अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह प्रत्येक प्राणी के साथ अलगअलग दिखाई देती है. (३०) अविर्वे नाम देवतर्तेनास्ते परीवृता. तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजः.. (३१) वही रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति है और सत्य से घिरी हुई है. उसी के रूप से वे सारे वृक्ष हरेभरे हैं और हरे पत्तों से ढके रहते हैं. (३१) अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति. देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति.. (३२) समीप से आए हुए को वह छोड़ता नहीं है तथा समीप होने पर भी वह दिखाई नहीं देता है. उस देव अर्थात् परमात्मा का काव्य देखो जो कभी न मरता है और न वृद्ध होता है. (३२) अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्. वदन्तीर्यत्र गच्छन्ति तदाहुर्ब्राह्मणं महत्.. (३३) वह परमात्मा अपूर्व है अर्थात् उस से पहले कोई नहीं था. उस ने ही इन वाणियों को प्रेरित किया है जो वास्तविकता का वर्णन करती हैं. वर्णन करती हुई वाणियां जहां पहुंचती हैं, उसी को महान ब्राह्मण अर्थात वेद मंत्रों का समूह कहा गया है. (३३) यत्र देवाश्च मनुष्याश्चारा नाभाविव श्रिताः. अपां त्वा पुष्पं पृच्छामि यत्र तन्मायया हितम्.. (३४) मैं जल के उस कमल के विषय में पूछता हूं, जिस में सभी मनुष्य और देव इस प्रकार आश्रित हैं, जिस प्रकार कमल में उस की पंखुड़ियां रहती हैं. माया से ढका हुआ वह कहां रहता है? (३४) येभिर्वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशः सध्रीचीः. य आहुतिमत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे त आसन्.. (३५) जिन देवों से प्रेरित हो कर वायु चलती है तथा जो पांच परस्पर मिली हुई दिशाओं अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊपर को प्रदान करता है. जो देव आहुति को अत्यधिक महान मानते हैं, जलों के नेता वे देव कौन हैं. (३५) इमामेषां पृथिवीं वस्त एको ऽ न्तरिक्षं पर्येको बभूव. दिवमेषां ददते यो विधर्ता विश्वा आशाः प्रति रक्षन्त्येके.. (३६) इन में से एक इस पृथ्वी पर निवास करता है तथा अंतरिक्ष में व्याप्त रहता है, जो धारण करता है एवं इन जीवों को स्वर्ग प्रदान करता है. कुछ अर्थात् शेष देव ऐसे हैं जो सभी ebook converter DEMO Watermarks*