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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

दिशाओं की रक्षा करते हैं. (३६) यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः. सूत्रं सूत्रस्य यो विद्यात् स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (३७) जिस में सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं तथा जो इस फैले हुए सूत्र अर्थात् धागे को जानता है. संसार रूपी विस्तृत सूत्र के कारण बने हुए सूत्र अर्थात् परमात्मा को जो जानता है, वही महान ब्रह्म को जानता है अथवा वही विशाल वेद मंत्रों का ज्ञाता है. (३७) वेदाइं सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः. सूत्रं सूत्रस्याहं वेदाथो यद् ब्राह्मणं महत्.. (३८) मैं उस विस्तृत धागे अर्थात् परमात्मा को जानता हूं, जिस में ये सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं. मैं इस संसार रूपी विस्तृत सूत्र के मूल कारण को जानता हूं, जो महान ब्रह्म अथवा विशाल वेद मंत्रों का समूह हैं. (३८) यदन्तरा द्यावापृथिवी अग्निरैत् प्रदहन् विश्वादाव्यः. यत्रातिष्ठन्नेकपत्नीः परस्तात् क्वे वासीन्मातरिश्वा तदानीम्.. (३९) इस संसार को जलाने वाली अग्नि द्यावा और पृथ्वी के मध्य आती है. वहीं पोषण करने वाली देवियां निवास करती हैं. उस समय मातरिश्वा अर्थात् वायु कहां रहती है? (३९) अप्सवा सीन्मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्यासन्. बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश.. (४०) उस समय वायु जलों में प्रविष्ट थी तथा देवगण भी जलों में ही प्रवेश किए हुए थे. पृथ्वी का निर्माण करने वाला महान ब्रह्म उस समय कहां स्थित था? उस समय वायु ने दिशाओं में प्रवेश किया. (४०) उत्तरेणेव गायत्रीममृते ऽ धि वि चक्रमे. साम्ना ये साम संविदुरजस्तद् ददृशे क्व.. (४१) जो साम मंत्रों के द्वारा परमात्मा को जानने वाले हैं, उन्होंने अंत में गायत्री रूप अमृत में प्रवेश किया. वह अजन्मा कहां दिखाई दिया था अर्थात् कहीं नहीं. (४१) निवेशनः संगमनो वसूनां देव इव सविता सत्यधर्मा. इन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्.. (४२) सत्य धर्म वाले सविता उसी दिव्य परमात्मा के समान हैं. वे ही समस्त धनों के संगम हैं अर्थात् पुण्यात्मा जन उन्हीं में प्रवेश करते हैं. धनों के समूह में अर्थात् पुण्यात्माओं में इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

प्रवेश नहीं करते. (४२) पुण्डरीकं नवद्वारं त्रिभिर्गुणेभिरावृतम्. तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (४३) नौ द्वारों वाला कमल तीनों अर्थात् रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण से घिरा हुआ है. उस में जो आत्मा वाला दिव्य दल है, उसे ब्रह्मज्ञानी जानते हैं. (४३) अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः. तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम्.. (४४) वह परमात्मा कामना रहित, धीर, मरण रहित, स्वयं उत्पन्न होने वाला तथा रस से तृप्त है. वह कहीं से भी कम नहीं है अर्थात् सर्वथा पूर्ण है. उसी धीर, जरा अर्थात् वृद्धावस्था से रहित तथा युवा आत्मा को जानने वाला मृत्यु से नहीं डरता. (४४) सूक्त-९ देवता—शतौदना गौ अघायतामपि नह्या मुखानि सपत्नेषु वज्रमर्पयैतम्. इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातुः.. (१) यह धेनु पापियों के मुखों को बंद करे और शत्रुओं पर इस वज्र को गिराए. इंद्र के द्वारा दी हुई यह सब से पहली शतौदना गाय शत्रु विनाशिनी एवं यजमान का मार्गदर्शन करने वाली है. (१) वेदिष्टे चर्म भवतु बर्हिर्लोमानि यानि ते. एषा त्वा रशनाग्रभीद् ग्रावा त्वैषो ऽ धि नृत्यतु.. (२) हे शतौदना गौ! तेरे रोम कुशों के रूप में हैं और यज्ञ वेदी तेरा चर्म है. यह रस्सी तुझे बांध रही है. यह पत्थर तेरे ऊपर नृत्य करे. (२) बालास्ते प्रोक्षणीः सन्तु जिह्वा सं मार्ष्ट्वर्घ्ये. शुद्धा त्वं यज्ञिया भूत्वा दिवं प्रेहि शतौदने.. (३) हे हिंसा के अयोग्य गौ! तेरे बाल यज्ञ का प्रोक्षणी नामक पात्र बनें तथा तेरी जीभ यज्ञ वेदी का मार्जन करे अर्थात् सफाई करे. हे शतौदना गौ! तू इस प्रकार शुद्ध और यज्ञ के योग्य बन कर स्वर्ग को गमन कर. (३) यः शतौदनां पचति कामप्रेण स कल्पते. प्रीता ह्यस्यार्त्विजः सर्वे यन्ति यथायथम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

जो शतौदना गौ का पालन करता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है. उस के संतुष्ट हुए सभी ऋत्विज् जहां से आते हैं, वहीं चले जाते हैं. (४) स स्वर्गमा रोहति यत्रादस्त्रिदिवं दिवः. अपूपनाभिं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्... (५) वह उस स्वर्ग में पहुंचता है जो अंतरिक्ष में स्थित है तथा जो पुए बना कर शतौदना गौ को देता है. (५) स तांल्लोकान्त्समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवाः. हिरण्यज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्.. (६) जो स्वर्ण से अलंकृत कर के शतौदना गौ का दान करता है, वह उन लोकों को प्राप्त करता है, जो दिव्य एवं पार्थिव अर्थात् पृथ्वी से संबंधित हैं. (६) ये ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः. ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति मैभ्यो भैषीः शतौदने.. (७) हे शतौदना गौ! तेरी शांति करने वाले एवं तेरे पालन कर्ता तेरे रक्षक होंगे. तू उन से भयभीत मत हो. (७) वसवस्त्वा दक्षिणत उत्तरान्मरुतस्त्वा. आदित्याः पश्चाद् गोप्स्यन्ति साग्निष्टोममति द्रव.. (८) हे शतौदना गौ! आठ वसु, दक्षिण की ओर, उनचास मरुत् उत्तर की ओर तथा आदित्य पीछे से तेरी रक्षा करेंगे. तू अग्निष्टोम यज्ञ के पार जा. (८) देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये. ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति सातिरात्रमति द्रव.. (९) हे शतौदना गौ! देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, और अप्सराएं—ये सभी तेरी रक्षा करेंगे. तू अतिशय नामक यज्ञ कर्म के पार जा. (९) अन्तरिक्षं दिवं भूमिमादित्यान् मरुतो दिशः. लोकान्त्स सर्वान्नाप्नोति यो ददाति शतौदनाम्.. (१०) जो शतौदना गौ का दान करता है, वह अंतरिक्ष को, स्वर्ग को, भूमि को, आदित्यों को, मरुतों को, दिशाओं को तथा सभी लोकों को प्राप्त करता है. (१०) घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति. पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीर्दिवं प्रेहि शतौदने.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

