अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 609, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंने ब्रह्मचर्य के द्वारा देवों के लिए स्वर्ग पर अधिकार किया. (१९) ओषधयो भूतभव्यमहोरात्रे वनस्पतिः. संवत्सरः सहर्तुभिस्ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२०) जड़ीबूटियां और फसलें, भूतकाल में उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होने वाला प्राणि समूह, दिन और रात, ऋतुओं के साथ संवत्सर—ये सब ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२०) पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या ग्राम्याश्च ये. अपक्षाः पक्षिणश्च ये ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२१) पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य, देव, जंगली और ग्रामीण पशु, बिना पंखों के और पंखों वाले प्राणी सभी ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२१) पृथक् सर्वे प्राजापत्याः प्राणानात्मसु बिभ्रति. तान्सर्वान् ब्रह्म रक्षति ब्रह्मचारिण्याभृतम्.. (२२) प्रजापति के द्वारा उत्पन्न देव, मनुष्य आदि सभी अपने शरीरों में प्राणों को धारण करते हैं. उन सभी की रक्षा आचार्य के द्वारा ब्रह्मचारी में धारण किया हुआ अर्थात् पढ़ाया हुआ वेद करता है. (२२) देवानामेतत् परिषूत्मनभ्यारूढं चरति रोचमानम्. तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (२३) इस अपरोक्ष ब्रह्म का साक्षात्कार देवों ने किया है. यह ब्रह्म अपने प्रकाश से प्रकाशित और सब से उत्कृष्ट है. ब्राह्मण से सब से अधिक बढ़ा हुआ और प्रशंसनीय वेद रूपी ब्रह्म उत्पन्न हुआ है. अग्नि आदि सब देव अपने द्वारा उपभोग किए जाने वाले अमृत के साथ उत्पन्न हुए. (२३) ब्रह्मचारी ब्रह्म भ्राजद् बिभर्ति तस्मिन् देवा अधि विश्वे समोताः. प्राणापानौ जनयन्नाद् व्यानं वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम्.. (२४) ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष दीप्ति वाले वेदरूपी ब्रह्म को धारण करता है. उस वेद से सभी देव संबंधित हैं. देवों का निवास बना हुआ ब्रह्मचारी प्राण और अपान के बाद ज्ञान को, मन, वाणी, हृदय और मेधा को उत्पन्न करता है. (२४) चक्षुः श्रोत्रं यशो अस्मासु धेह्यन्नं रेतो लोहितमुदरम्.. (२५) हे ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म! हम स्तोत्राओं में चक्षु, क्षेत्र अर्थात् यज्ञ को धारण करो. तुम अन्न, वीर्य, रक्त तथा संपूर्ण शरीर को हम में धारण करो. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*