अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारा मैं यह जानता हूं कि मैं कार्य हूं अथवा कारण हूं. उसी के अनुसार मैं वाणी का उपयोग करता हूं. (१५) अपाङ् प्राङेति स्वधया गृभीतो ऽ मर्त्यो मर्त्येना सयोनिः. ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य १ न्यं चिक्युर्न नि चिक्युरन्यम्.. (१६) मरणधर्मिता से रहित अर्थात् अमर आत्मा मरणधर्मा मन के साथ गर्भ से प्रकट होती है. इन में से आत्मा ब्रह्म में मिल कर तदाकार हो जाती है. (१६) सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि. ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परि भवन्ति विश्वतः.. (१७) व्यापक ब्रह्म की सात किरणें वीर्य के रूप में वर्तमान रहती हैं. वे किरणें कर्म की उत्पत्ति के रूप से समस्त जगत् में विस्तृत होती हैं. (१७) ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः. यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत् तद् विदुस्ते अमी समासते.. (१८) परम व्योम में ओंकार का अक्षर है. उस में समस्त देव निवास करते हैं. जो इस बात को नहीं जानता, वह वेद मंत्रों को जान कर भी क्या करेगा? जो इस बात को जानते हैं, वे उसी ब्रह्म में निवास करते हैं. (१८) ऋचः पदं मात्रया कल्पयन्तो ऽ र्धर्चेन चाक्लृपुर्विश्वमेजत्. त्रिपाद् ब्रह्म पुरुरूपं वि तष्ठे तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१९) ओंकार के पद की कल्पना करते हुए जनों ने उसी अर्थ में इस चैतन्य और गतिशील विश्व की कल्पना की. निश्चल ब्रह्म तीन मात्राओं से निज रूप में स्थित रहता है और इस की एक मात्रा से चारों दिशाएं अर्थात् चारों दिशाओं में वर्तमान प्राणी जीवित रहते हैं. (१९) सूयवसाद् भगवती हि भूया अधा वयं भगवन्तः स्याम. अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती.. (२०) हे भूमि! तू जलमय सूर्य के संपर्क के कारण जल रूप ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकी. हम भी तेरे जल रूप ऐश्वर्य से संपत्तिशाली बनें. हे हिंसित न होने वाली पृथ्वी! तू मेघों को चूरचूर कर के शुद्ध जल का सेवन कर एवं सूर्य की किरणों के द्वारा जल का सेवन कर. (२०) गौरिन्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी. अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति.. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*