अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंका अन्न लिए हुए मनुष्य इस कथा के समीप पहुंच जाते हैं. (८) युक्ता मातासीद् धुरिदक्षिणाया अतिष्ठद् गर्भो वृजनीष्वन्तः. अमीमेद् वत्सो अनु गामपश्यद् विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु.. (९) माता दक्षिण दिशा में स्थित हुई. इस के पश्चात बलवती नारियों में गर्भ स्थापित हुआ. जन्म लेने के पश्चात बछड़ा गाय की ओर देखता हुआ रंभाने लगा. विश्वरूप तीन योजनों में व्याप्त हुआ. (९) तिस्रो मातृस्त्रीन् पितॄन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्त. मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदो वाचमविश्वविन्नाम्.. (१०) तीन माताओं और तीन पिताओं को धारण करता हुआ सूर्य इन के मध्य में स्थित है. विश्व का ज्ञान रखने वाले आकाश के पृष्ठ पर यही वाणी बोलते हैं, जिसे दूसरे लोग नहीं सुन पाते. (१०) पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा. तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न च्छिद्यते सनाभिः.. (११) पांच अरों वाला पहिया चलता है. उस में समस्त भुवन स्थित हैं. उस के अधिक भार को सहने वाली धुरी स्वयं स्थापित नहीं होती. वह धुरी रूपी नाभि पुरानी होने पर टूटती नहीं है. (११) पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम्. अथेमे अन्य उपरे विचक्षणे सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितम्.. (१२) बारह आकृतियों अर्थात् बारह मासों और पांच चरणों अर्थात् ऋतुओं वाले पिता अर्थात् सूर्य को स्वर्ग के ऊपरी भाग में सोने वाला कहा गया है. अन्य चतुर जन इस में सात पहियों और छः अरों को स्थित बताते हैं. (१२) द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य. आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विशतिश्च तस्थुः.. (१३) बारह अरों वाला पहिया अर्थात् सूर्य स्वयं गति करता हुआ भी जीर्ण नहीं होता है. हे अग्नि! सात सौ बीस युगल अर्थात् तीन सौ साठ दिन और रात के जोड़े उस के पुत्र रूप में स्थित हैं. (१३) सनेमि चक्रमजरं वि वावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति. सूर्यस्य चक्षू रजसैत्यावृतं यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*