भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 1063 में से

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पीड़ित किया है. इंद्र आदि देवों ने अमृत मंथन के समय इस का निर्माण किया था, क्योंकि यही एक ओषधि सभी रोगों के निवारण में समर्थ है. (१) पिप्पल्य १: समवदन्तायतीर्जननादधि. यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. (२) पिप्पलियों ने सागर मंथन के समय अपने जन्म के पश्चात आ कर आकाश में संभाषण किया कि जीवित पुरुष को हम ओषधि के रूप में व्याप्त करते हैं. वह पुरुष नष्ट न हो. (२) असुरास्त्वा न्यखनन् देवास्त्वोदवपन् पुनः. वातीकृतस्य भेषजीमथो क्षिप्तस्य भेषजीम्.. (३) हे पिप्पली! असुरों ने तुझे खोदा तथा देवों ने सभी प्राणियों के हित के लिए तुझे उखाड़ा. तुम वातरोग से पीड़ित की ओषधि बनी हुई आक्षेपक अर्थात् मिरगी नाम के वातरोग की ओषधि हो. (३) सूक्त-११० देवता—अग्नि प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि. स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रायस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व.. (१) सभी देवों की आत्मा होने के कारण ये अग्नि चिरंतन हैं. ये स्तुति के योग्य एवं यज्ञों में देवों को बुलाने वाले हैं. हे अग्नि! इस प्रकार तुम नवीन बने रहते हो. तुम अपने शरीर को घृत आदि से पूर्ण करो तथा हमारे लिए सौभाग्य प्रदान करो. (१) ज्येष्ठघ्न्यां जातो विचृतोर्यमस्य मूलबर्हणात् परि पाह्येनम्. अत्येनं नेषद् दुरितानि विश्वा दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (२) ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न पुत्र पिता, बड़े भाई आदि का हंता होता है. मूल नक्षत्र में उत्पन्न पुत्र पूरे कुल की हिंसा करता है. इसलिए इस कुमार के यम द्वारा किए जाने वाले संतान के मूलोच्छेद से रक्षा करो. सौ वर्ष तक जीवित रहने के दीर्घ जीवन के लिए सभी पाप इस कुमार से दूर चले जाएं. (२) व्याघ्रेऽहन्यजनिष्ट वीरो नक्षत्रजा जायमानः सुवीरः. स मा वधीत् पितरं वर्धमानो मा मातरं प्र मिनीज्जनित्रीम्.. (३) बाघ के समान क्रूर एवं पाप नक्षत्र में वीर पुत्र ने जन्म लिया. दुष्ट नक्षत्र में उत्पन्न यह पुत्र जन्म लेते ही उत्तम शक्ति वाला बने. यह पुत्र बड़ा हो कर पिता का वध न करे तथा जन्म देने वाली माता की हिंसा न करे. (३) ebook converter DEMO Watermarks*