अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांच तत्त्व—पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की उत्पत्ति हुई. बृहत् बृहती से उत्पन्न हुआ तो बृहती निर्मित कैसे हुई? (४) बृहती परि मात्रया मातुर्मात्राधि निर्मिता. माया ह जज्ञे मायाया मायाया मातली परि.. (५) बृहती मात्राओं अर्थात् पंचतन्मात्राओं से बढ़ कर है, क्योंकि पंच तन्मात्राएं अपनी माता प्रकृति से जन्मती हैं. ये माया से ही उत्पन्न हुईं. इस प्रकार मातली माया से महान है. (५) वैश्वानरस्य प्रतिमोपरि द्यौर्यावद् रोदसी विबबाधे अग्निः. ततः षष्ठादामुतो यन्ति स्तोमा उदितो यन्त्यभि षष्ठमह्नः.. (६) यह द्यौ वैश्वानर अग्नि पर ही स्थित है. धरती और आकाश जहां तक हैं, वहीं तक अग्नि देव बाधा पहुंचा सकते हैं. दिन के छठे भाग से स्तोत उत्पन्न हुआ. उस छठे भाग से ये आते हैं. (६) षट् त्वा पृच्छाम ऋषयः कश्यपेमे त्वं हि युक्तं युयुक्षे योग्यं च. विराजमाहुर्ब्रह्मणः पितरं तां नो वि धेहि यतिधा सखिभ्यः.. (७) हे कश्यप ऋषि! आप युक्त और योग्य को संयुक्त करते हैं. हम छः ऋषि तुम से पूछते हैं कि विराट् को ब्रह्म का पिता क्यों कहा जाता है. इन सखाओं को उस ब्रह्म का उपदेश करो. (७) यां प्रच्युतामनु यज्ञाः प्रच्यवन्त उपतिष्ठन्त उपतिष्ठमानाम्. यस्या व्रते प्रसवे यक्षमेजति सा विरादृषयः परमे व्योमन्.. (८) जिस के अनुपस्थित होने पर यज्ञ नहीं होते तथा जिस के उपस्थित होने पर यज्ञ का अनुष्ठान होता है, जिस से संबंधित व्रत होने पर यज्ञ प्राप्त होता है, उसी विराट् के परम व्योम में होने की बात कही जाती है. (८) अप्राणैति प्राणेन प्राणतीनां विराट् स्वराजमभ्येति पश्चात्. विश्वं मृशन्तीमभिरूपां विराजं पश्यन्ति त्वे न त्वे पश्यन्त्येनाम्.. (९) हे ऋषियो! प्राण वायु से हीन विराट् प्राण वायु का सेवन करने वाली प्रजाओं के प्राण के रूप में प्रवेश करता है. इस के पश्चात वह स्वराज को प्राप्त होता है. अनुरूप एवं जीवित विश्व में विराट् को देखा जाता है तथा नहीं भी देखा जाता. (९) को विराजो मिथुनत्वं प्र वेद क ऋतून् क उ कल्पमस्याः. क्रमान् को अस्याः कतिधा विदुग्धान् को अस्या धाम कतिधा व्युष्टीः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*