा वैभव धारण करते हैं. (१) दाना मृगो प वारणः पुरुत्रा चरथं दधे. नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महांश्चरस्योजसा.. (२) हे इंद्र! रथ में बैठ कर तुम हर्षित मृग के समान अनेक प्रकार से गमन करते हो. तुम्हारे गमन को रोकने में कोई भी समर्थ नहीं है. तुम अपनी शक्ति के कारण महान हो. हमारे द्वारा सोमरस तैयार किए जाने पर तुम यहां आओ. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-५४ देवता—इंद्र

य उग्रः सन्ननिष्टृत स्थिरो रणाय संस्कृतः. यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्ध्वं नेन्द्रो योषत्या गमत्.. (३) शत्रु जिन की हिंसा नहीं कर पाते, वे युद्धभूमि में डटे रहते हैं. जिस प्रकार पति पत्नी के पास जाता है, उसी प्रकार इंद्र हमारे आह्वान को सुन कर इस यज्ञ में आएंगे. (३) सूक्त-५४ देवता—इंद्र विश्वाः पृतना अभिभूतरं नरं सजूस्ततक्षुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे. क्रत्वा वरिष्ठं वर आमुरिमुतोग्रमोजिष्ठं तवसं तरस्विनम्.. (१) सभी सेनाओं ने शत्रुओं को मूर्च्छित करने वाले इंद्र का वरण किया है. वे इंद्र अत्यधिक शक्तिशाली और उग्र हैं. (१) समीं रेभासो अस्वरन्निन्द्रं सोमस्य पीतये. स्वर्पतिं यदीं वृधे धृतव्रतो ह्योजसा समूतिभिः.. (२) ये स्तोता सोमरस पीने के बाद इंद्र की स्तुति करते हैं. यह सोमरस अपनीअपनी रक्षा शक्ति के साथ इन स्तोताओं की ओर जाता है. (२) नेमिं नमन्ति चक्षसा मेषं विप्रा अभिश्वरा. सुदीतयो वो अद्रुहोऽपि कर्णे तरस्विनः समृक्वभिः.. (३) इंद्र के वज्र पर दृष्टि पड़ते ही स्तोता उन्हें प्रणाम करते हैं. हे स्तोताओ! ऋक्व नाम वाले पितरों सहित, इस वज्र की धमक तुम्हारे कानों को व्यथित न बनाए. (३) सूक्त-५५ देवता—इंद्र तमिन्द्रं जोहवीमि मघवानमुग्रं सत्रा दधानमप्रतिष्कुतं शवांसि. मंहिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्तद् राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री.. (१) मैं ऐसे इंद्र को अपने यज्ञ में बुलाता हूं जो शक्तिशाली, वज्र धारण करने वाले, युद्धों में आगे रहने वाले, उग्र, बल धारक एवं स्तुति के योग्य हैं, वे इंद्र हमारे धन प्राप्ति के मार्गों को सुंदर बनाएं. (१) या इन्द्र भुज आभरः स्वर्वाँ असुरेभ्यः. स्तोतारमिन्मघवन्नस्य वर्धय ये च त्वे वृत्तबर्हिषः.. (२) हे इंद्र! तुम स्वर्ग के स्वामी हो. तुम राक्षसों का वध करने के लिए अपनी जिन भुजाओं को उठाते हो, उन्हीं भुजाओं के द्वारा यजमान और स्तोता की वृद्धि करो. जो ऋत्विज् तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*