अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 510, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंकभी प्राचीन न होने वाला बारह मासों रूपी अरों से युक्त सूर्य रूपी पहिया सदैव चलता रहता है. दस घोड़े उस पहिए को आगे बढ़ाते हैं. सूर्य के नेत्र अंधकार से ढके होते हैं. उसी में समस्त विश्व स्थित रहता है. (१४) स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः पश्यदक्षण्वान् न वि चेतदन्धः. कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत यस्ता विजानात् स पितुष्पिता ऽ सत्.. (१५) सभी स्त्रियां उसी को ज्ञानी पुरुष कहती हैं, जो उन्हें क्षयहीन प्रतीत होता है. इस के विपरीत दशा वाले पुरुष को वे ज्ञान शून्य समझती हैं. जो विद्वान् पुत्र इस बात को जानता है, वह पालकों का भी पालन करता है. (१५) साकंजानां सप्तथमाहुरेकजं षडिद्यमा ऋषयो देवजा इति. तेषामिष्टानि विहितानि धामश स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः.. (१६) देवों के साथ उत्पन्न ऋषि छः बताए गए हैं. ऋषि और देव बताते हैं कि यह छः एक से ही उत्पन्न हुए हैं. इस के मनचाहे स्थान निश्चित हैं. ये अनेक प्रकार से विराजमान होते हैं. (१६) अवः परेण पर एना ऽ वरेण पदा वत्सं बिभ्रती गौरुदस्थात्. सा कद्रीची कं स्विदर्धं परागात् क्व स्वित् सूते नहि यूथे अस्मिन्.. (१७) धवल वर्ण की गौ अगले पैर से अन्न को तथा पिछले पैर से अपने बछड़े को धारण करती हुई उड़ती है. वह किसी आधे भाग में गई थी. वह इस झुंड में बच्चा नहीं देती. (१७) अवः परेण पितरं यो अस्य वेदावः परेण पर एनावरेण. कवीयमानः क इह प्र वोचद् देवं मनः कुतो अधि प्रजातम्.. (१८) अगले पैरों के द्वारा इस के पिता अन्न को जानने वाला एवं पिछले पैरों के द्वारा पर को जानने वाला दिव्य मन कहां से प्रकट हुआ? यह बात प्रजापति ने कही. (१८) ये अर्वाञ्चस्ताँ उ पराच आहुर्ये पराञ्चस्ताँ उ अर्वाच आहुः. इन्द्रश्च या चक्रथुः सोम तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति.. (१९) जो नवीन हैं, वे प्राचीन के विषय में बताते हैं और जो प्राचीन हैं, वे नवीनों का परिचय देते हैं. हे सोम! तुम और सोम जिन्हें स्थापित करते हैं, वे लोक को धारण करने में समर्थ बनते हैं. (१९) द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते. तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति.. (२०) ebook converter DEMO Watermarks*