भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 615

अग्न्याधेयमथो दीक्षा कामप्रश्छन्दसा सह. उत्सन्ना यज्ञा: सत्राण्युच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (८) अग्नि के आधान के पश्चात सोम याग की दीक्षा, यजमान की इच्छाएं पूर्ण करने वाले मंत्रों के साथ लुप्तप्राय यज्ञ एवं सोमयाग उच्छिष्ट रूपी ब्रह्म में आश्रित हैं. (८) अग्निहोत्रं च श्रद्धा च वषट्कारो व्रतं तप:. दक्षिणेष्टं पूर्तं चोच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (९) अग्नि होम, श्रद्धा, वषट शब्द, व्रत, तप, दक्षिणा, वेदों में बताए गए याग, होमादि कर्म तथा स्मृतियों और पुराणों में बताए गए बावड़ी, कुआं आदि बनवाने के कर्म उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (९) एकरात्रो द्विरात्र: सद्य: क्री: प्रक्रीरुक्थ्य:. ओतं निहितमुच्छिष्टे यज्ञस्याणूनि विद्यया.. (१०) एक रात्रि वाला सोमयाग, दो रात्रियों तक चलने वाला सोमयाग, एक दिन में होने वाले क्री और प्रक्री नाम के सोमयाग, उक्थों वाला सोमयाग, यज्ञ से संबंधित सूक्ष्म रूप, भावना के साथ यज्ञ शेष अर्थात् यज्ञ के पश्चात बचे हुए भातरूपी ब्रह्म में स्थित है. (१०) चतूरात्र: पञ्चरात्र: षड्रात्रश्चोभय: सह. षोडशी सप्तरात्रश्चोच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे ये यज्ञा अमृते हिता:.. (११) चार रात्रियों वाला, पांच रात्रियों वाला, छह रात्रियों वाला तथा इन से दूनी रात्रियों वाले सोमयाग, सोलह रात्रियों वाले, सात रात्रियों वाले सोमयाग तथा अमृत का फल देने वाले जो यज्ञ हैं, वे सब उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (११) प्रतीहारो निधनं विश्वजिच्चाभिजित्च य:. साह्नातिरात्रावुच्छिष्टे द्वादशाहो ऽ पि तन्मयि.. (१२) उद्गीथ के बाद गाए जाने वाले सामवेद के मंत्र, प्रतीहार तथा सोमयागों की समाप्ति के मंत्र, विश्वजित और अभिजित नाम के यज्ञ, एक दिन में होने वाला सोमयाग साह्न, अतिरात्र नाम के जो सोमयाग यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं, वे सब मुझ में हों अर्थात् मेरे द्वारा किए जाएं. (१२) सूनृता संनति: क्षेम: स्वधोर्जामृतं सह:. उच्छिष्टे सर्वे प्रत्यञ्च: कामा: कामेन तात्पु:.. (१३) सूनृता, विनम्र भाव, क्षेम, स्वधा, अमृत, बल तथा सामने उपस्थित सभी कामनाएं यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी कामना करने वाले यजमान को तृप्त करते हैं. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

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