अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअस्मिन् वसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अग्निः. इममादित्या उत विश्वे च देवा उत्तरस्मिन् यन्ज्योतिषि धारयन्तु.. (१) भांतिभांति की धन संपत्ति की कामना करने वाले इस पुरुष को वसु, इंद्र, पूषा, वरुण, मित्र, अग्नि एवं विश्वे देव धन प्रदान करें तथा ये देव इसे उत्तम ज्योति संपन्न बनाएं. (१) अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्. सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (२) हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ. (२) येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः. तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रैष्ठ्य आ धेह्येनम्.. (३) हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! आप ने जिन उत्तम मंत्रों द्वारा इंद्र के लिए दुग्ध, घृत आदि रस हवि के रूप में प्राप्त कराए, हे अग्नि! उन्हीं मंत्रों के द्वारा इस पुरुष की वृद्धि करो एवं इसे अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनाओ. (३) एषां यज्ञमुत वर्चो ददे ऽ हं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने. सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो. (४) सूक्त-१० देवता—वरुण अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः. ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि.. (१) इंद्रादि देवों में वरुण पापियों को दंड देने वाले हैं. इस प्रकार के यह वरुण सब से उत्कृष्ट हैं. सभी पदार्थ तेजस्वी वरुण देव के वश में हैं. इसलिए मैं वरुण की स्तुति संबंधी मंत्रों से शक्ति प्राप्त कर के वरुण देव के प्रचंड कोप के कारण उत्पन्न जलोदर रोग वाले इस पुरुष को रोगमुक्त करता हूं. (१) नमस्ते राजन् वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि दृग्धम्. सहस्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तव्तायम्.. (२)