घी टपकाती हुई, सौभाग्यशालिनी एवं दिव्य गुणयुक्त शतौदना गौ देवों के समीप जाएगी. हे हिंसा के अयोग्य शतौदना गौ! तू अपने पालने वाले की हिंसा मत कर और स्वर्ग को जा. (११) ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये ये चेमे भूम्यामधि. तेभ्यस्त्वं धुक्ष्व सर्वदा क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१२) हे शतौदना गौ! जो देव स्वर्ग में स्थित हैं, जो अंतरिक्ष में हैं एवं जो पृथ्वी पर निवास करते हैं, तू उन के लिए सदा मीठा दूध, दही और घी प्रदान कर. (१२) यत् ते शिरो यत् ते मुखं यौ कर्णौ ये च ते हनू. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१३) हे शतौदना गौ! तेरा जो शीश, तेरा जो मुख, तेरे जो दो कान एवं तेरी ठोड़ी है—ये सब अंग तेरे दानदाता को दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१३) यौ त ओष्ठौ ये नासिके ये शृङ्गे ये च ते ऽ क्षिणी. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१४) हे शतौदना गौ! तेरे जो दोनों होंठ, तेरी नाक, तेरे जो दोनों सींग तथा जो दोनों आंखें हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१४) यत् ते क्लोमा यद् हृदयं पुरीतत् सहकण्ठिका. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१५) हे शतौदना गौ! तेरा क्लोम, हृदय, मलाशय और गला तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर दूध और घी देते रहें. (१५) यत् ते यकृद् ये मतस्ने यदान्त्रं याश्च ते गुदाः. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१६) हे शतौदना गौ! तेरा जिगर, तेरी आंतें तथा तेरी गुदा तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१६) यस्ते प्लाशिर्यो वनिष्ठुर्यौ कुक्षी यच्च चर्म ते. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१७) हे शतौदना गौ! तेरी जो तिल्ली, गुदा, दोनों आंखें और तेरा चमड़ा है, ये सब तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१७) यत् ते मज्जा यदस्थि यन्मांसं यच्च लोहितम्. ebook converter DEMO Watermarks*

आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१८) हे शतौदना गौ! तेरी चरबी, तेरी हड्डियां, मांस और रक्त तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१८) यौ ते बाहू ये दोषण्ी यावंसौ या च ते ककुत्. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१९) हे शतौदना गौ! तेरी दोनों भुजाएं, दोनों पिंडलियां, दोनों कंधे और ठाट तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१९) यास्ते ग्रीवा ये स्कन्धा या: पृष्टीर्याश्च पर्शव:. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२०) हे शतौदना गौ! तेरी जो गरदन, तेरे जो कंधे, जो पीठ और जो पसलियां हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२०) यौ त ऊरू अष्ठीवन्तौ ये श्रोणी या च ते भसत्. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२१) हे शतौदना गौ! तेरे पैर, तेरे घुटने, तेरे कूल्हे और प्रजनन अंग सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२१) यत् ते पुच्छं ये ते बाला यदूधो ये च ते स्तना:. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२२) हे शतौदना गौ! तेरी जो पूंछ, तेरे जो बाल, तेरा जो ऐन एवं जो थन हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२२) यास्ते जङ्घा या: कुष्ठिका ऋच्छरा ये च ते शफा:. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२३) हे शतौदना गौ! तेरी जो जंघाएं, जो घुटने, कूल्हे और खुर हैं, वे सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२३) यत् ते चर्म शतौदने यानि लोमान्यघ्न्ये. आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२४) हे शतौदना गौ! तेरा जो चमड़ा है, हे हिंसा के अयोग्य! तेरे जो बाल हैं, वे सदा तेरे दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*

क्रोडौ ते स्तां पुरोडाशावाज्येनाभिघारितौ. तौ पक्षौ देवि कृत्वा सा पक्तारं दिवं वह.. (२५) हे शतौदना गौ! तेरे पिछले दोनों भाग घी से सिंचित हैं एवं पुरोडाश हैं. हे देवी! उन्हें पंख बना कर तू पालनकर्ता को स्वर्ग में ले जा. (२५) उलूखले मुसले यश्च चर्मणि यो वा शूर्पे तण्डुलः कणः. यं वा वातो मातरिश्वा पवमानो ममाथाग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (२६) जो ओखली और मूसल हैं, जो चमड़े, जो सूप, चावल और चावलों के टूटे हुए भाग हैं तथा जिन को पवित्र करने वाली वायु ने मथा है, उन्हें होता अग्नि की उत्तम आहुति बनाएं. (२६) अपो देवीर्मधुमतीर्घृतश्रुतो ब्रह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि. यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हं तन्मे सर्वं सं पद्यतां वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (२७) मधु से युक्त एवं घी टपकाने वाले जल हम ब्राह्मणों के हाथों में अलग-अलग डालते हैं. जिस कामना से हम ब्राह्मणों के हाथों को धुलाते हैं, हमारी वह कामना पूर्ण हो तथा हम धनों के स्वामी बनें. (२७) सूक्त-१० देवता—वशा गौ नमस्ते जायमानायै जाताया उत ते नमः. बालेभ्यः शफेभ्यो रूपाया ऽ घ्न्ये ते नमः.. (१) हे हिंसा न करने योग्य गौ! तुझ जन्म लेती हुई को एवं उत्पन्न होती हुई को नमस्कार है. तेरे बालों के लिए, खुरों के लिए तथा रूप के लिए नमस्कार है. (१) यो विद्यात् सप्त प्रवतः सप्त विद्यात् परावतः. शिरो यज्ञस्य यो विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्.. (२) जो वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को जानता हो तथा यज्ञ का शीश जानता हो, वही वशा गौ का दान स्वीकार करे. (२) वेद़ाहं सप्त प्रवतः सप्त वेद परावतः. शिरो यज्ञस्याहं वेद सोमं चास्यां विचक्षणम्.. (३) मैं वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को जानता हूं. मैं यज्ञ के शीश को जानता हूं तथा वशा गौ में होने वाले प्रकाशशील सोम को भी ebook converter DEMO Watermarks*

