अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 526, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै? यह ऊपर का भाग, तिरछा भाग एवं अनेक प्राणियों के लिए हितकारी अंतरिक्ष किस ने बनाया? (२४) ब्रह्मणा भूमिर्विहिता ब्रह्म द्यौरुत्तरा हिता. ब्रह्मेदंमूर्ध्वं तिर्यक् चान्तरिक्षं व्यचो हितम्.. (२५) ब्रह्म ने भूमि को स्थापित किया है और ब्रह्म ने ही इस के ऊपरी भाग में द्यौ को स्थित किया है. ब्रह्म ही ऊपर एवं तिरछा है तथा ब्रह्म ने अनेक प्राणियों के हितकारी अंतरिक्ष की रचना की है. (२५) मूर्धानमस्य संसीव्याथर्वा हृदयं च यत्. मस्तिष्कादूर्ध्वः प्रेरयत् पवमानो ऽ धि शीर्षतः.. (२६) अथर्वा ने मूर्धा और हृदय की एकरूपता स्थापित की. इस ऊपर गमन करने वाले पवन ने मस्तिष्क के द्वारा उत्तम प्रेरणा प्रदान की. (२६) तद् वा अथर्वणः शिरो देवकोशः समुब्जितः. तत् प्राणो अभि रक्षति शिरो अन्नमथो मनः.. (२७) अथर्वा की वह वाणी देवकोष के रूप में उपस्थित हुई. प्राण और मन उस अन्नमय शीश की रक्षा करते हैं. (२७) ऊर्ध्वो नु सृष्टा ३ स्तिर्यङ् नु सृष्टा ३ः सर्वा दिशः पुरुष आ बभूवाँ ३. पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते.. (२८) जिस ब्रह्म को पुरुष कहा जाता है, उस की पुरी को जो जानता है, उसी ने ऊपरी और तिरछे भागों का निर्माण किया है. वही पुरुष समस्त दिशाओं में व्याप्त है. (२८) यो वै तां ब्रह्मणो वेदामृतेनावृतां पुरम्. तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः.. (२९) जो व्यक्ति ब्रह्म की उस पुरी को जानता है, जो अमृत अर्थात् मरणहीनता से ढकी हुई है, उस पुरुष को ब्रह्म एवं मंत्र चक्षु, प्राण एवं संतान प्रदान करते हैं. (२९) न वै तं चक्षुर्जहाति न प्राणो जरसः पुरा. पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते.. (३०) जो ब्रह्म की पुरी अर्थात् निवास स्थान को जानता है और उस में शयन करने के कारण ही ब्रह्म पुरुष कहा जाता है, उसे जो जानता है, वृद्धावस्था तक नेत्र एवं प्राण उस का त्याग नहीं करते. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*