भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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सुंदर पंखों वाले दो पक्षी अर्थात् आत्मा और परमात्मा एक ही संसार रूपी वृक्ष पर बैठे हैं. इन में से एक अर्थात् आत्मा पीपल के स्वादिष्ट फलों को खाता है. दूसरा अर्थात् परमात्मा पीपल के फलों को न खाता हुआ अपने दूसरे साथी को देखता है. (२०) यस्मिन् वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे. तस्य यदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद.. (२१) वृक्ष पर मधु का भक्षण करने वाले जो पक्षी बैठते हैं, वे विश्व का विस्तार करते हैं. जो पीपल के फलों को स्वादिष्ट बताते हैं तथा जो अपने पालक पिता को नहीं जानते, वे विनाश को प्राप्त होते हैं. (२१) यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भक्षमनिमेषं विदथा ऽ भिस्रवन्ति. एना विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश.. (२२) जहां पक्षी कर्मों के अमृत के समान स्वादिष्ट फल समझते हैं, वे ही संसार की रक्षा करते हैं और अंत में सूर्यलोक में प्रवेश करते हैं. (२२) सूक्त-१५ देवता—गौ यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभं वा त्रैष्टुभान्निरतक्षत. यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इत् तद् विदुस्ते अमृतत्त्वमानशुः.. (१) गायत्र में गायत्र छिपा हुआ है और त्रैष्टुभ में त्रैष्टुभ व्याप्त है. जो लोग जगती में छिपे हुए जगत् को जानते हैं, वे अमृत का उपभोग करते हैं. (१) गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम्. वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदा ऽ क्षरेण मिमते सप्त वाणीः.. (२) गायत्र से अर्क अर्थात् सूर्य का निर्माण होता है. अर्क से साम का और त्रैष्टुभ से वाक का निर्माण होता है. वाक् से वाक् को तथा द्विपदा एवं चतुष्पदा तथा अविनाशी ब्रह्म से सप्तवाणी अर्थात् सात प्रकार के वेद के छंद निर्मित होते हैं. (२) जगत् सिन्धुं दिव्यस्कभायद रथंतरे सूर्य पर्यपश्यत्. गायत्रस्य समिधस्तिस्र आहुस्ततो मह्ना प्र रिरिचे महित्वा.. (३) संसार के द्वारा सिंधु को द्यौलोक की ओर प्रेरित किया गया. ज्ञानियों ने रथंतर में सूर्य का दर्शन किया. उन्होंने गायत्र यज्ञ की तीन समिधाएं बताईं. इस के पश्चात वे अपनी महत्ता से ही वृद्धि को प्राप्त हुए. (३) उप ह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधुगुत दोहदेनाम्.