जानता हूं. (३) यया द्यौर्यया पृथिवी ययापो गुपिता इमाः. वशां सहस्रधारां ब्रह्मणाच्छावदामसि.. (४) जिस के द्वारा द्यौ, जिस के द्वारा पृथ्वी तथा जिस के द्वारा ये जल सुरक्षित हैं, दूध की हजार धाराएं बहाने वाली वशा की हम वेद मंत्रों द्वारा प्रशंसा करते हैं (४) शतं कंसाः शतं दोग्धारः शतं गोप्तारो अधि पृष्ठे अस्याः. ये देवास्तस्यां प्राणन्ति ते वशां विदुरेकधा.. (५) इस वशा गौ की पीठ पर दुग्ध पात्र लिए हुए सौ दूध काढ़ने वाले एवं सौ रक्षक हैं. जो देव इस गौ के कारण सांस लेते हैं अर्थात् जीवित हैं, एकमात्र वे ही इस गौ को जानते हैं. (५) यज्ञपदीराक्षीरा स्वधाप्राणा महीलुका. वशा पर्जन्यपत्नी देवां अप्येति ब्रह्मणा.. (६) जिस वशा गौ को यज्ञ में स्थान प्राप्त है, जो अत्यधिक दूध देती है, स्वधा जिस के प्राण हैं तथा जो धरती पर परम प्रसिद्ध है, उस का वर्षा के कारण उत्पन्न घास से पालनपोषण होता है, वह वशा गौ यज्ञ के द्वारा देवों को तृप्त करती है. (६) अनु त्वाग्निः प्राविशदनु सोमो वशे त्वा. ऊधस्ते भद्रे पर्जन्यो विद्युतस्ते स्तना वशे.. (७) हे वशा गौ! अग्नि ने तुझ में प्रवेश किया था तथा सोम भी तुझ में प्रविष्ट हुआ था. पर्जन्य अर्थात् बादल ने तेरे एन में और बिजली ने तेरे थनों में निवास किया था. (७) अपस्त्वं धुक्षे प्रथमा उर्वरा अपरा वशे. तृतीयं राष्ट्रं धुक्षे ऽ नं क्षीरं वशे त्वम्.. (८) हे वशा गौ! सब से पहले तू जलों को दोहन के रूप में प्रदान करती है. इस के पश्चात भूमि को उपजाऊ बना कर हमें अन्न देती है. तीसरे तू राष्ट्र को शक्तिरूपी क्षीर प्रदान करती है. (८) यदादित्यैर्हूयमानोपातिष्ठ ऋतावरि. इन्द्रः सहस्रं पात्रान्तसोमं त्वापाययद् वशे.. (९) हे ऋतावरी अर्थात् दूध देने वाली गौ! तू आदित्यों द्वारा बुलाए जाने पर समीप आई थी. हे वशा गौ! तब इंद्र ने हजारों पात्र ले कर तुझे सोमरस पिलाया था. (९) यदनूचीन्द्रमैरात् त्व ऋषभो ऽ ह्वयत्. ebook converter DEMO Watermarks*

तस्मात् ते वृत्रहा पयः क्षीरं क्रुद्धो हरद् वशे.. (१०) हे वशा गौ! जब तू अनुकूल बन कर इंद्र के समीप जाती है, तब बैल तुझे समीप से बुलाता है. इस कारण इंद्र क्रोधित हो कर तेरे मधुर दूध को दुहता है. (१०) यत् ते क्रुद्धो धनपतिरा क्षीरपहरद् वशे. इदं तदद्य नाकस्त्रिषु पात्रेषु रक्षति.. (११) हे वशा गौ! जब क्रोध में भरा हुआ धनपति अर्थात् कुबेर तेरा दूध लेता है, तो उसे स्वर्ग तीन पात्रों में सुरक्षित रखता है. (११) त्रिषु पात्रेषु तं सोममा देव्य हरद् वशा. अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१२) जहां दीक्षा धारण करने वाला अथर्ववेदी यजमान स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठा था, वहां दिव्य गुणों वाली वशा गौ ने तीन पात्रों में सोमरस को भर दिया. (१२) सं हि सोमेनागत समु सर्वेण पद्धता. वशा समुद्रमध्यष्ठाद् गन्धर्वैः कलिभिः सह.. (१३) वह वशा गौ चरणों वाले सभी मनुष्यों के साथ सोमरस ले कर आई. वह गौ कलह करने वाले गंधर्वों के साथ सागर में प्रतिष्ठा पाती रही. (१३) सं हि वातेनागत समु सर्वैः पतत्रिभिः. वशा समुद्रे प्रानृत्यदृचः सामानि बिभ्रती.. (१४) ऋचाओं और सामवेद के मंत्रों को धारण करती हुई वशा गौ सभी पक्षियों के साथ वायु के पास गई और सागर पर नृत्य करने लगी. (१४) सं हि सूर्येणागत समु सर्वेण चक्षुषा. वशा समुद्रमत्यख्यद् भद्रा ज्योतींषि बिभ्रती.. (१५) सभी नेत्रों के साथ वशा गौ सूर्य से मिली. कल्याणकारिणी उस गौ ने प्रकाश को धारण करते हुए सागर से भी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की. (१५) अभीवृता हिरण्येन यदतिष्ठ ऋतावरि. अश्वः समुद्रो भूत्वा ऽ ध्यस्कन्दद् वशे त्वा.. (१६) हे ऋतावरी अर्थात् अधिक मात्रा में दूध देने वाली गौ! तू जब सोने के आभूषणों से ढकी हुई खड़ी थी, तो हे वशा गौ! सागर घोड़ा बन कर अर्थात् घोड़े के समान तेज चाल से तेरे समीप आ गया था. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

तद् भद्राः समगच्छन्त वशा देष्ट्र्यथो स्वधा. अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१७) यज्ञ में दीक्षित अथर्ववेद के मंत्रों का ज्ञाता ब्राह्मण जहां स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठता है, वहां भद्र पुरुष अथवा कल्याणकारी तत्त्व एकत्र होते हैं, वहां वशा गौ अन्न देने वाली एवं यज्ञ के साधन के रूप में उपस्थित होती है. (१७) वशा माता राजन्यस्य वशा माता स्वधे तव. वशाया यज्ञ आयुधं ततश्चित्तमजायत.. (१८) हे वशा गौ! तू क्षत्रिय की माता है. हे स्वधा अर्थात् अन्न! वशा गौ तेरी माता है. यज्ञ वशा गौ का आयुध है. वशा गौ में ही चित्त अर्थात् बुद्धि उत्पन्न हुई है. (१८) ऊर्ध्वो बिन्दुरुदचरद् ब्रह्मणः ककुदादधि. ततस्त्वं जज्ञिषे वशे ततो होताजायत.. (१९) ब्रह्म के ककुद अर्थात् ऊपर वाले भाग से एक बूंद उछली. हे वशा गौ! तू उसी बूंद से उत्पन्न हुई है तथा उसी बूंद से हवन करने वाले होता उत्पन्न हुए हैं. (१९) आस्नस्ते गाथा अभवन्नुष्णिहाभ्यो बलं वशे. पाजस्याज्जज्ञे यज्ञ स्तनेभ्यो रश्मयस्तव.. (२०) हे वशा गौ! तेरे मुख से गाथाएं उत्पन्न हुईं तथा तेरी गरदन से बल की उत्पत्ति हुई. तेरे ऐन से यज्ञ उत्पन्न हुआ तथा तेरे थनों से किरणें उत्पन्न हुईं. (२०) ईर्माभ्यामयनं जातं सक्थिभ्यां च वशे तव. आन्त्रेभ्यो जज्ञिरे अत्रा उदरादधि वीरुधः.. (२१) हे वशा गौ! तेरे बाहुओं अर्थात् अगली टांगों और पिछले पैरों से तेरा चलना होता है. तेरी आंतों से अनेक पदार्थ उत्पन्न हुए तथा तेरे पेट से वृक्ष उत्पन्न हुए. (२१) यदुदरं वरुणस्यानुप्राविशथा वशे. ततस्त्वा ब्रह्मोदह्वयत् स हि नेत्रमवेत् तव.. (२२) हे वशा गौ! वरुण के उदर में तेरा प्रवेश हुआ. इस के पश्चात ब्रह्म ने तेरा आह्वान किया. वही तेरा नेत्र जानता है. (२२) सर्वे गर्भादवेपन्त जायमानादसूस्र्वः. ससूव हि तामाहुर्वशेति ब्रह्माभिः क्लृप्तः स ह्यस्या बन्धुः.. (२३) प्राणहीन उत्पन्न होने वाले गर्भ से सभी कांपने लगे. उस ने कहा कि हे वशा! तू बच्चे ebook converter DEMO Watermarks*

