भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 500

यत् परिवेष्टारः पात्रहस्ताः पूर्वे चापरे च प्रपद्यन्ते चमसाध्वर्यव एव ते.. (३) हाथों में पात्र लिए जो परोसने वाले आगेपीछे चलते हैं, वे ही यज्ञ के चमस और अध्वर्यु हैं. (३) तेषा नं कश्चनाहोता.. (४) उन अतिथियों में कोई भी ऐसा नहीं है जो होता अर्थात् हवन करने वाला न हो. (४) यद् वा अतिथिपतिरतिथीन् परिविष्य गृहानुणेदैत्यवभृथमेव तदुपावैति.. (५) जो अतिथि सत्कार कर्ता अतिथियों को भोजन परोस कर घरों में आता है, वह यज्ञ के पश्चात होने वाले अवभृथ स्नान का फल प्राप्त करता है. (५) यत् सभागयति दक्षिणाः सभागयति यदनुतिष्ठत उदवस्यत्येव तत्.. (६) जो यजमान भोज्य पदार्थों को अलगअलग करता हुआ तथा दक्षिणा देता हुआ अनुष्ठान करता है, वह उदवास करता है. (६) स उपहूतः पृथिव्यां भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यत् पृथिव्यां विश्वरूपम्.. (७) वह बुला कर पृथिवी के समस्त प्राणियों को भोजन कराता है, उस अतिथि सत्कार में मानो विश्वरूप ही बुलाए जाते हैं. (७) स उपहूतो ऽ न्तरिक्षे भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यदन्तरिक्षे विश्वरूपम्.. (८) वह बुलाने पर स्वर्ग में भोजन करता है. अंतरिक्ष में जो विश्वरूप है, वह उस के यहां बुलाया जाता है. (८) स उपहूतो दिवि भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् दिवि विश्वरूपम्.. (९) वह बुलाए जाने पर स्वर्ग में भक्षण करता है. स्वर्ग में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया जाता है. (९) स उपहूतो देवेषु भक्षयत्युपहूतस्तस्मिन् यद् देवेषु विश्वरूपम्.. (१०) वह बुलाए जाने पर देवों के मध्य भोजन करता है. देवों में जो विश्वरूप है, उस में वह बुलाया जाता है. (१०) eBook converter DEMO Watermarks*