भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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वही सब अंगो से युक्त सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण फलवाला हो कर स्वर्ग आदि लोकों में स्थित होता है. (९) ततश्चैनमन्येनोरसा प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. कृष्या न रात्स्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. पृथिव्योरसा तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१०) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने जिस वक्षस्थल से इस ओदन का सेवन किया था, तुम ने उस से भिन्न पृष्ठ से यदि इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हें ऋषि कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होगी.' इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे कि मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने पृथ्वी रूप वक्षस्थल से इस ओदन का सेवन किया है. इसे जहां जाना चाहिए था मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन सभी अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीरवाला है. इस विधि से जो उस ओदन का सेवन करना जानता है, वह समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों वाला संपूर्ण शरीर वाला तथा सर्वांगफल से युक्त हो कर स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१०) ततश्चैनमन्येनोदरेण प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. उदरदारस्त्वा हनिष्यतीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. सत्येनोदरेण. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (११) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस उदर से इस ओदन का सेवन किया था, तुम ने यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक उदर से इस ओदन का सेवन किया तो उदर के लिए कष्ट देने वाला अतिसार रोग तुम्हें नष्ट कर देगा. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने उस ओदन का सेवन न पराङ्मुख होकर किया है, न सामने से किया है, न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने सत्यरूपी उदर से इस ओदन का सेवन किया है. इसे जहां जाना चाहिए था मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंशों से युक्त सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर से युक्त है इस विधि से जो पुरुष इस ओदन का सेवन करना जानता है, वही समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है वह स्वर्ग आदि उत्तम लोकों में स्थित होता है. (११) ततश्चैनमन्येन वस्तिना प्राशीर्येन चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. अप्सु मरिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. ebook converter DEMO Watermarks*