को जन्म दे. ब्राह्मणों ने उसी को वशा का बंधु निश्चित किया. (२३) युध एकः सं सृजति यो अस्या एक इद् वशी. तरांसि यज्ञा अभवन् तरसां चक्षुरभवद् वशा.. (२४) एक योद्धा इस के समीप आता है, जो एक मात्र एक गौ को वश में करने वाला है. यज्ञ ही पार करने वाले बने. वशा गौ ही पार करने वालों की आंख बनी. अर्थात् वशा गौ के पीछे चल कर ही सब ने दुःख को पार किया. (२४) वशा यज्ञं प्रत्यगृह्णाद् वशा सूर्यमधारयत्. वशायामन्तरविशदोदनो ब्रह्मणा सह.. (२५) वशा गौ ने यज्ञ को स्वीकार किया तथा सूर्य को धारण किया. ब्रह्म अर्थात् ज्ञान के साथ ओदन अर्थात् भात वशा गौ में प्रविष्ट हुआ. (२५) वशामेवामृतमाहुर्वशां मृत्युमुपासते. वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या ३ असुराः पितर ऋषयः.. (२६) वशा गौ को ही अमृत कहा गया है. मृत्यु समझ कर भी वशा गौ की उपासना की जाती है. वशा ही यह सब हुई जैसे—देव, मनुष्य, असुर, पितर और ऋषि. (२६) य एवं विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्. तथा हि यज्ञः सर्वपाद् दुहे दात्रे ऽ नपस्फुरन्.. (२७) जो इस बात को जानता है, वही वशा गौ का दान स्वीकार करेगा. यश सभी चरणों से गति करता हुआ अर्थात् स्थिर हो कर वशा गौ का दान देने वाले को सभी पुण्य फल प्रदान करता है. (२७) तिस्रो जिह्वा वरुणस्यान्तर्दीद्यत्यासनि. तासां या मध्ये राजति सा वशा दुष्प्रतिग्रहा.. (२८) वरुण के मुख में तीन जिह्वाएं दीप्त हैं. उन के मध्य में जो विराजमान है, वही वशा है. उस को दान के रूप में स्वीकार करना कठिन काम है. (२८) चतुर्धा रेतो अभवद् वशायाः. आपस्तुरीयममृतं तुरीयं यज्ञस्तुरीयं पशवस्तुरीयम्.. (२९) वशा गौ का वीर्य अर्थात् बल चार भागों में विभाजित हुआ. जल, अमृत, यज्ञ और पशु उस के चौथे भाग हैं. (२९) वशा द्यौर्वशा पृथिवी वशा विष्णुः प्रजापतिः. ebook converter DEMO Watermarks*

वशाया दुग्धमपिबन्त्साध्या वसवश्च ये.. (३०) वशा गौ द्यौ, पृथ्वी, विष्णु और प्रजापति हैं. जो साध्य और वायु हैं, उन्होंने वशा गौ का दूध पिया. (३०) वशाया दुग्धं पीत्वा साध्या वसवश्च ये. ते वै ब्रध्नस्य विष्टपि पयो अस्या उपासते.. (३१) जो साध्य और वसु थे, वे वशा गौ का दूध पी कर स्वर्ग के स्थान में पहुंचे और सदा वशा गौ का दूध पीते हैं. (३१) सोममेनामेके दुहे घृतमेक उपासते. य एवं विदुषे वशां ददुस्ते गतास्त्रिदिवं दिवः.. (३२) कुछ ने इस वशा गौ से सोम का दोहन किया. कुछ ने इस के घृत की उपासना की अर्थात् घृत प्राप्त किया. जो इस प्रकार जानने वाले को वशा गौ का दान करते हैं, वे देवों के स्वर्ग में जाते हैं. (३२) ब्राह्मणेभ्यो वशां दत्त्वा सर्वाँल्लोकान्त्समश्रुते. ऋतं ह्यस्यामार्पितमपि ब्रह्माथो तपः.. (३३) मनुष्य ब्राह्मणों को वशा गौ दे कर सभी लोकों का सुख भोगता है. वशा गौ में सत्य, ज्ञान एवं तप आश्रित है. (३३) वशां देवा उप जीवन्ति वशां मनुष्या उत. वशेदं सर्वमभवद् यावत् सूर्यो विपश्यति.. (३४) देवगण एवं मनुष्य वशा गौ के सहारे जीवित रहते हैं. जहां तक सूर्य का प्रकाश है, वहां तक यह वशा गौ ही है. (३४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन

ग्यारहवां कांड सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन अग्ने जायस्वादिर्तिनाथितेयं ब्रह्मौदनं पचति पुत्रकामा. सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वा मन्थन्तु प्रजया सहेह.. (१) हे अग्नि देव! तुम अरणि मंथन से उत्पन्न हुए हो. यह देव माता अदिति पुत्र की कामना से इस ब्रह्मौदनासव नामक कर्म में ब्राह्मणों को खिलाने के हेतु भात पकाना चाहती है. मरीच आदि सप्त ऋषि पृथ्वी आदि को बनाने वाले हैं. वे इस देवयज्ञ में मंथन के द्वारा तुम्हें यजमान के पुत्र, पौत्र आदि के साथ उत्पन्न करें. (१) कृणुत धूमं वृषणः सखायोऽद्रोघाविता वाचमच्छ. अयम्अग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवा असहन्त दस्यून्.. (२) हे कामना पूर्ण करने वाले एवं जगत् के मित्र सप्त ऋषियो! तुम अरणि मंथन के द्वारा धुआं उत्पन्न करो. ये अग्नि देव स्तुति रूपी ऋचाएं सुन कर उत्तम चरित्र वाले यजमानों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं. देवों सहित ये अग्नि देवशत्रु सेनाओं को पराजित करते हैं. अग्नि की सहायता से देवों ने राक्षसों को पराजित किया था. (२) अग्ने ऽ जनिष्ठा महते वीर्याय ब्रह्मौदनाय पक्तवे जातवेदः. सप्त ऽ ऋषयो भूतकृतस्ते त्वा ऽ जीजनन्नस्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (३) हे उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव! तुम परम सामर्थ्य के लिए अरणि मंथन से उत्पन्न होते हो. पृथ्वी आदि की रचना करने वाले सप्त ऋषियों ने तुम्हें ब्रह्मौदन पकाने के लिए उत्पन्न किया था. तुम इस पत्नी को पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (३) समिद्धो अग्ने समिधा सामिध्यस्व विद्वान् देवान् यज्ञियाँ एह वक्षः. तेभ्यो हविः श्रपयं जातवेद उत्तमं नाकमधि रोहयेमम् .. (४) हे प्रज्वलित अग्नि! तुम समिधाओं के द्वारा अधिक दीप्त बनो एवं यज्ञ के योग्य देवों को जानते हुए उन्हें यहां लाओ. हे जातवेद अग्नि! उन देवों के निमित्त ब्रह्मौदन रूपी हवि पकाते हुए तुम इस यजमान को उत्तम स्वर्गलोक में पहुंचाओ. (४) त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम्. ebook converter DEMO Watermarks*

