अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 409, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त-१०० देवता—गृद्ध उदस्य श्यावौ विथुरौ गृध्रौ द्यामिव पेततुः. उच्छोचनप्रशोचनावस्योच्छोचनौ हृदः.. (१) इस शत्रु के नित्य चलने वाले दोनों काले होंठ विदीर्ण हो जाएं तथा इस प्रकार गिर पड़ें, जिस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ गिद्ध नीचे गिरता है. उच्छोचन और प्रशोचन नामक मृत्यु देव इस शत्रु के हृदय को अधिक रूप में शोक पहुंचाने वाले हों. (१) अहमेनावुदतिष्ठिपं गावौ श्रान्तसदाविव. कुर्कुराविव कूजन्तावुदवन्तौ वृकाविव.. (२) अनुष्ठान करने वाला मैं इस शत्रु के दोनों काले होंठों को इस प्रकार उखाड़ता हूं, जिस प्रकार थक कर बैठी हुई गायों को डंडे से कोंच कर उठाया जाता है. भूंकते हुए कुत्तों को पत्थर आदि फेंक कर भगाया जाता है और गायों के झुंड में से बछड़ों को पकड़ कर ले जाते हुए भेड़ियों को ग्वाले बलपूर्वक भगाते हैं. (२) आतोदिनौ नितोदिनावथो संतोदिनावुत. अपि नह्याम्यस्य मेढ्रं य इतः स्त्री पुमान्जभार.. (३) सभी प्रकार से व्यथा पहुंचाने वाले शत्रु के अत्यधिक बाधा डालने वाले दोनों होंठों को मैं उखाड़ता हूं जो मिल कर बोलते हुए मुझे व्यथित करते हैं. हम से द्वेष रखने वाले जिस पुरुष अथवा स्त्री ने इस स्थान से हमारा धन चुराया है, उस शत्रु के प्रजनन अंग को भी मैं बांधता हूं. (३) सूक्त-१०१ देवता—पक्षी असदन् गावः सदने ऽ पप्तद् वसतिं वयः. आस्थाने पर्वता अस्थुः स्थाम्नि वृक्कावतिष्ठिपम्.. (१) गाय जिस प्रकार गोशाला में बैठती है, पक्षी जिस प्रकार अपने घोंसले में जाते हैं और पर्वत जिस प्रकार अपने स्थान पर स्थित रहते हैं, मैं अपने शत्रु के घर में उसी प्रकार भेड़ियों को स्थापित करता हूं. (१) सूक्त-१०२ देवता—इंद्र, अग्नि यदद्य त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन् होतश्चिकित्वन्नवृणीमहीह. ध्रुवमयो ध्रुवमुता शविष्ठ प्रविद्वान् यज्ञमुप याहि सोमम्.. (१) eBook converter DEMO Watermarks*