भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 616

नव भूमीः समुद्रा उच्छिष्टे ऽ धि श्रिता दिवः. आ सूर्यो भात्युच्छिष्टे ऽ होरात्रे अपि तन्मयि.. (१४) नौ खंडों वाली पृथ्वी, सात सागर तथा स्वर्ग यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. सूर्य और रात दिन भी उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी मेरे द्वारा हों. (१४) उपहव्यं विषूवन्तं ये च यज्ञा गुहा हिताः. बिभर्ति भर्ता विश्वस्योच्छिष्टो जनितुः पिता.. (१५) उपहव्य, विषूवान नाम के सोमयाग तथा जो सोमयाग ज्ञात नहीं है, विश्व का भरणपोषण करने वाला तथा सवनयज्ञ का अनुष्ठान करने वाले का पालनकर्ता यज्ञशेष रूपी ब्रह्म है. (१५) पिता जनितुरुच्छिष्टो ऽ सोः पौत्रः पितामहः. स क्षियति विश्वस्येशानो वृषा भूम्यामत्तिघ्न्यः.. (१६) यज्ञशेष रूपी ब्रह्म अपने को उत्पन्न करने वाले का पिता है. यह भात प्राण वायु का पौत्र और पितामह है. विश्व का स्वामी और कामनाएं पूर्ण करने वाला वह सब को अतिक्रमण कर के भूमि पर निवास करता है. (१६) ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च. भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं बले.. (१७) ऋत, सत्य, तप, राष्ट्र, श्रम, धर्म, कर्म, भूतकाल, भविष्यकाल, वीर्य, लक्ष्मी और बल यज्ञशेष रूपी बल में आश्रित है. (१७) समृद्धिदोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः. संवत्सरो ऽ ध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः.. (१८) समृद्धि, ओज, आकूति अर्थात् मन चाहे फल संबंधी संकल्प, क्षत्रिय का तेज, राष्ट्र, छह पृथिवियां, संवत्सर, इडा नाम की देवी, यज्ञ कर्मों में ऋत्विजों के प्रेरक मंत्र, गृह और हवि ये सभी यज्ञ शेषरूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१८) चतुर्होतार आप्रियश्चातुर्मास्यानि नीविदः. उच्छिष्टे यज्ञा होत्राः पशुबन्धास्तदिष्टयः.. (१९) चतुर्होत्र नाम के मंत्र, पशुयाग संबंधी मंत्र, चार मासों में किए जाने वाले चार पर्व, स्तुति संबंधी देव के उत्कर्ष को बताने वाले मंत्र, नीविद, यज्ञ, होता, इष्टियां—ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*