अंशान्जानीध्वं वि भजामि तान् वो यो देवानां स इमां पारयाति.. (५) तुम्हारे लिए अर्थात् अग्नि आदि देवों के लिए, पितरों के लिए और मनुष्यों के लिए पहले जो भाग तीन से विभाजित किए गए हैं, हे देव! पितर एवं मनुष्य! उन भागों को जानो. मैं तुम्हारे लिए उन भागों को अलगअलग करता हूं. उन में देवों का जो भाग है, वह अग्नि में हवि के रूप में हवन किया जा रहा है. वह देव भाग इस यजमान पत्नी को इष्ट फल प्रदान करे. (५) अग्ने सहस्वानभिमूरभीदसि नीचो न्युब्ज द्विषतः सपत्नान्. इयं मात्रा मीयमाना मिता च सजातांस्ते बलिहृतः कृणोतु .. (६) हे अग्नि देव! तुम सामर्थ्य वाले होने के कारण शत्रुओं को पराजित करते हो. तुम बुरे कर्म करने वाले हमारे शत्रुओं को नीचे की ओर मुंह कर के गिराओ. हे यजमान! कारीगर के द्वारा बनाई गई यह शाला तुझे भेंट लाने वाले पुत्र, पौत्र आदि से संपन्न करे. (६) साकं सजातैः पयसा सहैध्युदुब्जैनां महते वीर्याय. ऊर्ध्वो नाकस्याधि रोह विष्टपं स्वर्गो लोक इति यं वदन्ति .. (७) हे यजमान! तू समान जन्म वाले पुरुषों के साथ कर्मफल के सहित वृद्धि को प्राप्त हो एवं इस पत्नी को अधिक वीर्य प्राप्त करने हेतु स्वाभिमानी बने. हे यजमान! तू देहांत के पश्चात उस स्वर्ग में पहुंच, जिसे उत्तम कर्मों का फल कहा जाता है. (७) इयं मही प्रति गृह्णातु चर्म पृथिवी देवी सुमनस्यमाना. अथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम् .. (८) देवगण की यह भूमि बिछे हुए चर्म को स्वीकार करे एवं हमारे प्रति कोमल हृदय बन कर दया करे. पृथ्वी की कृपा के कारण हम यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में पहुंचें. (८) एतौ ग्रावाणौ सयुजा युङ्ग्धि चर्मणि निर्भिन्ध्यंशून् यजमानाय साधु. अवघ्नती नि जहि य इमां पृतन्यव ऊर्ध्वं प्रजामुद्धरन्त्युदूह.. (९) हे ऋत्विज्! सामने रखे हुए एवं लोहे के समान दृढ़ उलूखल और मूसल को एक साथ मिला कर बिछे हुए बैल के चमड़े पर रख लो तथा यजमान के लिए सोमलता के अंशों से बने हुए धानों को कूटो. हे पत्नी! उलूखल और मूसल से धान को कूटती हुई तू हमारी संतान को सेना की सहायता से मारने के इच्छुक शत्रुओं को बाधा पहुंचा. तू मूसल उठाती हुई हमारी संतान को उन्नत स्थान प्राप्त करो. (९) गृहाण ग्रावाणौ सकृतौ वीर हस्त आ ते देवा यज्ञिया यज्ञमगुः. त्रयो वरा यतमां स्त्वं वृणीषे तास्ते समृद्धीरिह राधयामि.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे वीर अध्वर्यु! अपने हाथ में उत्तम कर्म वाले उलूखल और मूसल नाम के दो पत्थर ग्रहण करो. प्रसिद्ध एवं यज्ञ के योग्य देव तुम्हारे यज्ञ में आए हैं. हे यजमान! तू यज्ञ कर्म की समृद्धि, सांसारिक सुखों की समृद्धि और परलोक की समृद्धि— इन तीन वरों की कामना करता है. मैं इस यज्ञ के द्वारा इन तीन समृद्धियों की साधना करता हूं. (१०) इयं ते धीतिरिदमु ते जनित्रं गृह्णातु त्वामदितिः शूरपुत्रा. परा पुनीहि य इमां पृतन्यवो ऽ स्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (११) हे सूप! चावलों से भूसी को अलग करना तेरा कार्य है और यही तेरे जन्म का कारण है. शूर पुत्रों वाली देवमाता अदिति इस कार्य के लिए तुझे हाथ में लें. जो शत्रु इस पत्नी की हिंसा करने के लिए सेना ले कर आए हैं, उन की हिंसा करने के लिए तू चावलों से भूसी को अलग कर. तू इस पत्नी के लिए वीर पुत्रों एवं पौत्रों से युक्त धन अधिक मात्रा में प्रदान कर. (११) उपश्वसे द्रुवये सीदता यूयं वि विच्यध्वं यज्ञियासस्तुषैः. श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (१२) हे चावलों! मैं स्थिर एवं उत्तम फल वाले कर्म के निमित्त तुम्हें अधिक बना रहा हूं. इसीलिए तुम सूप में बैठ जाओ. यज्ञ में उपयोग के योग्य तुम भूसी से अलग हो जाओ. हम भी तुम्हारे कारण उत्पन्न संपत्ति से अपने समान जन्म वाले पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो जाएं और द्वेष करने वाले शत्रुओं को अपने पैरों में गिराएं. (१२) परेहि नारि पुनरेहि क्षिप्रमपां त्वा गोष्ठो ऽ ध्यरुक्षद् भराय. तासां गृह्णीताद् यतमा यज्ञिया असन् विभाज्य धीरीतरा जहीतात्.. (१३) हे नारी! तू मुझ से विमुख हो कर जल भरने जा और जल ले कर शीघ्र लौट आ. उस समय गायों के जल पीने का जलाशय जल भरने के हेतु तेरे शीष पर चढ़े अर्थात् उस जलाशय से जल ले कर तू जल पात्र सिर पर रख ले. जलाशय के जलों में जो जल यज्ञ के योग्य हैं, उन्हें ग्रहण करना. हे बुद्धिमती! तू यज्ञ के योग्य जलों को अलग कर के त्याग देना. (१३) एमा अगुर्योषितः शुम्भमाना उत्तिष्ठ नारि तवसं रभस्व. सुपत्नी पत्या प्रजया प्रजावत्या त्वागन् यज्ञः प्रति कुम्भं गृभाय.. (१४) हे पत्नी! शोभन अलंकारों से युक्त ये नारियां जल भरने के लिए आ गई हैं. तू भी उठ कर जल भरने के लिए तैयार हो जा. तू उत्तम पति के कारण श्रेष्ठ पत्नी एवं संतान के कारण प्रजावती है. यज्ञ तुझे जल के रूप में प्राप्त हुआ है. तू जल से भरा हुआ घड़ा ले कर आ जा. (१४) ऊर्जो भागो निहितो यः पुरा व ऋषिप्रशिष्टाप आ भरैताः. ebook converter DEMO Watermarks*

