अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त-१११ देवता—अग्नि इमं मे अग्ने पुरुषं मुमुग्ध्ययं यो बद्धः सुयतो लालपीति. अतो ऽ धि ते कृणवद् भागधेयं यदानुन्मदितो ऽ सति.. (१) हे अग्नि! मेरे इस पुरुष को रोग के आधार पाप से बचाओ. पाप रूपी पाशों से बंधा हुआ यह पुरुष जो नियमित रूप से प्रलाप करता है, इसीलिए यह तुम्हारे निमित्त हवि रूपी भाग अधिक मात्रा में दे. इस प्रकार यह उन्माद रहित बने. (१) अग्निष्टे नि शमयतु यदि ते मन उद्युतम्. कृणोमि विद्वान् भेषजं यथानुन्मदितो ऽ ससि.. (२) हे गंधर्व ग्रह से गृहीत पुरुष! यदि तेरा मन गंधर्व ग्रह के विकार से उद्भ्रांत है तो अग्नि तेरे मन को शांत करें. प्रतिकार को जानता हुआ मैं इस ग्रह विकार की ओषधि करता हूं, जिस से तू उन्माद रहित बन. (२) देवैन्सादुन्मदितमुन्मत्तं रक्षसस्परि. कृणोमि विद्वान् भेषजं यदानुन्मदितो ऽ सति.. (३) हे पुरुष! तूने देवों के विषय में किए हुए पाप के कारण चित्त का उन्माद पाया है. राक्षसों अर्थात् ब्रह्मराक्षस आदि ग्रहों के कारण उन्मत्त इस पुरुष के रोग के प्रतिकार को जानता हुआ मैं इस की ओषधि करता हूं. (३) पुनस्त्वा दुरप्सरसः पुनरिन्द्रः पुनर्भगः. पुनस्त्वा दुर्विश्वे देवा यथानुन्मदितो ऽ ससि.. (४) हे उन्माद से गृहीत पुरुष! अप्सराएं और गंधर्व तेरा उन्माद रोग दूर कर के तुझे हमें पुनः प्रदान करें. इस के पश्चात इंद्र ने तुझे मेरे लिए दिया है. हवि एवं सभी देवों ने तुम्हें मेरे लिए इस हेतु दिया है कि तुम उन्माद रहित हो सको. (४) सूक्त-११२ देवता—अग्नि मा ज्येष्ठं वधीदयमग्न एषां मूलबर्हणात् परि पाह्येनम्. स ग्राह्याः पाशान् वि चृत प्रजानन् तुभ्यं देवा अनु जानन्तु विश्वे.. (१) हे अग्नि! यह वेदना इन पिता, माता, भ्राता आदि के मध्य बड़े भाई का वध न करे. तुम जड़ उखाड़ने के अर्थात् बड़े भाई से पहले विवाह करने वाले दोष के कारण भी इस की रक्षा करो. हे अग्नि! तुम इस को छुड़ाने के उपाय जानते हो, इसीलिए इसे पकड़ने वाली पिशाची के बंधन से छुड़ाओ. इस के बंधन छुड़ाने के लिए सभी देव तुम्हें अनुमति दें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*