अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमुद्रेण वस्तिना. तेनैनं प्राशिषं तेनैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१२) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—'हे देवदत्त पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वाले ऋषियों ने उस ओदन का सेवन जिस व्यक्ति अर्थात् मूत्राशय की सहायता से किया, तुम ने यदि उस से भिन्न विधि से इस ओदन का सेवन किया तो तुम्हारी मृत्यु जल में होगी.' उस के उत्तर रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख होकर किया, न सामने से किया और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इसका सेवन समुद्ररूपी बस्ती अर्थात् मूत्राशय की सहायता से किया है. मैं ने इस ओदन को वहीं पहुंचा दिया है जहां इसे जाना चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर रहित है. इस स्थिति से जो इस ओदन का सेवन करना जानता है वही समस्त अंगों वाला सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१२) ततश्चैनमन्याभ्यामूरुभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. ऊरू ते मरिष्यत इत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. मित्रावरुणयो रूरुभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१३) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे— 'हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने इस ओदन का सेवन जिन जंघाओं की सहायता से किया, यदि तुम ने उस से भिन्न अर्थात् लौकिक जंघाओं की सहायता से इस का सेवन किया तो तुम्हारी जंघाएं नष्ट हो जाएंगी.' इसे उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे—'मैं ने उस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इस ओदन का सेवन मित्र और वरुण रूपी जंघाओं की सहायता से किया है. इसे जहां जाना चाहिए था, मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर सहित है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवन करना जानता है, वह समस्त अंगों सहित, सभी जोड़ों से युक्त और संपूर्ण शरीर वाला होता है. वह स्वर्ग आदि पुण्यलोकों में प्रतीक्षित होता है.' (१३) ततश्चैनमन्याभ्यामष्ठीवद्भ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. स्रामो भविष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. त्वष्टुरष्ठीवद्भ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१४) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहें—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठान करने वाले ऋषियों