अयं यज्ञो गातुविन्नाथवित् प्रजाविदुग्रः पशुविद् वीरविद् वो अस्तु.. (१५) हे जलो! तुम्हारा जो बलकारक अंश ब्रह्मा ने बनाया था, वही इस यज्ञ में लाया जाता है. हे पत्नी! ये जल मंत्रों एवं ब्रह्मा के द्वारा अनुमति प्राप्त हैं. इन्हें तू घड़े में भर. यह तैयार किया जाता हुआ ब्रह्मौदनासव नामक यज्ञ तेरे लिए स्वर्ग के मार्ग को प्राप्त कराने वाला, चाहे गए स्वर्ग आदि फल को देने वाला, पुत्र, पौत्रों का दाता, गाय, घोड़े आदि पशुओं को प्राप्त कराने वाला एवं अनेक सेवकों को प्रदान करने वाला हो. (१५) अग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वाध्यरुक्षच्छुचिस्तपिष्ठस्तपसा तपैैनम्. आर्षेया दैवा अभिसङ्गत्त्य भागमिमं तपिष्ठा ऋतुभिस्तपन्तु.. (१६) हे अग्नि! यज्ञ के योग्य चरु अर्थात् हवि पकाने की बटलोई तुम्हारे ऊपर स्थित हो. तुम अपने तेज से इस शुद्ध एवं तपी हुई बटलोई को अधिक तपाओ. गोत्र प्रवर्तक ऋषियों को जानने वाले ब्राह्मण एवं इंद्रादि देव अपनाअपना भाग पा कर इस बटलोई से संतुष्ट हों और इसे अधिक तपाएं. (१६) शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा आपश्चरुमव सर्पन्तु शुभ्राः. अदुः प्रजां बहुलान् पशून् नः पक्तौदनस्य सुकृतामेतु लोकम्.. (१७) शुद्ध और पवित्र स्त्रियां यज्ञ के योग्य इन श्वेत रंग के जलों को बटलोई में डालें. वे जल हमें पुत्र आदि रूप संतान और गाय, भैंस आदि पशु प्रदान करें. ब्रह्मौदन को पकाने वाला यजमान पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग को जाए. (१७) ब्रह्मणा शुद्धा उत पूता घृतेन सोमस्यांशवस्तण्डुला यज्ञिया इमे. अपः प्र विशत प्रति गृह्णातु वश्चरुरिमं पक्त्वा सुकृतामेत लोकम्.. (१८) ये चावल मंत्र के द्वारा शुद्ध तथा जल के द्वारा धोए गए एवं अमृत के अंश हैं. यज्ञ के योग्य ये चावल बटलोई में भरे हुए जल में प्रवेश करें. हे चावल! बटलोई तुम्हें स्वीकार करे. यजमान इस ब्रह्मौदन को पका कर पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त हो. (१८) उरुः प्रथस्व महता महिम्ना सहस्रपृष्ठः सुकृतस्य लोके. पितामहाः पितरः प्रजोपजा ऽ हं पक्ता पञ्चदशस्ते अस्मि.. (१९) हे भात! तू पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में अतिशय विस्तीर्ण हो और हजारों अवयवों वाला बन कर फैल. हमारे पिता, पितामह आदि सात पुरुष तेरे द्वारा तृप्त हों एवं हमारे पुत्र, पौत्र आदि सात पीढ़ियां तेरे द्वारा प्रसन्न हों. ब्रह्मौदन को पकाने वाला मैं तेरे लिए पंद्रहवां हूं. (१९) सहस्रपृष्ठः शतधारो अक्षतो ब्रह्मौदनो देवयानः स्वर्गः. ebook converter DEMO Watermarks*

