भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 961, कुल 1063 में से

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इंद्र ने सोमरस पान कर के प्रसन्न होने पर वर्षा के जल की अंतरिक्ष अर्थात् आकाश से वृष्टि की. उन्होंने अपनी शक्ति से मेघों को विदीर्ण किया. (२) उद् गा आजदङ्गिरोभ्य अविष्कृण्वन् गुहा सतीः. अवाञ्चं नुनुदे वलम्.. (३) जो गाएं गुफा में बंद थीं, इंद्र ने अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के लिए उन्हें बाहर निकाला. गायों का अपहरण करने वाला बल राक्षस था. इंद्र ने उस का मुंह नीचे कर के उसे गिरा दिया. (३) इन्द्रेण रोचना दिवो दृळहानि दृंहितानि च. स्थिराणि न पराणुदे.. (४) इंद्र ने आकाश में प्रकाश करते हुए नक्षत्रों को स्थिर किया है. ये नक्षत्र स्थिर हैं. इन्हें कोई नीचे नहीं गिरा सकता. (४) अपामूर्मिर्मदन्निव स्तोम इन्द्राजिरायते. वि ते मदा अराजिषुः.. (५) हे इंद्र! तुम्हारा स्तोत्र रस के साथ उच्चारण किया जाता है. यह स्तोत्र वर्षा के जल से सरिताओं और सागर को प्रसन्न करता है. इस से सोमरस पीने के कारण तुम्हारा हर्ष प्रकट होता है. (५) सूक्त-४० देवता—इंद्र इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा. मन्दू समानवर्चसा.. (१) हे इंद्र! तुम मरुतों के साथ रहते हो और अपने उपासकों को अभय प्रदान करते हो. मरुतों के साथ रहते हुए तुम प्रसन्न होते हो. मरुतों का और तुम्हारा तेज समान है. (१) अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति. गणैरिन्द्रस्य काम्यैः.. (२) यह यज्ञ इंद्र की कामना करने वालों से अत्यधिक सुशोभित हो रहा है. इंद्र अत्यधिक तेजस्वी और निष्पाप अर्थात् पाप रहित हैं. (२) आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे. दधाना नाम यज्ञियम्.. (३) हवि स्वीकार कर के इंद्र शक्तिशाली बनते हैं और याज्ञिक नाम प्राप्त करते हैं. (३) सूक्त-४१ देवता—इंद्र इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कृतः. जघान नवतीर्नव.. (१)