भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 488

अमोतं वासो दद्याद्धिरण्यमपि दक्षिणाम्. तथा लोकान्तसमाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवा:.. (१४) जो स्वर्ण की दक्षिणा को वस्त्र में लपेट कर देता है, वह पुरुष दिव्य एवं पार्थिव लोकों को प्राप्त करता है. (१४) एतास्त्वाजोप यन्तु धारा: सोम्या देवीर्घृतपृष्ठा मधुश्रुतः. स्तभान पृथिवीमुत द्यां नाकस्य पृष्ठे ऽ धि सप्तरश्मौ.. (१५) हे अज! ये घृत मिश्रित और मधु टपकाने वाली सोमरस की दिव्य धाराएं तुझे प्राप्त हों. तू सूर्य के ऊपर स्थित स्वर्ग में विराजमान हो कर पृथ्वी और द्यौ को स्तंभित कर. (१५) अजो ३ स्यज स्वर्गो ऽ सि त्वया लोकमङ्गिरसः प्राजानन्. तं लोकं पुण्यं प्र ज्ञेषम्.. (१६) हे अज! तू स्वर्ग है. तेरे द्वारा ही अंगिरावंशी ऋषियों ने स्वर्ग को जाना है. मैं ने भी तेरे द्वारा उस पुण्यशाली लोक का ज्ञान प्राप्त किया है. (१६) येना सहस्रं वहसि येनाग्ने सर्ववेदसम्. तेनेमं यज्ञं नो वह स्वर्देवेषु गन्तवे.. (१७) हे अग्नि! अपने जिस बालक के द्वारा तुम हजारों प्रकार के ऐश्वर्य को देवों तक ले जाते हो, स्वर्ग प्राप्ति के निमित्त हमारे इस यज्ञ को उसी बल के द्वारा देवताओं तक पहुंचाओ. (१७) अजः पक्वः स्वर्गे लोके दधाति पञ्चौदनो निर्ऋतिं बाधमानः. तेन लोकान्सूर्यवतो जयेम.. (१८) पंचौदन के रूप में पका हुआ अज स्वर्गलोक में स्थापित करता है और पाप की देवी निर्ऋति को बाधा पहुंचाता है. हम इस अज रूपी धन के द्वारा सूर्यवान लोकों पर विजय प्राप्त करें. (१८) यं ब्राह्मणे निदधे यं च विक्षु या विप्रुष ओदनानामजस्य. सर्वं तदग्ने सुकृतस्य लोके जानीतान्नः संगमने पथीनाम्.. (१९) अज के ओदन की जिन बूंदों को ब्राह्मणों के मध्य एवं प्रजाओं में स्थापित करते हैं, हे अग्नि देव! वह सब हमें पुण्यात्माओं के लोक में एवं भागों के संगम में जानें. (१९) अजो वा इदमग्रे व्यक्रमत तस्योर इयमभवद् द्यौः पृष्ठम्. अन्तरिक्षं मध्यं दिशः पार्श्वे समुद्रौ कुक्षी.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*

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