भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 1063 में से

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से जो बूंद मेरे ऊपर गिरी, वह वायु भी है. वर्षा की वे बूंदें मेरे शरीर का स्पर्श करती हैं अथवा मेरे वस्त्रों को भिगोती हैं. वे बूंदें पाप देवता निर्ऋति का प्रक्षालन करने में समर्थ होने के कारण मेरे पापों को दूर करें. (२) अभ्यञ्जनं सुरभि सा समृद्धिर्हिरण्यं वर्चस्तदु पूत्रिममेव. सर्वा पवित्रा वितताध्यस्मत् तन्मा तारीन्निर्ऋतिर्मो अरातिः.. (३) मेरे शरीर पर गिरी हुई वर्षा की बूंद सुगंधित तेल और उबटन मुझे पवित्र करने वाले ही हैं. पवित्रता के सभी कहे गए और न कहे गए साधन मेरे ऊपर फैले हैं. पवित्रता के साधनों से ढके हुए मेरे शरीर को पाप देवता निर्ऋति एवं कोई शत्रु अतिक्रमण न करे. (३) सूक्त-१२५ देवता—वनस्पति वनस्पते वीद्वङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः. गोभिः संनद्धो असि वीडयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (१) हे वृक्ष से बने हुए रस! तेरे अंग दृढ़ हों. तू हमारा सखा, शत्रुओं से हमें पार करने वाला और शोभन वीरों से युक्त है. तू गाय के चर्म से बनी हुई रस्सियों से बंधे होने के कारण दृढ़ हो. तुझ पर बैठा हुआ पुरुष शत्रुओं को जीतने वाला हो. (१) दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्भतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः. अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज.. (२) हे रस! तेरा बल आकाश के पास से प्राप्त हुआ है. सार वाले वृक्षों से प्राप्त बल ही यह रथ है. जलों का बल एवं गाय के चर्म से बनी रस्सियों से ढका हुआ यह रथ इंद्र के वज्र के समान गति वाला हो. हे होता! इस प्रकार के रथ का हव्य से यजन करो. (२) इन्द्रस्यौजौ मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः. स इमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (३) हे दिव्य गुणों से युक्त रथ! तुम इंद्र के बल, मरुतों की सेना, मित्र अर्थात् सूर्य के गर्भ और वरुण की नाभि हो. इस प्रकार के तुम हमारी यज्ञ क्रिया की सेवा करते हुए हवि को ग्रहण करो. (३) सूक्त-१२६ देवता—दुंदुभि उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते वन्वतां विष्ठितं जगत्. स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद् दवीयो अप सेध शत्रून्.. (१) हे दुंदुभि! तू अपने घोष से पृथ्वी और आकाश को भर दे. अनेक प्रकार से स्थित प्राणी ebook converter DEMO Watermarks*

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