अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा. अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं क्व १ तद् बभूव.. (७) बीच की नाभि वाला एक पहिया है. इस में आगेपीछे से हजार अरे लगे हुए हैं. यह पहिया लगातार चल रहा है. इस के आधे भाग से संसार उत्पन्न हुआ है तथा इस का शेष भाग कहां है? सूर्य ही एक नाभि वाला एक पहिया है. उस की हजार किरणें हजार अरे हैं. दिन उस का आधा भाग है, जिस के कारण संसार गतिशील रहता है. शेष आधा भाग अर्थात् रात्रि में वह सूर्य न जाने कहां चला जाता है? (७) पञ्चवाही वहत्यग्रमेषां प्रष्टयो युक्ता अनुसंवहन्ति. अयातमस्य ददृशे न यातं परं नेदीयो ऽ वरं दवीय:.. (८) इन में जो आगे चलने वाला है, वह पंचवाही (पांच के द्वारा उठाया जाने वाला). इस में जुड़े हुए घोड़े इसे ठीक से ले कर चलते हैं. इस का न आना दिखाई देता है और न जाना. यह अत्यंत दूर और अत्यधिक समीप है. तात्पर्य यह है कि प्राण, अपान पांच वायुएं जीवन को गतिशील रखती हैं. इंद्रियां ही शरीर को आगे बढ़ाने वाले घोड़े हैं. शरीर में आत्मा का आना और जाना दृष्टिगोचर नहीं होता है. यह आत्मा अत्यंत समीप और अत्यधिक दूर है. (८) तिर्यग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम्. तदासत ऋषय: सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवु:.. (९) एक चमचा है, जिस का मुख नीचे की ओर है और जड़ अर्थात् पकड़ने वाला भाग ऊपर की ओर है. उस में अनेक रूपों वाला यशस्वी छिपा हुआ है. वहां सात ऋषि एक साथ बैठे हैं. वे ही अनेक रूपों वाले के रक्षक बनें. (९) या पुरस्ताद् युज्यते या च पश्चाद् या विश्वतो युज्यते या च सर्वतः. यया यज्ञः प्राङ् तायते तां त्वा पृच्छामि कतमा सर्चाम्.. (१०) ऋचाओं के मध्य वह कौन सी ऋचा है जो आगे से और पीछे से जुड़ी हुई है. जो चारों ओर से तथा सभी प्रकार जुड़ी हुई है. जिस की सहायता से पूर्व की ओर यज्ञ विस्तृत किया गया, मैं तुम से उसी के विषय में पूछता हूं. (१०) यदेजति पतति यच्च तिष्ठति प्राणदप्राणन्निमिषच्च यद् भुवत्. तद् दाधार पृथिवीं विश्वरूपं तत् संभूय भवत्येकमेव.. (११) जो कांपता है, गिरता है और स्थित रहता है; जो सांस लेता है, सांस नहीं लेता तथा सत् है, उसी विश्व रूप ने पृथ्वी को धारण किया है. वह सब से मिल कर एक रूप हो जाता है. (११) अनन्तं विततं पुरुत्रा ऽ नन्तमन्तवच्चा समन्ते. ebook converter DEMO Watermarks*