अमूंस्त आ दधामि प्रजया रेषयैनान् बलिहाराय मृडतान्मह्यमेव.. (२०) हे यजमान! तेरे द्वारा किया जाता हुआ यह ब्रह्मौदनासव नाम का यज्ञ हजार शरीर वाला, अमृतमयी सौ धाराओं से युक्त, देवों तक पहुंचाने वाला तथा पल के रूप में स्वर्ग प्राप्त कराने वाला है. यह ब्रह्मौदन खाए जाने पर भी कभी समाप्त नहीं होता है. हे ब्रह्मौदन! मैं अपने सजातीय पुरुषों को तेरे सामने खड़ा करता हूं. इन्हें पुत्र, सेवक आदि प्रजा के रूप में मेरी अपेक्षा हीन बना. यह सब यज्ञ केवल तुझे ही सुखी और उत्तम बनाए. (२०) उदेहि वेदिं प्रजया वर्धयैनां नुदस्व रक्षः प्रतरं धेह्येनाम्. श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (२१) हे पके हुए भात! अग्नि से उठ कर यज्ञ वेदी पर आओ. इस पत्नी को पुत्र, पौत्र रूपी प्रजा के द्वारा बढ़ाओ. यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षसों को इस स्थान से भगाओ तथा इस पत्नी को उत्तम बनाने के लिए इस का पोषण करो. (२१) अभ्यावर्तस्व पशुभिः सहैनां प्रत्यडेनां देवताभिः सहैधि. मा त्वा प्रापच्छपथो मा ऽ भिचारः स्वे क्षेत्रे अनमीवा वि राज.. (२२) हे यजमान एवं यजमान पत्नी! दूसरों के द्वारा किया हुआ आक्रोश तुम तक न पहुंचे. दूसरों के द्वारा किया हुआ मारण संबंधी जादू टोना भी तुम्हें प्राप्त न हो. तुम इस स्थान में निरोग हो कर निवास करो. हे ब्रह्मौदन! पत्नी, यजमान, आदि को गाएं, भैंसे आदि पशुओं के साथ प्राप्त हों तथा तुम यज्ञ के योग्य इन देवों के साथ यजमान के सामने खड़े होओ. (२२) ऋतेन तष्टा मनसा हितैषा ब्रह्मौदनस्य विहिता वेदिरग्रे. अंसद्रीं शुद्रामुप धेहि नारि तत्रौदनं सादय दैवानाम्.. (२३) ब्रह्मा ने इस वेदी का निर्माण किया. हिरण्यगर्भ ने इसे स्थापित किया एवं ब्रह्मौदन को पकाने के लिए महर्षियों ने इस वेदी की कल्पना की. हे पत्नी! तू देवों, पितरों और मनुष्यों के भागों को धारण करने वाली इस वेदी के समीप बैठ तथा देवों के इस भाग को पका. (२३) अदितेर्हस्तां सुचमेतां द्वितीयां सप्तऋषयो भूतकृतो यामकृण्वन्. सा गात्राणि विदुष्योदनस्य दर्विर्वेद्यामध्येनं चिनोतु.. (२४) प्राणियों की सृष्टि करने वाले सप्त ऋषियों ने देव माता अदिति के द्वितीय हाथ के रूप में होम के साधन इस करछुली को बनाया था. यह करछुली पके हुए भात के शरीरों को जानती हुई वेदी के ऊपर इस भात को स्थापित करे. (२४) शृतं त्वा हव्यमुप सीदन्तु दैवा निःसृप्याग्नेः पुनरेनान् प्र सीद. सोमेन पूतो जठरे सीद ब्रह्मणामार्षेयास्ते मा रिषन् प्राशितारः.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे पके हुए एवं हवन के योग्य भात! देव तुम्हारे समीप बैठें. तुम अग्नि के समीप से निकल कर इन्हें प्रसन्न करो. दूध, दही, रूप, अमृत से पवित्र तुम ब्राह्मणों के पेट में बैठो. अपनेअपने गोत्र और प्रवर को जानने वाले ये ब्राह्मण तुम्हें खा कर नष्ट न हों अर्थात् तुम इन की हिंसा मत करना. (२५) सोम राजन्तसंज्ञानमा वपैभ्यः सुब्राह्मणा यतमे त्वोपसीदान्. ऋषीनार्षेयांस्तपसो ऽ धि जातान् ब्रह्मोदने सुहवा जोहवीमि.. (२६) हे राजा सोम रूपी ब्रह्मोदन! इन खाने वाले ब्राह्मणों को उत्तम ज्ञान दो. इन में जो उत्तम ब्राह्मण तुम्हारे समीप बैठे हैं, उन्हें भी उत्तम ज्ञान प्राप्त कराओ. तप से उत्पन्न एवं शोभन आह्वान वाली पत्नी मैं ज्ञानी ऋषियों को ब्रह्मोदन के निमित्त बारबार बुलाती हूं. (२६) शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा ब्राह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि. यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हमिन्द्रो मरुत्वान्तस ददादिदं मे.. (२७) पाप रहित एवं अपने संसर्ग से अन्यों को भी पवित्र करने वाले एवं यज्ञ के योग्य इन जलों को मैं धोने के प्रयोजन से ब्राह्मणों के हाथ में डालता हूं. हे जलो! मैं जिस अभिलाषा से इस समय तुम्हें सब ओर छिड़कता हूं, मरुतों से मुक्त इंद्र मेरी वह कामना पूरी करें. (२७) इदं मे ज्योतिरमृतं हिरण्यं पक्वं क्षेत्रात् कामदुघा म एषा. इदं धनं नि दधे ब्राह्मणेपु कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः.. (२८) यह स्वर्ण मेरे स्वर्ग के मार्ग की कभी न बुझने वाली ज्योति है. यह पकाया हुआ अन्न मेरी कामधेनु है. मैं दक्षिणा के रूप में दिया जाता हुआ धन ब्राह्मणों में धारण करता हूं तथा मेरे पिता, पितामह आदि के द्वारा अभिलषित जो स्वर्गलोक है, मैं उस का मार्ग बनाता हूं. (२८) अग्नौ तुषाना वप जातवेदसि परः कम्बूकां अप मृड्ढि दूरम्. एतं शुश्रुम गृहराजस्य भागमथो विद्म निर्ऋतेर्भागधेयम्.. (२९) हे ऋत्विज्! ब्रह्मोदन से अलग की गई भूसी को जातवेद अग्नि में डालो तथा कंबूकों अर्थात् फलकणों को पैर से दूर मसल दो. इस कंबूक को मैं ने गृहपति अर्थात् वास्तु देवता का भाग सुना है. इसे मैं पाप देवता निर्ऋति का भाग जानता हूं. (२९) श्राम्यतः पचतो विद्धि सुन्वतः पन्थां स्वर्गमधि रोहयैनम्. येन रोहात् परमापद्य यद् वय उत्तमं नाकं परमं व्योम.. (३०) हे ब्रह्मोदन! इन दीक्षा रूप तप करने वालों को, ब्रह्मोदन पकाने वालों को एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमानों को जानो तथा स्वर्ग के मार्ग पर स्थापित करो. उस मार्ग से चल कर यजमान उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में स्थित हो. उत्तम पक्षी बाज के समान ये जिस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*

स्वर्ग में पहुंच सके, वैसा करो. (३०) बभ्रेरध्वर्यो मुखमेतद् वि मृड्ढ्याज्याय लोकं कृणुहि प्रविद्वान्. घृतेन गात्रानु सर्वा नि मृड्ढि कृण्वे पन्थां पितृषु यः स्वर्गः.. (३१) हे अध्वर्यु! ऋत्विज् का भरणपोषण करने वाले पके हुए भात का मुंह शुद्ध करो. हे विद्वान् अध्वर्यु! ओदन में घी डालने के लिए गड्ढा बनाओ. इस के पश्चात बटलोई के भाग के सभी अंगों को घी से चिकना करो. इस ओदन के द्वारा मैं पूर्वजों के अभिलषित स्वर्ग का मार्ग बनाऊंगा. (३१) बभ्रे रक्षः समदमा वपैभ्यो ऽ ब्राह्मणा यतमे त्वोपसीदान्. पुरीषिणः प्रथमानाः पुरस्तादार्षेयास्ते मा रिषन् प्राशितारः.. (३२) हे भरणशील ब्रह्मौदन! ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय आदि जो तुझे खाने के लिए बैठें, उन्हें तू वह पीड़ा पहुंचा जो राक्षस पहुंचाते हैं. पूर्व में जो ऋषि गोत्र एवं प्रवर के ज्ञाता, प्रजा पशु आदि के पूरक एवं लोक में पुत्र, पौत्र आदि के द्वारा समृद्ध भृगु अंगिरा आदि के मंत्रों को जानने वाले ब्राह्मण तुझे खाते हैं, वे तुझे खा कर कष्ट प्राप्त न करें. (३२) आर्षेयेषु नि दध ओदन त्वा नानार्षेयाणामप्यस्त्यत्र. अग्निर्मे गोप्ता मरुतश्च सर्वे विश्वे देवा अभि रक्षन्तु पक्वम्.. (३३) हे भात! मैं तुम्हें ऋषि आदि को जानने वाले ब्राह्मणों में धारण करता हूं और इस प्रकार के ब्राह्मणों को तुम्हें खिलाता हूं. इस ब्रह्मौदन में ऋषि, गोत्र आदि न जानने वाले ब्राह्मणों की संभावना भी नहीं है. अग्नि देव मेरे रक्षक हैं. सभी अर्थात् उनचास मरुत् एवं विश्वे देव मेरे द्वारा पकाए हुए भात की रक्षा करें. (३३) यज्ञं दुहानं सदमित् प्रपीनं पुमांसं धेनुं सदनं रयीणाम्. प्रजामृतत्वमुत दीर्घमायू रायश्च पोषैरुप त्वा सदेम.. (३४) यह ब्रह्मौदन यज्ञों को उत्पन्न करने वाला, सदैव बढ़े हुए ऊधस्क अर्थात् एन वाला पुरुष रूपी धेनु है. हे भात! संपत्तियों के गृह रूप तुझ को खाते हुए हम पुत्र, पौत्र आदि के द्वारा अमरता, दीर्घ आयु, धन एवं समृद्धि प्राप्त करें. (३४) वृषभो ऽ सि स्वर्ग ऋषीनार्षेयान् गच्छ. सुकृतां लोके सीद तत्र नौ संस्कृतम्.. (३५) हे ब्रह्मौदन! तुम कामनाओं के पूरक एवं स्वर्गलोक में पहुंचाने वाले हो. तुम मंत्र जानने वाले ऋषियों के पास जाओ. उन के द्वारा खाए जाने पर तुम हमें पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग में पहुंचाओ. वहां हमारा और तुम्हारा संस्कार होगा. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*

