भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

ने जिन अस्थियुक्त .... अर्थात् हड्डियों वाले घुटनों की सहायता से सेवन किया था, यदि तुम ने उस से भिन्न अर्थात् लौकिक अस्थियुक्त जानुओं अर्थात् हड्डियों वाले घुटनों की सहायता से ओदन का सेवन किया तो तुम्हारे घुटने सूख जाएंगे।” इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे—“मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है न सामने से किया है और न आत्माभिमुख होकर किया है. मैं ने इस ओदन का सेवन देव के घुटनों की सहायता से किया है. उसे वहीं पहुंचा दिया है जहां उसे जाना चाहिए था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है, इस विधि से जो ओदन का सेवन करना जानता है, वह समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण शरीर सहित होता है, वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में प्रतिष्ठित होता है. (१४) ततश्चैनमन्याभ्यां पादाभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. बहुचारी भविष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. अश्विनोः पादाभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१५) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने जिन पैरों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया था, उस से भिन्न अर्थात् लौकिक पैरों की सहायता से यदि तुम ने इस ओदन का सेवन किया तो तुम बहुचरी अर्थात् निरर्थक बहुत चलने वाले बनोगे।” इस के उत्तर में शिष्य अपने गुरु से कहे कि मैं ने इस ओदन का सेवन न तो पराङ्मुख होकर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इस का सेवन अश्विनीकुमारों रूपी चरणों की सहायता से किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया है जहां इसे जाना था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. इस स्थिति से जो उस ओदन का सेवन करता है, वह समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में स्थित होता है. (१५) ततश्चैनमन्याभ्यां प्रपदाभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. सर्पस्त्वा हनिष्यतीत्येनमहा. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्. सवितुः प्रपदाभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद.. (१६) गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्त्ता ऋषियों ने जिन चरणांशों अर्थात् पंजों की सहायता से ब्रह्मौदन सेवन किया था उससे भिन्न प्रकार से यदि तुमने इस का सेवन किया तो सर्प तुम्हारी मृत्यु कर देगा।” इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे — मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से ebook converter DEMO Watermarks*