भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 410

हे यज्ञ में देवों का आह्वान करने वाले एवं हे ज्ञानवान अग्नि! हम ने तुम्हें आज इस यज्ञ में होता के रूप में वरण किया है, इसीलिए तुम निश्चय ही यज्ञ करो तथा इस यज्ञ कर्म के दोषों को शांत करो. तुम इस यज्ञ को विशेष रूप से सोमरस युक्त जानकर आओ. (१) समिन्द्र नो मनसा नेष गोभिः सं सूरिभिर्हरिवन्त्सं स्वस्त्या. सं ब्रह्मणा देवहितं यदस्ति सं देवानां सुमतौ यज्ञियानाम्.. (२) हे इंद्र! हमें स्तुति रूपी शब्दों से युक्त कर के बोलने में कुशल बनाओ, जिस से हम तुम्हारी स्तुति कर सकें. हे अश्वों के स्वामी इंद्र! हमें विद्वानों से युक्त करो, जिस से हमारा विनाश न हो. हमें ब्रह्म ज्ञान एवं देव हितकारी अग्निहोत्र आदि से युक्त बनाओ. हमें अग्नि आदि यज्ञ के योग्य देवों की सुमति में स्थापित करो. (२) यानावह उशतो देव देवांस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे. जक्षिवांसः पपिवांसो मधून्यस्मै धत्त वसवो वसूनि.. (३) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम ने हवि की कामना करने वाले देवों का आह्वान किया है. तुम उन्हें अपने निवास स्थान में रहने के लिए प्रेरित करो. हे पुरोडाश का भक्षण करने वाले, मधु रस से युक्त आज्य को पीने वाले एवं लोकों के रक्षक देवो! तुम इस यजमान के लिए धन दो. (३) सुगा वो देवाः सदना अकर्म य आजग्म सवने मा जुषाणाः. वहमाना भरमाणाः स्वा वसूनि वसुं घर्मं दिवमा रोहतानु.. (४) हे देवो! तुम्हारे घर सुख से पहुंचने योग्य बनाए गए हैं. हवि का सेवन करने वाले तुम सब घरों में आए थे. तुम अपने धनों को प्राप्त कर के हमारा पोषण करते हुए समस्त लोक में निवास करने वाले आदित्य में स्थित बनो और हमें धन देने के पश्चात अपने स्थान को जाओ. (४) यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ. स्वां योनिं गच्छ स्वाहा.. (५) हे यज्ञ! तू यज्ञ कर ने योग्य परमात्मा विष्णु के समीप जा, जिस से तू प्रतिष्ठित हो सके. इस के पश्चात तू यज्ञ का पालन करने वाले यजमान को फल देने के हेतु प्राप्त हो. इस के पश्चात तू सारे संसार के कारण बने हुए परमेश्वर की शक्ति को प्राप्त कर. यह आज्य शोभन आहुति वाला हो. (५) एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः. सुवीर्यः स्वाहा.. (६) हे यजमान! यह यज्ञ विविध स्तोत्रों वाला, शोभन पुत्र, पौत्र आदि से युक्त हो एवं तुम्हें मिले. यह आज्य शोभन आहुति वाला हो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*