भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 1063 में से

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तृष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि. परिवृक्ता यथासस्यृषभस्य वशेव.. (२) हे तृष्टिका नामक जड़ीबूटी! तेरा स्वभाव दाह उत्पन्न करना है. जिस प्रकार तू विष स्वरूपा एवं विष का संयोग करने वाली है तथा जिस प्रकार तू सभी के द्वारा वर्जित है, जिस प्रकार बांझ गाय सांड के लिए त्याज्य होती है, उसी प्रकार वह नारी पुरुष के लिए विष रूपिणी हो. (२) सूक्त-११९ देवता—अग्नि, सोम आ ते ददे वक्षणाभ्य आ ते ऽ हं हृदयाद् ददे. आ ते मुखस्य संकाशात् सर्वं ते वर्च आ ददे.. (१) हे नारी! मैं तेरी योनि एवं जांघों के तेज का अपहरण करता हूं. हे नारी! मैं तेरे स्वस्थ मन से साधु पुरुष के ध्यान रूपी तेज का अपहरण करता हूं. मैं तेरे मुख से सब को प्रसन्न करने वाले तेज का अपहरण करता हूं. अधिक क्या कहूं, मैं तेरे सभी अंगों से सौभाग्य रूपी तेज का अपहरण करता हूं. (१) प्रेतो यन्तु व्याध्यः प्रानुध्याः प्रो अशस्तयः. अग्नी रक्षस्विनीर्हन्तु सोमो हन्तु दुरस्यतीः.. (२) मानसिक व्याधियां इस गृह के पीड़ित पुरुष से दूर चली जाएं तथा मानसिक व्याधियों से संबंधित लगातार स्मरण भी इस से दूर हो जाए. दूसरों के द्वारा होने वाली निंदा एवं हिंसा भी इस से दूर रहे. अग्नि देव राक्षसों और राक्षसियों का विनाश करें तथा सोमदेव दूसरों द्वारा होने वाली बुरी इच्छाओं को इस से दूर करें. (२) सूक्त-१२० देवता—सविता प्र पतेतः पापि लक्ष्मि नश्येतः प्रामुतः पत. अयस्मयेनाङ्केन द्विषते त्वा सजामसि.. (१) हे पाप रूपिणी लक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता! तू इस प्रदेश से दूर चली जा. तू इस प्रदेश में दिखाई मत दे तथा इस प्रदेश से बहुत दूर चली जा. मैं तुझे अपने शत्रु के साथ लोहे के कांटों से बांधता हूं. (१) या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टा ऽ भिचस्कन्द वन्दनेव वृक्षम्. अन्यत्रास्मत् सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः.. (२) वंदना नाम की लताविशेष जिस प्रकार वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है, उसी प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*

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