अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजापति विराट् के मिथुन को जानते हैं. ऋतुओं और कल्पों के जानने वाले भी वे ही हैं. प्रजापति ही इस के क्रमों को जानते हैं कि वे कितने हैं तथा वे ही इस के स्थानों की संख्या जानते हैं. (१०) इयमेव सा या प्रथमा व्यौच्छदास्वितरासु चरति प्रविष्टा. महान्तो अस्यां महिमानो अन्तर्वधूर्जिगाय नवगज्जन्त्री.. (११) वह विराट् ही है, जो सब से पहले उषा के रूप में उत्पन्न हुआ था तथा उसी ने सृष्टि का अंधकार मिटाया था. विराट् से संबंधित उषा ही समस्त उषाओं में प्रवेश कर के प्रकाश करती है. सोम, सूर्य, अग्नि आदि सभी देव विराट् के अधीन हैं. विराट् रूप उषा ही सूर्य की पत्नी है. (११) छन्दः पक्षे उषसा पेपिशाने समानं योनिमनु सं चरेते. सूर्यपत्नी सं चरतः प्रजानती केतुमर्ती अजरे भूरिरेतसा.. (१२) वृद्धावस्था को प्राप्त न होने वाले छंद पक्षी उषा रूपी विराट् के प्रकट होते ही समान कारण का अनुसरण करते हैं. सूर्य की पत्नी उषा ज्योति के वीर्य को जानती है. (१२) ऋतस्य पन्थामनु तिस्र आगुस्त्रयो घर्मा अनु रेत आगुः. प्रजामेका जिन्वत्यूर्जमेका राष्ट्रमेका रक्षति देवयूनाम्.. (१३) सूर्य, चंद्र एवं अग्नि—ये तीनों सत्यों के मार्ग पर चलते एवं शक्ति के अनुसार अपने धर्म का पालन करते हैं. इन तीन में से एक की शक्ति ऋत्विजों को प्राप्त करती है. दूसरी शक्ति बल की वृद्धि करती है और तीसरी शक्ति राष्ट्र की रक्षा करती है. (१३) अग्नीषोमावदधुर्या तुरीयासीद् यज्ञस्य पक्षावृषयः कल्पयन्तः. गायत्रीं त्रिष्टुभं जगतीमनुष्टुभं बृहदर्की यजमानाय स्व राभरन्तीम्.. (१४) अग्नि तथा सोम ने एवं यज्ञ की कल्पना करते हुए ऋषियों ने उस शक्ति को धारण किया जो चौथी थी. इस के पश्चात उस के गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप् और अर्की नामक पद्य बनाए गए. (१४) पञ्च व्युष्टीरनु पञ्च दोहा गां पञ्चनाम्नीमृतवो ऽ नु पञ्च. पञ्च दिशः पञ्चदशेन कॢप्तास्ता एकमूर्ध्नीरभि लोकमेकम्.. (१५) पांच शक्तियों के अनुकूल पांच दोहन, पांच गाएं एवं पांच ऋतुएं बनाई गईं. पांच दिशाएं इन पंद्रह अर्थात् पांच दोहनों, पांच गायों और पांच ऋतुओं के द्वारा समर्थ हुईं. ये योगी के लिए एक लोक के रूप में बनीं. (१५) षड् जाता भूता प्रथमजर्तस्य षडु सामानि षडहं वहन्ति. ebook converter DEMO Watermarks*