अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वं नो मेधे प्रथमा गोभिरश्वेभिरा गहि. त्वं सूर्यस्य रश्मिभिस्त्वं नो असि यज्ञिया.. (१) हे देव और मनुष्य आदि के द्वारा उपासना की जाती हुई मेधा देवी! तुम हमें देने के लिए गाय और अश्वों के साथ आओ. तुम सूर्य की किरणों के समान अपनी व्याप्ति की सामर्थ्य के साथ हमारे समीप आओ. तुम हमारे लिए यज्ञ के योग्य हो. (१) मेधामहं प्रथमां ब्रह्मणवतीं ब्रह्मजूतामृषिष्टुताम्. प्रपीतां ब्रह्मचारिभिर्देवानामवसे हुवे.. (२) मैं वेदों से युक्त एवं देव, मनुष्य आदि के द्वारा पूजी जाती हुई मेधा देवी का आह्वान करता हूं. ब्राह्मणों के द्वारा सेवित, ऋषियों के द्वारा स्तुति की गई और ब्रह्मचारियों द्वारा सेवित मेधा देवी को मैं इंद्र आदि की रक्षा पाने के लिए बुलाता हूं. (२) यां मेधामृभवो विदुर्यां मेधामसुरा विदुः. ऋषयो भद्रां मेधां यां विदुस्तां मय्या वेशयामसि.. (३) ऋभु नाम के देव जिस मेधा को जानते थे, जिस मेधा को राक्षस जानते थे तथा वसिष्ठ आदि ऋषि वेद शास्त्र विषयक जिस मेधा को जानते थे, उसे हम अपने में स्थापित करते हैं. (३) यामृषयो भूतकृतो मेधां मेधाविनो विदुः. तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कृणु.. (४) जिस मेधा को पृथ्वी आदि तत्त्वों का निर्माण करने में समर्थ, मंत्र द्रष्टा एवं प्रसिद्ध ऋषि जानते हैं. हे अग्नि! उसी मेधा के द्वारा तुम मुझे मेधावी बनाओ. (४) मेधां सायं मेधां प्रातर्मेधां मध्यन्दिनं परि. मेधां सूर्यस्य रश्मिभिर्वचसा वेशयामहे.. (५) मैं प्रातःकाल, सायंकाल और मध्याह्न काल में मेधा देवी की स्तुति करता हूं. मैं सूर्य की किरणों के साथ दिन में स्तुति वचनों के द्वारा उस महानुभावा मेधा को अपने में स्थापित करता हूं. (५) सूक्त-१०९ देवता—पिप्पली पिप्पली क्षिप्तभेषज्यु ३ तातिविद्धभेषजी. तां देवाः समकल्पयन्नियं जीवितवा अलम्.. (१) पिप्पली अर्थात् पीपल ने सभी ओषधियों का तिरस्कार कर दिया है तथा सभी रोगों को ebook converter DEMO Watermarks*