अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 559, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्व १ र्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (१) जो इन भूत, भविष्य तथा वर्तमान कालों को व्याप्त कर के स्थित है तथा जिस का स्वरूप केवल प्रकाशमय है, उसी ज्येष्ठ ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूं. (१) स्कम्भेनेमे विष्टभिते द्यौश्च भूमिश्च तिष्ठतः. स्कम्भ इदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणन्निमिषच्च यत्.. (२) परमात्मा के द्वारा धारण की हुई भूमि और स्वर्ग अपने स्थान पर स्थित हैं. जो सांस लेते हैं और जो पलक झपकाते हैं, वे सब आत्मा के समान परमात्मा में व्याप्त हैं. (२) तिस्रो ह प्रजा अत्यायमायन् न्य १ न्या अर्कमभितो ऽ विशन्त. बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानो हरितो हरिणीरा विवेश.. (३) तीन प्रकार की प्रजाएं अतिक्रमण करती हुई परमेश्वर को प्राप्त होती हैं. एक प्रकार की अर्थात् सतोगुणी प्रजाएं सूर्य में प्रविष्ट होती हैं. दूसरे प्रकार की अर्थात् रजोगुणी प्रजाएं रजौलोक को नापती हुई स्थित रहती हैं. तीसरी अर्थात् तमोगुणी प्रजाएं सब का हरण करती हुई हरे रंग में अर्थात् अंधकार में प्रवेश करती हैं. (३) द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत. तत्राहतास्त्रीणि शतानि शङ्कवः षष्टिश्च खीला अविचाचला ये.. (४) बारह अरे तथा तीन नेमियां एक पहिए से संबंधित हैं. बारह मास, बारह अरे तथा शीत, ग्रीष्म, वर्षा, तीन ऋतुएं तीन नेमियां हैं. ये समय रूपी पहिए में स्थित हैं. इस बात को कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता. उस पहिए में तीन सौ साठ खूंटियां तथा इतनी ही कीलें लगाई गई हैं जो स्थिर हैं. वर्ष के दिन और रात ही खूंटियां और कीलें हैं. (४) इदं सवितर्वि जानीहि षड् यमा एक एकजः. तस्मिन् हापित्वमिच्छन्ते य एषामेक एकजः.. (५) हे सविता देव! तुम यह जानो कि ये एक से एक बने हुए छः जोड़े हैं. इन में जो एकएक से बने जोड़े हैं, वे उस में समाहित होना चाहते हैं. तात्पर्य दो-दो मासों वाली छः ऋतुओं के वर्ष अथवा काल में समाहित होने से है. (५) आविः सन्निहितं गुहा जरन्नाम महत् पदम्. तत्त्रेदं सर्वमार्पितमेजत् प्राणत् प्रतिष्ठितम्.. (६) प्रकट होने वाला एवं संचार करने वाला महत्त्व पद गुफा में है. यह शरीर ही गुफा है और आत्मा उस में संचार करने वाला महत्त्व पद है. वह महत्त्व पद अर्थात् आत्मा गतिशील एवं सांस लेने वाला है तथा उसी में यह सारा विश्व समाहित और प्रतिष्ठित है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*