अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंते नाकपालश्चरति विचिन्वन् विद्वान् भूतमृत भव्यमस्य.. (१२) एक तत्त्व अंतहीन तथा चारों ओर विस्तृत है. दूसरा अंतहीन तथा अंत वाला है. ये दोनों परस्पर मिले हुए हैं. स्वर्ग सुख का इच्छुक उन्हें खोजता फिरता है. वही सब जानता है तथा भूत और भविष्य उसी के कर्म हैं. यहां पहला परमात्मा और दूसरा आत्मा है. (१२) प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते. अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (१३) प्रजापति दिखाई न देता हुआ गर्भ में संचरण करता है तथा अनेक रूपों में जन्म लेता है. उस के आधे भाग से सारा विश्व उत्पन्न हुआ है. उस का शेष भाग श्रद्धा है, वही उस की पहचान है. (१३) ऊर्ध्वं भरन्तमुदकं कुम्भेनेवोदहार्यम्. पश्यन्ति सर्वे चक्षुषा न सर्वे मनसा विदुः.. (१४) घड़े की सहायता से कुएं के जल को ऊपर निकालते हुए को सभी आंख से देखते हैं, परंतु मन से नहीं जान पाते. (१४) दूरे पूर्णेन वसति दूर ऊनेन हीयते. महद् यक्षं भुवनस्य मध्ये तस्मै बलिं राष्ट्रभृतो भरन्ति.. (१५) अपने को पूर्ण मानने वाले से वह बहुत दूर रहता है तथा अपने को हीन मानने वाले से भी दूर भागता है. ऐसा महान देव अर्थात् परमात्मा संसार के मध्य व्याप्त है. राष्ट्र का भरणपोषण करने वाला उस की सेवा करता है. (१५) यतः सूर्य उदेत्यस्तं यत्र च गच्छति. तदेव मन्ये ऽ हं ज्येष्ठं तदु नात्येति किं चन.. (१६) सूर्य जहां से उदय होता है और जहां अस्त होता है, मैं उसी को सब से बड़ा मानता हूं. कोई भी उस का अतिक्रमण नहीं करता अर्थात् कोई भी उस से महान नहीं है. (१६) ये अर्वाङ् मध्य उत वा पुराणं वेदं विद्वांसमभितो वदन्ति. आदित्यमेव ते परि वदन्ति सर्वे अग्नि द्वितीयं त्रिवृतं च हंसम्.. (१७) जो पुराण, ज्ञानी एवं विद्वान् उस के पीछे, बीच में अथवा चारों ओर बताते हैं, वे सब सूर्य की ही प्रशंसा करते हैं. वे अग्नि को दूसरा और हंस को तीसरा बताते हैं. (१७) सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्. स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*