अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा द्यौसंशितः सूर्यतेजाः. दिवमनु वि क्रमे ऽ हं दिवस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२७) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू द्युलोक में आश्रित एवं सूर्य का तेज है. मैं द्युलोक में पराक्रम प्रदर्शित करता और उसे द्युलोक से बाहर निकालता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, वह जीवित न रहे. प्राण उसका त्याग कर दें. (२७) विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहा दिक्संशितो मनस्तेजाः. दिशो ऽ नु वि क्रमे ऽ हं दिग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२८) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू दिशाओं में स्थित है एवं मन का तेज है. मैं दिशाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं तथा दिशाओं से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिससे द्वेष करते हैं, उसका विनाश हो. प्राण उसका त्याग कर दें. (२८) विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नहाशासंशितो वाततेजाः. आशा अनु वि क्रमे ऽहमाशाभ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (२९) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रुओं का विनाश करने वाला है. तू आकाश में स्थित है एवं वायु का तेज है. मैं आकाश में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और आकाश से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, उन का विनाश हो. प्राण उन का त्याग कर दें. (२९) विष्णोः क्रमो ऽसि सपत्नह ऋक्संशितः सामतेजाः. ऋचो ऽनु वि क्रमे ऽहमृग्भ्यस्तं निर्भजामो यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः. स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (३०) तू विष्णु का पराक्रम एवं शत्रु का विनाश करने वाला है. तू ऋचाओं में स्थित है. सोम तेरा तेज है. मैं आकाश के मध्य ऋचाओं में पराक्रम का प्रदर्शन करता हूं और ऋचाओं से उसे हटाता हूं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*