अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयस्मै देवाः सदा बलिं प्रयच्छन्ति विमिते ऽ मितं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः.. (३९) जिस असीमित परमात्मा के लिए देवगण हाथों, पैरों, वाणी, कानों और आंखों के द्वारा सदा उपहार प्रदान करते हैं, उसी परमात्मा के विषय में बताओ कि वह कौन है? (३९) अप तस्य हतं तमो व्यावृतः स पाप्मना. सर्वाणि तस्मिन्ज्योतींषि यानि त्रीणि प्रजापतौ.. (४०) जो परमात्मा को जान लेता है, उस का अज्ञान मिट जाता है तथा उस का पाप नष्ट हो जाता है. प्रजापति में जो तीन ज्योतियां हैं, वे उसे प्राप्त हो जाती हैं. (४०) यो वेतसं हिरण्ययं तिष्ठन्तं सलिले वेद. स वै गुह्यः प्रजापतिः.. (४१) जल में सोने का बेंत ठहरा हुआ है. जो इस बात को जानता है, वही गुप्त प्रजापति है. (४१) तन्त्रमेके युवती विरूपे अभ्याक्रामं वयत: षण्मयूखम्. प्रान्या तन्तूंस्तिरते धत्ते अन्या नाप वृञ्जाते न गमातो अन्तम्.. (४२) एक दूसरे से भिन्न रूप वाली दो युवतियां लगातार घूमती हैं तथा छः खूटियों वाला एक ताना पूरती हैं. उन में से एक धागों को फैलाती है और दूसरी उन्हें संभाल कर रखती है अर्थात् समेटती है. वे दोनों न विश्राम करती हैं और न अंत को प्राप्त होती हैं. तात्पर्य यह है कि रात और दिन ही वे युवतियां हैं. छः ऋतुएं छः खूंटे तथा समय ही अनंग धागा है. (४२) तयोरहं परिनृत्यन्त्योरिव न वि जानामि यतरा परस्तात्. पुमानेनद् वयत्युद् गृणत्ति पुमानेनद् वि जभाराधि नाके.. (४३) उन नृत्य करती हुई दो स्त्रियों अर्थात् दिन और रात में कौन सी दूसरी है, यह मैं नहीं जानता. उस वस्त्र को एक पुरुष बुनता है तथा दूसरा उधेड़ता है. इसे वह स्वर्ग में धारण करता है. (४३) इमे मयूखा उप तस्तभुर्दिवं सामानि चक्रुस्तसराणि वातवे.. (४४) ये खूटियां अर्थात् छः ऋतुएं स्वर्ग को धारण करती है तथा वस्त्र बुनने के लिए सामवेद के मंत्रों को धागा बनाए हुए हैं. (४४) सूक्त-८ देवता—अध्यात्म यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति. ebook converter DEMO Watermarks*