अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे बालक! मैं तुझे शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, वसंत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु के लिए देता हूं. हे बालक! जिन वर्षों में भोग के साधन गेहूं, जौ आदि बढ़ते हैं, वे वर्ष तेरे लिए सुखकारी हों. (२२) मृत्युरीशे द्विपदां मृत्युरीशे चतुष्पदाम्. तस्मात् त्वां मृत्योर्गोपतेरुद्धरामि स मा बिभेः.. (२३) मृत्यु देव दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. जिस प्रकार ग्वाला पशुओं का स्वामी होता है, उसी प्रकार मृत्यु देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं. मैं तेरा मृत्यु से उद्धार करता हूं. तू भयभीत न हो. (२३) सो ऽ रिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसि मा बिभेः. न वै तत्र म्रियन्ते नो यन्त्यधमं तमः.. (२४) हे मृत्यु देव से विमुख अर्थात् मृत्यु की हिंसा से रहित पुरुष! तू मरेगा नहीं. तू मरेगा नहीं, इसीलिए भय मत कर. जिस स्थान में शांति कर्म किया जाता है, वहां के लोग प्राण त्याग नहीं करते हैं तथा असहनीय मूर्च्छा को भी प्राप्त नहीं करते. (२४) सर्वो वै तत्र जीवति गौरश्वः पशुः. यत्रेदं ब्रह्म क्रियते परिधिर्जीवनाय कम्.. (२५) जहां गाय, घोड़े, पुरुष और पशु सभी जीवित रहते हैं, वहां महाशांति के लिए यज्ञ कर्म एवं राक्षस, पिशाच आदि का निवारण करने वाला कर्म किया जाता है जो जीवन के लिए कल्याणकारी होता है. (२५) परि त्वा पातु समानेभ्यो ऽ भिचारात् सबन्धुभ्यः. अमम्रिर्भवा ऽ मृतो ऽ तिजीवो मा ते हासिषुरसवः शरीरम्.. (२६) हे शांति चाहने वाले पुरुष! मेरे द्वारा किया गया शांति कर्म सभी ओर से तेरा पालन करे. यह तुझे विद्या एवं ऐश्वर्य में समान अन्य मनुष्यों और संबंधियों द्वारा किए हुए जादूटोने से बचाए. तेरी मृत्यु न हो और तू अत्यधिक जीवन प्राप्त करे. प्राण तेरे शरीर का त्याग न करें. (२६) ये मृत्यव एकशतं या नाष्ट्रा अतितार्याः. मुञ्चन्तु तस्मात् त्वां देवा अग्नेर्वैश्वानरादधि.. (२७) यमराज के जो प्रसिद्ध आयुध ज्वर, सिरदर्द आदि सौ संख्या में हैं और जो लोगों का नाश करने वाले हैं, उन से बचना कठिन है. अग्नि और वैश्वानर आदि देव तुझे उन सब से बचाएं. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*