अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 565, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिशाओं की रक्षा करते हैं. (३६) यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः. सूत्रं सूत्रस्य यो विद्यात् स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (३७) जिस में सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं तथा जो इस फैले हुए सूत्र अर्थात् धागे को जानता है. संसार रूपी विस्तृत सूत्र के कारण बने हुए सूत्र अर्थात् परमात्मा को जो जानता है, वही महान ब्रह्म को जानता है अथवा वही विशाल वेद मंत्रों का ज्ञाता है. (३७) वेदाइं सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः. सूत्रं सूत्रस्याहं वेदाथो यद् ब्राह्मणं महत्.. (३८) मैं उस विस्तृत धागे अर्थात् परमात्मा को जानता हूं, जिस में ये सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं. मैं इस संसार रूपी विस्तृत सूत्र के मूल कारण को जानता हूं, जो महान ब्रह्म अथवा विशाल वेद मंत्रों का समूह हैं. (३८) यदन्तरा द्यावापृथिवी अग्निरैत् प्रदहन् विश्वादाव्यः. यत्रातिष्ठन्नेकपत्नीः परस्तात् क्वे वासीन्मातरिश्वा तदानीम्.. (३९) इस संसार को जलाने वाली अग्नि द्यावा और पृथ्वी के मध्य आती है. वहीं पोषण करने वाली देवियां निवास करती हैं. उस समय मातरिश्वा अर्थात् वायु कहां रहती है? (३९) अप्सवा सीन्मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्यासन्. बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश.. (४०) उस समय वायु जलों में प्रविष्ट थी तथा देवगण भी जलों में ही प्रवेश किए हुए थे. पृथ्वी का निर्माण करने वाला महान ब्रह्म उस समय कहां स्थित था? उस समय वायु ने दिशाओं में प्रवेश किया. (४०) उत्तरेणेव गायत्रीममृते ऽ धि वि चक्रमे. साम्ना ये साम संविदुरजस्तद् ददृशे क्व.. (४१) जो साम मंत्रों के द्वारा परमात्मा को जानने वाले हैं, उन्होंने अंत में गायत्री रूप अमृत में प्रवेश किया. वह अजन्मा कहां दिखाई दिया था अर्थात् कहीं नहीं. (४१) निवेशनः संगमनो वसूनां देव इव सविता सत्यधर्मा. इन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्.. (४२) सत्य धर्म वाले सविता उसी दिव्य परमात्मा के समान हैं. वे ही समस्त धनों के संगम हैं अर्थात् पुण्यात्मा जन उन्हीं में प्रवेश करते हैं. धनों के समूह में अर्थात् पुण्यात्माओं में इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*