भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 489

अज ने सब से पहले व्यतिक्रमण किया तो उस का पेट भूमि, पीठ द्यौ, अंतरिक्ष मध्य भाग, पसलियां दिशाएं और कोखें सागर हुईं. (२०) सत्यं चर्तं च चक्षुषी विश्वं सत्यं श्रद्धा प्राणो विराट् शिरः. एष वा अपरिमितो यज्ञो यदजः पञ्चौदनः.. (२१) अज के नेत्र सत्य और ऋत हुए, प्राण श्रद्धा हुए एवं शीश विराट् हुआ. इस प्रकार वह अज वास्तव में विश्व हुआ. यह पंचौदन रूपी अज असीमित यज्ञ है. (२१) अपरिमितमेव यज्ञमाप्नोत्यपरिमितं लोकमव रुन्द्धे. यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२२) जो यजमान दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में देता है, वह यज्ञ के असीमित फल को प्राप्त करता है तथा अपरिमित लोकों का उद्घाटन करता है. (२२) नास्यास्थीनि भिन्द्यान्न मज्ज्ञो निर्धयेत्. सर्वमेनं समादायैदमिदं प्र वेशयेत्.. (२३) न तो इस अज की हड्डियों को तोड़े और न इस की मज्जा अर्थात् चरबी को धोए. इसे पूर्ण रूप से ले कर यह कहे कि मैं इस में प्रवेश करता हूं. (२३) इदमिदमेवास्य रूपं भवति तेनैनं सं गमयति. इषं मह ऊर्जमस्मै दुहे यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२४) उस का रूप यही है. इसी से वह हम को फल प्राप्त कराता है. जो दक्षिणा से प्रकाशित अज का पंचौदन के रूप में दान करता है, वह अज दानकर्ता को अन्न के साथ बल प्रदान करता है. (२४) पञ्च रुक्मा पञ्च नवानि वस्त्रा पञ्चास्मै धेनवः कामदुघा भवन्ति. यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२५) जो दक्षिणा से प्रकाशित होते हुए अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, उस को पांच स्वर्ण मुद्राएं, पांच नवीन वस्त्र और इच्छानुसार दूध देने वाली पांच गाएं प्राप्त होती हैं. (२५) पञ्च रुक्मा ज्योतिरस्मै भवन्ति वर्म वासांसि तन्वे भवन्ति. स्वर्गं लोकमश्नुते यो ३ जं पञ्चौदनं दक्षिणाज्योतिषं ददाति.. (२६) जो दक्षिणा से प्रकाशित अज को पंचौदन के रूप में दान करता है, वह स्वर्गलोक का भोग करता है. उसे चमकती हुई पांच स्वर्ण मुद्राएं तथा शरीर पर वस्त्र और कवच प्राप्त होते