भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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दिवस इस के देखतेदेखते ही आघात करते हैं. इसी कारण यह देव अर्थात् सूर्य इस विश्व को प्रकाशित करता है. (२४) बालादेकमणीयस्कमुतैकं नेव दृश्यते. ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया.. (२५) आत्मतत्त्व एक है. यह बाल से भी सूक्ष्म होने के कारण दिखाई नहीं देता. इस आत्मा का आलिंगन करने वाला देवता अर्थात् परमात्मा मुझे प्रिय है. (२५) इयं कल्याण्य १ जरा मर्त्यस्यामृता गृहे. यस्मै कृता शये स यश्चकार जजार सः.. (२६) यह कल्याणी आत्मा वृद्धावस्था से रहित है तथा मरणशील शरीर रूपी घर में रह कर भी अमर है. जिस आत्मा के लिए शरीर का निर्माण हुआ है, वह इस में शयन करती है. वह शरीर ही वृद्ध होता है. (२६) त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी. त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः.. (२७) हे आत्मा! तू स्त्री है, तू ही पुरुष है. तू ही कुमार है और तू ही कुमारी है. वृद्ध होने पर तू ही डंडे के सहारे चलता है तथा तू ही उत्पन्न होने पर सभी ओर मुख वाला बनता है. (२७) उतैषां पितोत वा पुत्र एषामुतैषां ज्येष्ठ उत वा कनिष्ठः. एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः स उ गर्भे अन्तः.. (२८) इन समस्त जीवों में पिता और पुत्र के रूप में एवं बड़े और छोटे के रूप में एक ही देव है जो मन में प्रविष्ट है. वह सब से पहले उत्पन्न हुआ था. वही गर्भ में स्थित होता है. (२८) पूर्णात् पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते. उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते.. (२९) पूर्ण अर्थात् परमात्मा से ही पूर्ण अर्थात समस्त विश्व अलग होता है अर्थात् जन्म लेता है. उसी पूर्ण के द्वारा यह विश्व सिंचित होता है अर्थात् पालन किया जाता है. आज हम उस तत्त्व को जानें, जहां से वह सींचा जाता है अर्थात् जो इस विश्व का पालन करता है. (२९) एषा सनत्नी सनमेव जातैषा पुराणी परि सर्वं बभूव. मही देव्यु १ षसो विभाती सैकैनेकेन मिषता वि चष्टे.. (३०) यह सनातन शक्ति वाला आकर्षण सनातन परमात्मा के साथ ही उत्पन्न हुआ है. वही पुराण शक्ति सब कुछ बन गई है. वही महती, दिव्य शक्ति उषाओं को प्रकाशित करती है तथा ebook converter DEMO Watermarks*

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