अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंरूपी भाग अग्नि तुम सब को प्राप्त कराते हैं. यह यजमान उस हवि रूपी विधि का अनुगमन करता हुआ आएगा. इस यजमान को तुम स्वर्गलोक में जानना. (१) जानीत स्मैनं परमे व्योमन् देवाः सधस्था विद लोकमत्र. अन्वागन्ता यजमानः स्वस्तीष्टापूर्तं स्म कृणुताविरस्मै.. (२) हे यजमान के साथ स्वर्ग में बैठने वाले देवो! उस स्वर्ग में इस यजमान को जानना. यह यजमान उस हवि रूपी विधि का अनुगमन करता हुआ आएगा. इस यजमान को तुम स्वर्गलोक में पहचान लेना. (२) देवाः पितरः पितरो देवाः. यो अस्मि सो अस्मि.. (३) वसु, रुद्र आदि जो देव हैं, वे हमारे पितर हैं. जो पिता, पितामह आदि हमारे पितर हैं, वे ही देव हैं. उन सब का मैं जो हूं, सो हूं. (३) स पचामि स ददामि स यजे स दत्तान्मा यूषम्.. (४) उन्हीं देवों और पितरों की संतान मैं पाक यज्ञ करता हूं और दान देता हूं. वही मैं यज्ञ करता हूं. अनुष्ठान के फल के कारण मैं पुत्र, पौत्र आदि से रहित न बनूं. (४) नाके राजन् प्रति तिष्ठ तत्रैतत् प्रति तिष्ठतु. विद्धि पूर्तस्य नो राजन्त्स देव सुमना भव.. (५) हे स्वामी सोम! तुम स्वर्गलोक में सुखपूर्वक स्थित रहो, हमारे अनुष्ठान भी स्वर्ग में स्थित रहें. तुम अपने मन में यह निश्चय कर लो कि तुम को मुझे इस अनुष्ठान का फल देना है. हे देव! इस प्रकार के तुम शोभन मन वाले बनो. (५) सूक्त-१२४ देवता—दिव्यजल दिवो नु मां बृहतो अन्तरिक्षादपां स्तोको अभ्यपप्तद् रसेन. समिन्द्रियेण पयसा ऽ हमग्ने छन्दोभिर्यज्ञैः सुकृतां कृतेन.. (१) द्युलोक से अथवा विशाल मेघ रहित आकाश से जल की बूंद मेरे ऊपर गिरी. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इंद्र देव के चिह्न जल से संयुक्त बनूं. मैं वेदमंत्रों और यज्ञों के माध्यम से पुण्यवान जनों द्वारा किए गए कर्म की सहायता से उत्तम फल प्राप्त करूं. (१) यदि वृक्षादभ्यपप्तत् फलं तद् यद्यन्तरिक्षात् स उ वायुरेव. यत्रास्पृक्षत् तन्वो ३ यच्च वासस आपो नुदन्तु निर्ऋतिं पराचैः.. (२) वृक्ष से पानी की जो बूंद मेरे ऊपर गिरी, वह उस वृक्ष का फल ही है. मेघ रहित आकाश ebook converter DEMO Watermarks*