अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 608, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचारी अग्नि में, सूर्य में, चंद्रमा में, वायु में और जल में समिधा को धारण करता है. अग्नि आदि की किरणें अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में अलग-अलग विचरण करती हैं. वे किरणें गायों में घृत को, पुरुष और स्त्री में संतान को तथा वर्षा में जल को उत्पन्न करती हैं. (१३) आचार्यो मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः. जीमूता आसन्त्सत्वानस्तैरिदं स्व १ राभृतम्.. (१४) आचार्य ही मृत्यु, वरुण, सोम, जड़ीबूटियां, फसलें एवं जल है. आचार्य रूपी वरुण के अनुचर जलपूर्ण मेघ हुए. उन मेघों ने अपने भीतर वर्षा के निमित्त जल धारण किया है. (१४) अमां घृतं कृणुते केवलमाचार्यो भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत् प्रजापतौ. तद् ब्रह्मचारी प्रायच्छत् स्वन्मित्रो अध्यात्मनः.. (१५) वरुण देव आचार्य हो कर जल को ही उत्पन्न करते हैं. वह वरुण अपने जनक प्रजापति अर्थात् ब्रह्म से जो चाहता है, मित्र देव बन कर अपने ब्रह्मचर्य के माहात्म्य के द्वारा अपने शरीर से ही प्राप्त कर लेता है. (१५) आचार्यो ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी प्रजापतिः. प्रजापतिर्वि राजति विराडिन्द्रो ऽ भवद्वशी.. (१६) आचार्य पहले विद्या का उपदेश कर के ब्रह्मचारी के रूप में उत्पन्न हुआ. ब्रह्मचारी तप के द्वारा अधिक महिमा को प्राप्त कर के जगत् स्रष्टा प्रजापति हुआ. प्रजापति विराट् हुआ. बाद में वह स्वतंत्र इंद्र हुआ. (१६) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति. आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते.. (१७) ब्रह्मचर्य रूपी तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है. आचार्य भी ब्रह्मचर्य के नियम के द्वारा अपने शिष्य को अपने समान बनाना चाहता है. (१७) ब्रह्मचर्येण कन्या ३ युवानं विन्दते पतिम्. अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीर्षति.. (१८) ब्रह्मचर्य के द्वारा कन्या युवा पति को प्राप्त करती है. ब्रह्मचर्य के द्वारा बैल और घोड़ा घास खाने की इच्छा करता है. (१८) ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत. इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व १ राभरत्.. (१९) ब्रह्मचर्य रूपी तप के द्वारा देवों ने मृत्यु का हनन कर दिया अर्थात् देव अमर हो गए. इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*