भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 1063 में से

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सोदक्रामत् सामन्त्रणे न्यक्रामत्.. (१२) उस विराट् ने पुनः उत्क्रम किया और वह आमंत्रण में प्रवेश कर गया. (१२) यन्त्यस्यामन्त्रणमामन्त्रणीयो भवति य एवं वेद.. (१३) जो इस बात को जानता है, वह आमंत्रणीय अर्थात् आमंत्रण के योग्य बन जाता है और सभी जन उस का आमंत्रण स्वीकार करते हैं. (१३) सूक्त-१० (२) देवता—विराट् सोदक्रामत् सा ऽ न्तरिक्षे चतुर्धा विक्रा ऽ न्तातिष्ठत्.. (१) उस विराट् ने अंतरिक्ष में उत्क्रमण किया और उत्क्रमण कर के वह चार प्रकार से स्थित हुआ. (१) तां देवमनुष्या अब्रुवन्नियमैव तद् वेद यदुभय उपजीवेमेमामुप ह्वयामहा इति.. (२) इस से देवों और मनुष्यों ने कहा— “इसे जो जानता है, वे दोनों ज्ञाता और गेय के सहारे जीवित हैं. हम उन का आह्वान करते हैं.” (२) तामुपाह्वयन्त.. (३) उन्होंने उसे बुलाया. (३) ऊर्ज एहि स्वध एहि सूनृत एहीरावत्येहीति.. (४) हे ऊर्जा! यहां आओ. हे स्वधा! हमारे समीप आओ. हे सूनृता! यहां आओ. हे इरावती! हमारे समीप आओ. (४) तस्या इन्द्रो वत्स आसीद् गायत्र्यभिधान्यभ्रमूध:.. (५) इंद्र उस का बछड़ा बना, गायत्री उस की रस्सी बनी और मेघ उस के थन बनें. (५) बृहच्च रथन्तरं च द्वौ स्तनावास्तां यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च द्वौ.. (६) बृहत् साम और रथंतर साम उस गाय के दो थन थे. उस गाय के शेष दो थन— यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य. (६) ओषधीरेव रथन्तरेण देवा अदुहन् व्यचो बृहता.. (७) eBook converter DEMO Watermarks*