अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 513, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंय ईं चकार न सो अस्य वेद य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मात्. स मातुर्र्योना परिवीतो अन्तर्बहुप्रजा निर्ऋतिरा विवेश.. (१०) जिस ने इस की रचना की है, वह इस के गर्भ को नहीं देखता. जो इस के गर्भ में जाता है, वही इस को देखता है. माता की योनि से उत्पन्न बालक अनेक बार जन्ममरण रूपी पाप देवता निर्ऋति के जाल में फंसता है. (१०) अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्. स सध्रीची: स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (११) मैं ने रक्षा करने वाली आत्मा को जन्ममरण के चक्र में घूमते देखा. मैं ने उसे इहलोक और परलोक में एवं सत्व, रज, तम तीन गुणों में भ्रमण करते देखा. आत्मा अपने में व्याप्त लोकों एवं इंद्रियों में भ्रमण करती है. (११) द्यौर्नः पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्नो माता पृथिवी महीयम्. उत्तानयोश्चम्वो ३ योनिरन्तरत्रा पिता दुहितुर्गर्भमाधात्.. (१२) सृष्टि की रचना करने वाला एवं वीर्योत्पादक द्यौ भी हमारा पिता है. नाभि अर्थात् धरती और आकाश का मध्य भाग मेरा भाई है. महीयसी पृथ्बी मेरी माता है. यह वर्षा के जल को ओषधि के रूप में धारण करती है. आकाश और पृथ्वी सूत्र रूप में वायु को धारण करते हैं. पिता रूपी द्यौ पृथ्वी में वर्षा रूपी गर्भ धारण करता है. (१२) पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि वृष्णो अश्वस्य रेतः. पृच्छामि विश्वस्य भुवनस्य नाभिं पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (१३) मैं तुम से पृथ्वि के अंतिम स्थान के विषय में पूछता हूं. मैं इच्छा पूर्ण करने वाले एवं व्यापक परमेश्वर के विषय में पूछता हूं. मैं संपूर्ण भुवन की नाभि अर्थात् केंद्र के विषय में पूछता हूं. मैं वाक् के परमव्योम में व्याप्त होने के विषय में भी पूछता हूं. (१३) इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतः अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिर्ब्रह्मा ऽ यं वाचः परमं व्योम.. (१४) यह देवी पृथ्वी का परम अंत है. यह सोम इच्छापूर्ण करने वाले व्यापक विष्णु का वीर्य है. यह यज्ञ समस्त भुवनों की नाभि अर्थात केंद्र है. ब्रह्म इस वाणी का परम व्योम है. (१४) न वि जानामि यदिवेदमस्मि निण्यः संनद्धो मनसा चरामि. यदा मागन् प्रथमजा ऋतस्यादिद् वाचो अश्रुवे भागमस्याः.. (१५) मैं यह नहीं जानता कि मैं ही जानने योग्य परम ब्रह्म हूं तथा मैं द्वैताद्वैत संदेह में पड़ा हुआ उसी के मध्य विचरण करता हूं. अतएव जो बुद्धि समस्त इंद्रियों में प्रमुख है, उस के ebook converter DEMO Watermarks*