भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 1063 में से

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पाप किया है, उस से भी हमें बचाओ. (२) उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय. अधा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (३) हे वरुण! हमारे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित अपने पाश को शिथिल करो तथा हमारे शरीर के मध्य भाग में स्थित अपने पाश को भी शिथिल करो. इस के पश्चात् हे अदिति पुत्र वरुण! सभी पापों से छूट कर हम तुम्हारे कर्म में पापरहित होने के लिए सम्मिलित हों. (३) प्रास्मत् पाशान् वरुण मुञ्च सर्वान् य उत्तमा अधमा वारुणा ये. दुष्वप्न्यं दुरितं नि ष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम्.. (४) हे वरुण! तुम्हारे जो उत्तम और अधम पाप हैं, उन सब पापों से हमें छुड़ाओ. दुःस्वप्न में होने वाले पाप को भी हम से दूर करो. पापहीन हो कर हम पुण्य के लोक में पहुंचें. (४) सूक्त-८९ देवता—अग्नि, इंद्र अनाधृष्यो जातवेदा अमर्त्यो विराडग्ने क्षत्रभृद् दीदिहीह. विश्वा अमीवाः प्रमुञ्चन् मानुषीभिः शिवाभिरद्य परि पाहि नो गमय्.. (१) हे अग्नि! कोई तुम्हें तनिक भी पराजित नहीं कर सकता. हे जातवेद! अमर, विराट् और क्षत्र बल को धारण करने वाले वरुण हमारे इस यज्ञ स्थल में अतिशय दीप्त बनें तथा सभी रोगों का विनाश कर के इस समय सभी मनुष्य संबंधी कल्याणों से हमारे घरों की रक्षा करें. (१) इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजो ऽ जायथा वृषभ चर्षणीनाम्. अपानुदो जनममित्रायन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्.. (२) हे इंद्र! तुम कष्ट से त्राण करने वाले बल को धारण कर के उत्पन्न हुए हो. हे अभिमत फल देने वाले! जो हम मनुष्यों की उत्पत्ति के पश्चात शत्रु के समान आचरण करता है, उस को हम से दूर कर के तुम ने देवों के लिए स्वर्ग नाम का विस्तीर्ण लोक बनाया है. (२) मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगम्यात् परस्याः. सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व.. (३) इंद्र बुरे चरणों वाले एवं पर्वत निवासी सिंह के समान भयानक हैं. वह अत्यधिक दूरवर्ती आकाश से आएं. आने के पश्चात वे अपने गतिशील वज्र को भलीभांति तेज कर के हमारे शत्रुओं को मारें तथा संग्राम के लिए उद्यत अन्य शत्रुओं का भी विनाश करें. (३) सूक्त-९० देवता—गरुड़ ebook converter DEMO Watermarks*