भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 957, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 957

अच्युता चिद् वीलिता स्वोजो रुजो वि दृळ्हा धृषता विरप्शिन्.. (६) हे इंद्र! तुम्हारे वज्र का वेग मन के समान है. तुम ने अपनी माया से शक्तिशाली वृत्र का नाश किया है तथा ऐसे शत्रु नगरों को ध्वस्त किया, जिन्हें आज तक कोई नष्ट नहीं कर सका. (६) तं वो धिया नव्यस्या शविष्ठं प्रत्नं प्रत्नवत् परितंसयध्यै. स नो वक्षदनिमानः सुवह्वेन्द्रो विश्वान्यति दुर्गाहाणि.. (७) हे यजमानो! प्राचीन ऋषियों ने जिस प्रकार नवीन स्तोत्रों से इंद्र की प्रशंसा की, उसी प्रकार मैं भी इंद्र की स्तुति करने के लिए उद्यत हूं. सुंदर वाहनों वाले इंद्र सभी कठिन कार्यों में हमें सफलता प्राप्त कराएं. (७) आ जनाय द्रुह्वणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयो ऽन्तरिक्षा. तपा वृषन् विश्वतः शोचिषा तान् ब्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च.. (८) हे इंद्र! पृथ्वी, स्वर्ग और उन के मध्य में स्थित अंतरिक्ष को तुम राक्षसों से रहित बनाओ. तुम अपने तेज से राक्षसों को भस्म कर दो. राक्षस ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं. उन के विनाश के हेतु तुम धरती और आकाश को तेज युक्त बनाओ. (८) भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्. धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजूर्य दयसे वि माया:.. (९) हे इंद्र! तुम स्वर्ग के निवासियों के राजा हो. तुम अपने दाहिने हाथ में वज्र ले कर राक्षसों की माया का विनाश करो. (९) आ संयतमिन्द्र णः स्वस्तिं शत्रुन्तूर्याय बृहतीममृधाम्. यया दासान्यार्याणि वृत्रा करो वज्रिन्सत्सुतुका नाहुषाणि.. (१०) हे वज्रधारी इंद्र! अपनी जिस शक्ति से तुम शत्रुओं के समान मनुष्यों को भी अपनी मंगलकारिणी संपत्ति प्रदान कर के महान बना देते हो, उस महिमा वाली संपत्ति को हमें भी प्रदान करो. (१०) स नो नियुद्भिः पुरुहूत वेधो विश्ववाराभिरा गहि प्रयुज्यो. न या अदेवो वरते न देव आभिर्याहि तूयमा मद्ग्रद्रिक्.. (११) हे इंद्र देव! तुम अत्यधिक पूजा के योग्य, सब के रचयिता तथा यजमानों द्वारा बुलाने योग्य हो. तुम्हारे जिन अश्वों को रोकने में देवता या असुर कोई भी समर्थ नहीं होता, उन्हीं अश्वों की सहायता से तुम हमारे यज्ञ में पधारो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*