भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 1063 में से

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अनेक देशों में तेरा जय घोष सुनें. इस प्रकार का तू संग्राम के देव इंद्र और उन के अनुचर मरुतों के द्वारा हमारे शत्रुओं को दूर से भी दूर स्थान पर भगा दे. (१) आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा अभि ष्टन दुरिता बाधमानः. अप सेध दुन्दुभे दुच्छुनामित इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व.. (२) हे दुंदुभि! तू अपने शब्द से शत्रु की सेना अर्थात् रथ, घोड़े हाथी और पैदल सैनिकों को पराजित कर के हमारे बल को बढ़ा. तू पराजय के कारणों और शत्रुओं द्वारा दिए हुए दुःखों को दूर करता हुआ ऐसा श्रवण कटु शब्द कर, जिस से शत्रुओं के हृदय फट जाएं. तू इस युद्ध स्थल से शत्रुओं की सेना को भगा दे. तू इंद्र देव की मुट्ठी के समान शत्रु नाशकारी है, इसलिए तू दृढ़ हो. (२) प्रामूं जयाभी ३ मे जयन्तु केतुमद् दुन्दुभिर्वावदीतु. समश्वपर्णाः पतन्तु नो नरो ऽ स्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु.. (३) हे इंद्र! तुम दूर दिखाई देने वाली शत्रु सेना को इस प्रकार पराजित करो कि वह दोबारा हम पर आक्रमण न कर सके. हमारे योद्धा शत्रु सेना पर विजय प्राप्त करें तथा विजय सूचक दुंदुभि बजाएं. हमारे सेनानायक घोड़ों पर सवार हो कर युद्ध भूमि में जाएं तथा हमारे अमात्य और राजा विजयी हों. (३) सूक्त-१२७ देवता—वनस्पति विद्रधस्य बलासस्य लोहितस्य वनस्पते. विसल्पकस्योषधे मोच्छिषः पिशितं चन.. (१) हे पलाश वृक्ष एवं हे विसर्प व्याधि की ओषधि! खांसी और सांस से रक्त बहाने वाले विसर्पक रोग से संबंधित मांस, रक्त आदि को हम से दूर करो. (१) यौ ते बलास तिष्ठतः कक्षे मुष्कावपश्रितौ. वेदाहं तस्य भेषजं चीपुद्रुरभिचक्षणम्.. (२) हे खांसी और सांस रोग! तेरे विसर्पक आदि रूप कांख अर्थात् बगल में विदध्रि नाम के विशेष घाव के रूप में स्थित रहते हैं तथा अंडकोषों में आश्रय लेते हैं. मैं उन की ओषधि जानता हूं, चीपुद्र नाम का विशेष वृक्ष इसे मिटाने वाली ओषधि है. (२) यो अङ्ग्यो यः कण्र्यो यो अक्ष्योर्विसल्पकः. वि वृहामो विसल्पकं विद्रधं हृदयामयम्. परा तमज्ञातं यक्ष्ममधराञ्चं सुवामसि.. (३) हमारे हाथ, पैर आदि अंगों में, कानों में और आंखों में जो विसर्पक हैं, उन्हें मैं जड़ से