समाचिनुष्वानुसंप्रयाह्यग्ने पथः कल्पय देवयानान्. एतैः सुकृतैरनु गच्छेम यज्ञं नाके तिष्ठन्तमधि सप्तरश्मौ.. (३६) हे ब्रह्मोदन! तुम अपने सभी अंगों को समूह बनाते हुए वहां जाओ, जहां तुम्हें जाना है. हे अग्नि देव! तुम भी इस ओदन के जाने हेतु देवों के जाने योग्य मार्ग बनाओ. इन देव मार्गों एवं पुण्य कर्मों के कारण हम स्वर्ग के ऊपर सूर्य मंडल में स्थित यज्ञ को प्राप्त होंगे. (३६) येन देवा ज्योतिषा द्यामुदायन् ब्रह्मोदनं पक्त्वा सुकृतस्य लोकम्. तेन गेष्म सुकृतस्य लोकं स्वरारोहन्तो अभि नाकमृत्तमम्.. (३७) इंद्र आदि देव जिस ज्योति के द्वारा ब्रह्मोदनासव नामक यज्ञ पूर्ण कर के स्वर्ग को गए, वह स्वर्ग पुण्य कर्म करने वालों का लोक है. उसी देवयान मार्ग से हम भी पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्गलोक को जीतेंगे. उत्तम एवं सुखकारक लोक को लक्ष्य कर के हम स्वर्ग में पहुंचेंगे. (३७) सूक्त-२ देवता—मंत्रों में उक्त भव आदि भवाशर्वौ मृडतं माभि यातं भूतपती पशुपती नमो वाम्. प्रतिहितामायतां मा वि स्राष्टं मा नो हिंसिष्टं द्विपदो मा चतुष्पदः.. (१) हे संसार की सृष्टि करने वाले भव एवं संसार की हिंसा करने वाले शर्व! हमें सुखी करो तथा हमारी रक्षा के लिए हमारे सामने आओ. प्राणियों एवं पशुओं के पालक तुम दोनों को नमस्कार है. अपने धनुष की डोरी पर रखा हुआ बाण हमारी ओर मत छोड़ो. हमारे मनुष्यों एवं पशुओं की हिंसा मत करो. (१) शुने क्रोष्ट्रे मा शरीराणि कर्तमलिक्लवेभ्यो गृध्रेभ्यो ये च कृष्णा अविष्यवः. मक्षिकास्ते पशुपते वयांसि ते विघसे मा विदन्त.. (२) हे भव एवं शर्व! तुम हमारे शरीर को कुत्ते और सियार के खाने योग्य मत बनाओ. कातर न होने वाले गिद्धों एवं मांस की इच्छा करने वाले कौओं को भी हमारे शरीर मत खाने दो. हे पशुपति रुद्र! मक्खियां और तुम्हारे पक्षी भी भोजन की इच्छा से हमारे शरीरों को प्राप्त न करें. (२) क्रन्दाय ते प्राणाय याश्च ते भव रोपयः. नमस्ते रुद्र कृण्मः सहस्राक्षायामर्त्य.. (३) हे भव! हम तुम्हारे शब्द और प्राण वायु को नमस्कार करते हैं. हम तुम्हारे मोहक शरीरों को नमस्कार करते हैं. हे रुद्र! हे सहस्राक्ष एवं मृत्यु रहित! हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. (३) पुरस्तात् ते नमः कृण्म उत्तरादधरादुत. ebook converter DEMO Watermarks*

अभीवर्गाद् दिवस्पर्यन्तरिक्षाय ते नमः.. (४) हे रुद्र! हम तुम्हें सामने से, उत्तर दिशा से एवं दक्षिण दिशा से नमस्कार करते हैं. प्रकाशपूर्ण आकाश के ऊपर वाले भाग में वर्तमान तुम्हारे लिए नमस्कार है. (४) मुखाय ते पशुपते यानि चक्षूंषि ते भव. त्वचे रूपाय संदृशे प्रतीचीनाय ते नमः.. (५) हे पशुपति! तुम्हारे मुख को नमस्कार है. हे भव! तुम्हारे तीन नेत्रों को नमस्कार है. तुम्हारे चर्म को, रूप को एवं सम्यक दर्शन की शक्ति को नमस्कार है. (५) अङ्गेभ्यस्त उदराय जिह्वाया आस्याय ते. दद्भ्यो गन्धाय ते नमः.. (६) हे पशुपति! तुम्हारे हाथ, पैर आदि अंगों को नमस्कार है. तुम्हारी जीभ को, मुख को, दांतों को और तुम्हारी गंध ग्राहक इंद्रिय नाक को नमस्कार है. (६) अस्त्रा नीलशिखण्डेन सहस्राक्षेण वाजिना. रुद्रेणार्धकघातिना तेन मा समरामहि.. (७) हम अस्त्र फेंकने वाले, नीले रंग के शिखंड अर्थात् मोर के पंखों से युक्त, हजार आंखों वाले, वेगशाली एवं सेना के आधे भाग का वध करने वाले रुद्र के द्वारा दुःखी न हों. (७) स नो भवः परि वृणक्तु विश्वत आप इवाग्निः परि वृणक्तु नो भवः. मा नो ऽ भि मांस्त नमो अस्त्वस्मै.. (८) बताए हुए प्रभाव वाले भव हमें सभी उपद्रवों से बचाएं. जिस प्रकार जलती हुई अग्नि जल का परित्याग करती है, उसी प्रकार भव हमें त्याग दें. वे हमें बाधा न पहुंचाएं. इस भव के लिए नमस्कार है. (८) चतुर्नमो अष्टकृत्वो भवाय दश कृत्वः पशुपते नमस्ते. तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः.. (९) शर्व को चार बार और भव को आठ बार नमस्कार है. हे पशुपति! तुम्हें दस बार नमस्कार है. हे पशुपति! भिन्नभिन्न जाति वाले पांच पशु अर्थात् गाय, घोड़े, पुरुष, बकरियां और भेड़ें तुम्हारे ही हैं. इन की रक्षा करो. (९) तव चतस्रः प्रदिशस्तव द्यौस्तव पृथिवी तवेदमुरुग्रोवं १ न्तरिक्षम्. तवेदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणत् पृथिवीमनु.. (१०) हे अतिशय बलशाली रुद्र! पूर्व आदि चार दिशाएं तुम्हारे अधिकार में हैं. द्यौ, पृथ्वी, विशाल अंतरिक्ष तथा आत्मा के द्वारा भोक्ता के रूप में वर्तमान सारे शरीर तुम्हारे अधिकार ebook converter DEMO Watermarks*