अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस नः पितेव पुत्रेभ्यः श्रेयः श्रेयश्चिकित्सतु भूयोभूयः श्वः श्वोः देवेभ्यो मणिरेत्य.. (५) हम इस अतिथि के लिए घृत, मदिरा, शहद और अन्न देते हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को परम कल्याण देता है, उसी प्रकार यह मणि मुझे कल्याण दे. यह मणि देवों के समीप से मेरे पास आ कर बारबार और प्रतिदिन मुझे सुख प्रदान करे. (५) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तमग्निः प्रत्यमुञ्चत सो अस्मै दुह आज्यं भूयोभूयः श्वः श्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (६) यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. अग्नि ने यह मणि मुझे दी है. हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार और प्रतिदिन बल प्रदान करे, जिस से तू प्रतिदिन एवं बारबार शत्रुओं का विनाश कर सके. (६) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तमिन्द्रः प्रत्यमुञ्चत्तौजसे वीर्याय कम्. सो अस्मै बलमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (७) यह मणि फाल से उत्पन्न, घृत टपकाने वाली, बल युक्त एवं खदिर अर्थात् खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी है. बृहस्पति ने बल प्राप्ति के लिए इसे बांधा था. इंद्र ने बल, वीर्य और सुख प्रदान करने हेतु इस मणि को मुझे दिया है. हे यजमान! यह मणि बारबार और प्रतिदिन तुझे बल प्रदान करे. उस बल की सहायता से तू शत्रुओं का विनाश करे. (७) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तं सोमः प्रत्यमुञ्चत महे श्रोत्राय चक्षसे. सो अस्मै वर्च इद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (८) बृहस्पति ने जिस फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी से बनी मणि को बल प्राप्त करने के लिए बांधा था, उसे सोम ने महत्त्व, सुनने की शक्ति और उत्तम दृष्टि पाने के लिए मुझे प्रदान किया है. हे यजमान! यह मणि तुझे बारबार एवं प्रतिदिन तेज प्रदान करे, जिस की सहायता से तू अपने शत्रुओं का विनाश कर सके. (८) यमबध्नाद् बृहस्पतिर्मणिं फालं घृतश्रुतमुग्रं खदिरमोजसे. तं सूर्यः प्रत्यमुञ्चत तेनेमा अजयद् दिशः. सो अस्मै भूतिमिद् दुहे भूयोभूयः श्वःश्वस्तेन त्वं द्विषतो जहि.. (९) बृहस्पति ने फाल से उत्पन्न, घी टपकाने वाली, शक्तिशालिनी एवं खैर वृक्ष की लकड़ी ebook converter DEMO Watermarks*